Wednesday, August 26, 2015

27 . ज़िंदगी – एक नज़रिया

सच क्या सिर्फ वही है जो तुम देखते हो , महसूस करते हो , छूते हो, गले लगाते हो, जीते हो और ख़ुश होते हो कि तुम सच से रूबरू हो !!!
सच का एक दूसरा पहलू भी होता है जिसे तुम सब कुछ जाने के बाद भी नहीं जानते !!! एक अनदेखा ,अन्जाना, अचिन्हित सच !!
तुम्हारा आज का सच क्या पता कब सिक्के का दूसरा पहलु बन जाए !!
जिस सच को तुम पकड़ कर गौरवान्वित हो रहे हो,एक कोलंबस उसे तिरोहित कर देता है !!!
एक नई खोज , एक नया आविष्कार कितनी पुरानी धारणाएं, कितने पुराने सच बदल देता है सोच कर आश्चर्य है कि हम किस सच को ज़िन्दगी का सम्बल मान रहे है !! उस सच को - जिसके बारे में निश्चित नहीं कि कल वो सच सच रहेगा या नहीं !!!
तांगे का सच ' नया दौर ' के दिलीप कुमार का सच हो सकता है लेकिन ज़िन्दगी का सच नहीं हो सकता , अगर उस सच को , उस बदलाव को आप स्वीकार नहीं कर पा रहे है तो निश्चित ही आप ज़माने की रफ़्तार को रोकने की कोशिश कर रहे है , कोडक कैमरे के भरोसे मोबाइल के फोटो फीचर्स को रोकने का प्रयास कर रहे है !!
इस सूचना क्रांति युग में कोई भी सच कभी भी पुराना सच हो सकता है - एक रिकॉर्ड प्लेयर की तरह !!
पुराने सच का सम्मान कीजिये उसे प्रणाम कीजिये लेकिन उसे ज़िन्दगी नहीं बनाइये ज़िन्दगी कल में नहीं आज में जी जाती है और आज कल से इतर है , अलग है, नवीन है !!!
सुबोध -अगस्त-१५,२०१५