Wednesday, December 31, 2014

28 . ज़िंदगी – एक नज़रिया



ज़िन्दगी जब मुश्किल हो जाये ,इतनी मुश्किल कि तुम हौंसला हारने लगो तो गौर करना और देखना डूबते हुए सूरज को कल वो वापिस लौटेगा कुछ सुस्ताने के बाद ,नए सिरे से इस संसार को रोशन करने ; तो गौर करना और महसूस करना जिस्म से छूटती हुई सांस को , वो छोड़ी इसलिए जाती है कि कार्बन डाई ऑक्साइड निकाल सके और नई ऊर्जा के लिए ऑक्सीजन ले सके . ज़माने में कुछ ऐसे लोग थे जिन पर तुम्हे अटूट भरोसा था और वे तुम्हारे इस मुश्किल दौर में तुम्हारे साथ नहीं थे ( अच्छा हुआ कार्बन डाई ऑक्साइड निकल गई - वे तुम्हारी ज़िन्दगी के बैरियर थे ) लेकिन कुछ ऐसे लोग भी थे जिनसे तुम्हे कोई उम्मीद नहीं थी फिर भी वे जाने- अनजाने तुम्हारे साथ खड़े थे . और शुक्रिया अदा करना नीली छतरी वाले का कि उसने तुम्हे मौका दिया अपने पंख पसारने का, तुम्हारे अनुभव के संसार को समृद्ध करने का , असली और नकली की पहचान करने का ,बंद अँधेरे विश्वास की गलियों में भटकते मन में उजाला भरने का ,और शुक्रिया अदा करना उन साथियों के लिए जो मुश्किलों के दौर में तुम्हारे साथ खड़े थे कुछ पुराने और कुछ नए साथी .
तुम अपनी ज़िन्दगी की मुश्किलें मत देखना वो उपलब्धियां देखना जिन्होंने तुम्हे कभी गौरव दिया था किसी ने आशीष में तुम्हारे सर पर हाथ रखा था किसी ने स्नेह से तुम्हारा माथा चूमा था और अपनी उस सोच को विस्तार देना जो तुममे ऊर्जा भरती थी ,अपने उन ख्वाबों को याद करना जो तुम्हारे बचपन जितने ही मासूम थे ,निश्छल थे यकीन मानो तब तुम्हे अपनी मुश्किलें छोटी लगेगी और विश्वास होने लगेगा कि मैं अब भी जीत सकता हूँ -बड़ा और आसान लगेगा .

सुबोध
९ दिसंबर , २०१४
आभार सहित निम्न ब्लॉग से लिया गया
http://ameerbane.blogspot.in/

Saturday, November 22, 2014

27 . ज़िंदगी – एक नज़रिया



गलतियां हर इंसान करता है - अगर वो ज़िंदा है तो !

लेकिन फर्क इससे पड़ता है कि आपने उन गलतियों पर प्रतिक्रिया क्या और कैसे की है ,आपने गलती होने के बाद अपना माथा पीटा है या उन गलतियों से सबक लिया है .आपने आगे से कोई गलती न हो जाए इस डर से चलना ही बंद कर दिया है या बार-बार गलती कर कर, गिर-गिर कर साईकिल चलाना सीख लिया है .

अगर आपने साईकिल चलाना सीख लिया है तो जाहिर सी बात है उन दिनों आपके अंदर कोई एक आग जल रही थी ,कोई एक लगन लगी थी जो बार-बार गिरने ,चोट लगने के डर से ज्यादा ताकतवर थी . और अगर आपने नहीं सीखा है तो इसकी वजह ये नहीं थी कि साइकिल लम्बी थी या पेडल तक आपके पैर नहीं पहुँच पा रहे थे या पीछे से पकड़ने वाला सही नहीं था या आपको सिखानेवाला कोई भी नहीं था बल्कि असली वजह ये थी कि आपमें वो आग ही नहीं थी ,वो लगन ही नहीं थी जो आपको साइकिल चलाना सिखवा दे .

तीन साल पुरानी घटना याद आती है ,रात को एक बजे ठक -ठक  की आवाज़ आ रही थी मैंने जानकारी की तो पता चला कपूर साहब का लड़का क्रिकेट सीख रहा है ,रात को एक बजे अपने किसी दोस्त के साथ वो डिफेन्स की प्रैक्टिस कर रहा था ,इस साल वो अपने स्टेट की तरफ से खेल रहा है -इसे आग कहते है ,इसे लगन कहते है ,इसे ज़ज़्बा कहते है - उसने अपनी कमी देखी, समझी कि उसकी बैटिंग कमजोर है ,बैटिंग करते वक्त वो बार-बार गलती कर जाता है ,कंसंट्रेट नहीं कर पाता है -उसने अपनी गलती को समझा और उसे दूर किया ,अपनी गलतियों पर उसकी प्रतिक्रिया  सकारात्मक थी लिहाजा एक आग उसके अंदर पैदा हुई और उसने अपने घरवालों को गौरवान्वित किया .

जिन दिनों आपने साइकिल चलाना सीखा था उन दिनों वाली आग , उन दिनों वाली लगन आपमें आज भी ज़िंदा है ?

अगर है तो गलतियाँ आपका इंतज़ार कर रही है - सफलता भी !!

और अगर नहीं है तो अपने ख्वाबों को इतना बड़ा कीजिये कि आपकी रातों की नींद उड़ जाए और आप अपने किसी दोस्त के साथ रात को एक बजे डिफेन्स सीखने के लिए ठक -ठक  करने लगे !!! ( कृपया पड़ोसियों के प्रति विनम्र रहे और उनकी सुविधा का ख्याल रखे ! )

सुबोध - २२ नवंबर,२०१४

Wednesday, November 19, 2014

26 . ज़िंदगी – एक नज़रिया

एक दिन तुम्हारे चेहरे की ख़ूबसूरती पुरानी पड़ जाएगी ,तुम्हारा कसा हुआ जिस्म झुर्रियों से भर जायेगा , चमड़ी का कसाव, उसकी चमक अतीत की बात हो जाएगी , घनी लहराती जुल्फे चांदी के तारों में बदल जाएगी ,तुम्हारी रौबीली खनकदार आवाज़ लड़खड़ाने लगेगी ,वो कदम जिनसे धरती हिलती है उठाये न उठेंगे , वो हाथ जो कइयों के लिए सहारा बनते है किसी सहारे की तलाश करेंगे - सब के साथ ऐसा होता है तुम्हारे साथ भी होगा लेकिन तुम एक भ्रम में जी रहे हो जैसे जवानी का अमृत पीकर आये हो !!

तुम्हारी जवानी तुम्हारे बचपन को कुचलकर आई है तो कोई तुम्हारी जवानी को भी कुचलेगा ,स्थायी कुछ भी नहीं होता और तुम हो कि अपनी जवानी के जोश में ज़माने को अपनी मुट्ठी में करने चले हो !!

बंधु,जमाना तो मुट्ठी में भिंची हुई रेत है जितना कसोगे तुम्हारी पकड़ से फिसलता जायेगा . आखिर में चंद जर्रे तुम्हारी हथेली से चिपके रह जायेंगे जो तुम्हारी अच्छाइयां ,तुम्हारी बुराइयां ,तुम्हारी खासियतें ,तुम्हारी कमियां तुम्हे याद दिलाएंगे .

मैं नहीं कहता कि तुम ये करो या वो करो - कोई उपदेश कोई नसीहत नहीं - निर्णय तुम्हारा है जो भी तुम करना चाहो करो क्योंकि जरूरी नहीं मेरा सच तुम्हारा भी सच हो - सच तो बिलकुल व्यक्तिगत होता है . मेरा सच तुम्हारा झूठ हो सकता है और तुम्हारा सच मेरा झूठ . मेरी रोशनी तुम्हारे लिए अंधकार हो सकती है या तुम्हारी रोशनी से मेरी आँखे चुँधिया सकती है . फर्क मानसिकता का हो सकता है ,वास्तविकता का हो सकता है .

हो सकता है मेरी निगाहों में मेरा बुढ़ापा पीड़ादायक हो जबकि तुम्हारी निगाहों में जन्नत की पहली सीढ़ी - सुकून के लम्हों की शुरुआत ; निर्भर इस पर है कि मैंने या तुमने अपनी जवानी के दिनों में अपने बुढ़ापे के लिए तैयारी कितनी और कैसी की है !!!
सुबोध- १९ नवंबर, २०१४

Tuesday, November 18, 2014

25 . ज़िंदगी – एक नज़रिया

कल का मेरा सच आज सच नहीं रहा ,जब मैं उस सच को आज झूठ बताता हूँ तो तुम आश्चर्य करते हो !

आज जिसे मैं सच मान रहा हूँ हो सकता है कल मैं उसे सच नहीं मानूं हो सकता है तुम मेरी बात नहीं समझ पाओ और फिर आश्चर्य करो.

बेहतर है तुम मेरे कल के सच को जो आज झूठ बन गया है , सच और झूठ के शब्दों में मत उलझाओ बल्कि उन तर्कों को सुनो और समझो जो मैंने तब दिए थे या जो अब दे रहा हूँ ,अगर मैं दोषी हूँ तो दोषी तुम भी हो जिसने मेरे तर्क सुने और माने और उन तर्कों को सच या झूठ का नाम दे दिया .

ज़माने की रफ़्तार इतनी बढ़ गई है कि कल के सच या झूठ आज सच या झूठ नहीं रहे , सारी धारणाये बदल गई ,सारे तर्क बदल गए .

दो सौ साल पहले का सच था शांति से बिना चीखे-चिल्लाये एक दुसरे की बात सुनना हो तो दोनों को आस-पास होना चाहिए लेकिन आज का सच है सात समुन्दर पार का इंसान भी बिना चीखे-चिल्लाये शांति से एक दूसरे की बात सुन सकता है सिर्फ उसे मोबाइल का इस्तेमाल करना है . एक अविष्कार कई सच झूठ बना देता है और कई झूठ सच हो जाते है .

सौ साल पहले महाभारत का संजय जो कुरुक्षेत्र का आँखों देखा हाल धृतराष्ट्र को बताता है कपोल कल्पना कहलाता था किस्से-कहानियों की बात था लेकिन आज तुम टी.व्ही पर आँखों देखा हाल देखते हो और स्वीकार करते हो : कल का झूठ आज सच बन गया है ".

दो सौ साल पहले औद्योगिक युग में " पढोगे-लिखोगे बनोगे नवाब " वाला मुहावरा आज क्या वही अर्थ रखता है ? तब नौकरी मिलना आसान था और आज नौकरी मिलना और नौकरी बने रहना मुश्किल है , कुछ सच या झूठ बदल गए है और कुछ बदलने के बहुत करीब है .

यह नया युग है जहाँ नए सच गढ़े जायेंगे और कल के सच खंडित किये जायेंगे और यही झूठ के साथ भी होगा , कुछ झूठ गढ़े जायेंगे और कुछ खंडित किये जाएंगे .

और भविष्य में -आने वाले सालों में, जब आज अतीत बन जायेगा यह प्रक्रिया तब भी जारी रहेगी.

हर युग के अपने सच होते है और अपने झूठ जो अगले युग में बेमानी हो जाते है ,वो युग अपने सच और अपने झूठ खुद गढ़ता है .

तो मेरे आज के सच को या झूठ को तुम सच या झूठ आज का मानो कल का पता नहीं कल वो रहेगा या बदल जायेगा !!!!

महत्त्वपूर्ण सच नहीं है और न हीं झूठ है बल्कि महत्त्वपूर्ण तुम्हारा मेरे तर्कों को मानना या नकारना है !!!!
- सुबोध

Saturday, November 15, 2014

एक कोशिश और

मुझे याद नहीं
कितनी बार गिरा हूँ मैं
कितने ज़ख्म बने मेरे जिस्म पर
कितनी बार दिल चीरती हँसी
हँसी गई मुझ पर
मगर रूका नहीं मैं
गिर-गिर कर उठा मैं
झाड़ी अपनी धूल

मुस्कुराया हल्का सा
कसी अपनी मुट्ठियाँ
और डाल कर आँखों में आँखे
कहा ज़िन्दगी से -

मैंने हार से बचने का
एक तरीका और सीखा है ,
सफलता इंतज़ार कर रही है मेरा
आ, एक कोशिश और करें !


- सुबोध १३ नवंबर, २०१४

Saturday, November 8, 2014

कविता

उन्हें मुगालता ये हो गया
कि वे कवि हो गए
मैं उनको पढता हूँ
और हँसता हूँ !
अंदर से कोई कहता है
तुम कवि नाम के प्राणी
सिर्फ दूसरों की टांग खींचते हो
अनगढ़ शब्दों को

वाक्य विन्यासों को
पढ़ते हो ,देखते हो
व्याकरण की शुद्धि
जांचते हो, चर्चा करते हो
नाक मुंह सिकोड़ते हो
भावों को नहीं पढ़ते
दिल की आवाज़ नहीं सुनते
तुम जैसे कवि
तालाब के मेंढक होते है
कविता के नाम पर धब्बा होते है
क्या कविता सिर्फ शब्दों का जोड़-तोड़ है
तालियों की गड़गड़ाहट है
मूक संवेदना,
मूक भाव,
लडखडाती अभिव्यक्ति
लूले-लंगड़े,आधे-अधूरे शब्द
क्या किसी की कविता नहीं हो सकते ?
सोचना - सोचकर जवाब देना -
अन्यथा बेड़ियों में बंधी हुई
संस्कारों में जकड़ी हुई
तुम्हारी कविता
नए युग की आंधी में
दम तोड़ देगी
सिर्फ किताबों की शोभा बढ़ाएगी
तालिया पीटने के काम आएँगी
आम आदमी से दूर हो जाएगी
अँधे युग में
अँधो को लुभाएगी
पागलों को हँसाने और
गूंगे-बहरों से तालियां
पिटवाने के काम आएगी !!
सुबोध- ८ नवंबर ,२०१४

Friday, November 7, 2014

गद्य

सिर्फ एक प्रचलित मुहावरा है जिसे जन समर्थन प्राप्त है और वो भावनाओं से ओत -प्रोत है इसलिए वो सही नहीं हो जाता .

मैं किसी की भावनाएं आहत नहीं करना चाहता सिर्फ मेरा एक पक्ष रख रहा हूँ ,हो सकता है आप इससे सहमत न हो तो कृपया अपना पक्ष रखे -तर्क और शालीनता के साथ जिस तरह से मैं रख रहा हूँ !

लोग माँ-बाप को भगवान से भी ऊपर दर्ज़ा देते है - उनकी निगाह में सुख-दुःख भगवान उनके भाग्य में लिखता है ,जबकि माँ-बाप सिर्फ सुख ही लिखते है !!

फेसबुक पर डालने और लाइक लेने में इसका मुकाबला नहीं है - बिलकुल किसी लोकप्रिय टॉपिक की तरह !!

आइये थोड़ा इसका विश्लेषण करे !!

क्या वाकई भाग्य भगवान लिखता है ?

या इंसान के किये गए कर्म ही उसे सुख या दुःख देते है , सफलता और असफलता भगवान ने गढ़ी है या इंसान ने ?

दूसरा वाक्य माँ-बाप भाग्य में सिर्फ सुख ही लिखते है,क्या वाकई ?

मेरे कॉलोनी में रहने वाले रहीम भाई के घर पिछले महीने आठवाँ बच्चा पैदा हुआ है . रहीम भाई खुद साईकिल के पंचर बनाने का काम करते है उनकी शरीके हयात सबीना भाभी लाख की चूड़ियाँ बनाने का काम करती है ,ज़रुरत पर कॉलोनी वाले उनसे घरों में भी साधारण सी मजदूरी पर काम करवा लेते है . वाकई रहीम भाई और सबीना भाभी ने अपने बच्चे के भाग्य में सिर्फ सुख ही लिखा है !

मध्यम वर्गीय कपूर साहब के सिर्फ दो बच्चे है एक लड़का और एक लड़की , अगर डिटेल में उनसे बात की जाए तो उन्हें ये नहीं पता कि उनके उन्नीस वर्षीय बेटे का भविष्य क्या है ,वो जो पढाई कर रहा है आने वाले भविष्य में उससे क्या हासिल होगा. वे अपने बिज़नेस में इतने व्यस्त है कि उन्हें ढंग से अपने बेटे के साथ बैठे हुए हफ्ता-हफ्ता गुजर जाता है .

अधिकांश परिवारों में बच्चे की आमद बिना किसी ठोस प्लानिंग के होती है ,जहाँ माँ-बाप सब कुछ उपरवाले के भरोसे छोड़ देते है , बच्चे के ग्रेजुएट होने तक भी माँ-बाप को पता नहीं होता कि बेटा ज़िन्दगी किस तरह गुजारेगा, जीवनयापन के क्या साधन होंगे और फिर भी माँ-बाप नसीब में सिर्फ सुख ही लिखते है !!

बच्चे पैदा करना और उन्हें संस्कारों की, ज़िदगी की समझ देने की बजाय आदर्शों की खुराक दे दी जाती है ,रटे-रटाये जुमले याद करवा दिए जाते है कि भाग्य भगवान लिखता है , सुख और दुःख तो भगवान के बनाये हुए रात और दिन जैसे है ,माँ-बाप बेहतर होते है ,यही बेहतरी अधिकांश सामूहिक परिवारों में शादी के दुसरे-तीसरे साल बिखर जाती है . और भगवान और भाग्य के नाम पर उनको गैर-जिम्मेदार बनाया जाता है !!

कृपया नई पीढ़ी को इन बेवकूफी भरे जुमलों से ना बहकाये उसे नए ज़माने की नई हवा में सांस लेने दीजिये ,नए तरीके से चीज़ों को सोचना और समझना सीखने दीजिये .

मुझे पता है मैंने एक विवादित मुद्दे को उठाया है हो सकता है कुछ को ये नागवार गुजरे उनसे आग्रह सिर्फ इतना है कि भावुकता भरा जवाब न देकर अगर भौतिकता भरा जवाब दे तो बेहतर होगा .
- सुबोध








Thursday, November 6, 2014

गद्य


कुछ ऐसे शानदार दोस्त जिनके बारे में कल्पना तक न की थी कि ज़िन्दगी में कभी बिछुड़ जाएंगे, होली दिवाली भी याद न करे तो उनके ख्याल से ही सारी खुशियां दर्द में बदल जाती है- सब कुछ पाकर भी कुछ भी न बचा पाने का दर्द , संबंधों को अपनी आँखों के सामने मरते हुए देखने का दर्द , जानी पहचानी रूह में उतरती आवाज़ों को खो देने का दर्द !!

उफ़ ! ये दर्द ,ये खामोशी ,ये चाहत ,ये कशमकश , ये लम्हों को जीने की आग सिर्फ मेरे सीने में धड़क रही है या उस तरफ भी कोई तड़फ ज़िंदा है ?

क्या मैं मेरे गुरुर को,मेरे अहंकार को ,मेरी ईगो को ,मेरे घमंड को अपनी पूरी नकारात्मकता के साथ छोड़कर मोबाइल पर उसके नंबर डायल कर सकता हूँ?

अगर " हाँ " तो करता क्यों नहीं ?

अगर " नहीं " तो झूठे विलाप , झूठे प्रपंच और एक नकाब को क्यों ढ़ो रहा हूँ ?

हे मेरे अराध्य ! मुझे इतनी शक्ति दो कि मैं किसी और में दोष न देखुं और अपने दोष स्वीकार कर सकूँ ,सुधार सकूँ !!!!
- सुबोध , २५ अक्टूबर, २०१४





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 तुम्हारी आज की बर्बादी कल किये गए कार्यों का परिणाम है ,तुम्हारी कामचोरी ,तुम्हारे गलत निर्णय ,आधी-अधूरी सोच और सबसे बड़ा एक गलत चुनाव जो परिणाम दे सकता है वही तुम्हे मिला है ! अब तो जागो , अब तो समझो,ये मत कहो दिवाली ख़राब थी ,दिवाली ख़राब नहीं थी बल्कि कुछ और ख़राब था ; उसे समझो ,गलती स्वीकार करो ,जिम्मेदारी लो और अपनी अगली दिवाली खूबसूरत करो !
मेरी निगाह में इससे बड़ी शुभकामना तुम्हारे लिए नहीं हो सकती !!!
सुबोध- २४ अक्टूबर,२०१४






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विश्वासघात वहां होता है जहाँ विश्वास होता है ,दुश्मनो के साथ पता होता है कि वार हो सकता है तो हमारी मानसिकता जाने-अनजाने चौकन्नी रहती है लेकिन अपनों के बीच हम खुद को सेफ महसूस करते है और सुरक्षा के प्रति लापरवाह हो जाते है और यही हमारे लिए घातक होती है.
- सुबोध

Monday, November 3, 2014

गद्य

मध्यमवर्गीय बुजुर्ग पीढ़ी औद्योगिक युग के संस्कार और तकरीबन मज़दूरों वाली स्थिति से गुजरी है और वो अपनी पीड़ा आज की पीढ़ी को देना चाहती है कि ज़िन्दगी आसान नहीं है ,बड़े पापड़ बेलने पड़ते है,बड़ी मेहनत करनी पड़ती है ,दिन-रात एक करते है तो दो वक्त की रोटी जुटा पाते है .सारी दुश्वारियां,सारी मुसीबतें उनकी जुबां पर होती है लेकिन वे शायद समझ नहीं पाते है कि आज का युग पहलेवाला नहीं है ,आज बैलगाड़ी की जगह गाड़ियां आ गई है ,लालटेन की रोशनी में टिमटिमानेवाली रातें रोशनी से जगमगाती है .उनका वक़्त ,उनकी सोच,उनके साधन सब कुछ बदल गया है ,आज सूचना क्रांति के युग में पैसे पेड़ पर नहीं लगते वाली कहावत गलत हो गई है अब इस युग में पैसे पेड़ पर लगते है ,बस लगाने की काबिलियत और ज़ज्बा होना चाहिए .
मानवीय मूल्य उस युग में भी कीमती थे लेकिन उस युग में ईमानदारी और संस्कारों वाली जनरेशन का आपसी कम्पीटीशन होने की वजह से सफलता के उतने मौके नहीं थे ,लेकिन आज की पीढ़ी में ज्यादातर मूल्यहीन और क्विक फिक्स वाली मानसिकता के लोग होने की वजह से सफलता के चांस बहुत-बहुत ज्यादा है बशर्ते आप टुच्ची मानसिकता वाले न हो और अपने उद्देश्यों के लिए समर्पित हो !!
- सुबोध

Friday, October 31, 2014

गद्य

जानकारी का ताल्लुक उम्र से होता है ऐसा सोचनेवाले पाषाण युग के बचे हुए अवशेष है क्योंकि तब ज़िन्दगी और गुजरने वाली घटनाये प्रसारित करने के साधन नहीं थे ,आज सूचनाएं अबाध गति से हवाओं में तैरती रहती है और ज़रूरतमंद अगर टेक्नोलॉजी का सहारा लेता है तो स्थिति क्या होगी आप खुद ही समझ सकते है ,18 साल का लड़का 60 साल के बुजुर्ग पर सूचनाओं के मामले में भारी पड़ता है .

बुजुर्ग पीढ़ी के पास नयी पीढ़ी पर हावी होने के अमूनन दो तरीके होते थे ( शब्दों पर गौर करें "थे")

1 . बुजुर्ग पीढ़ी ज्यादा उम्रदराज है और इस नाते ज्यादा अनुभवी है .

2 . बुजुर्ग पीढ़ी ज्यादा कमाती है या उसने ज्यादा जोड़ रखा है .

आइये उनके दोनों तर्कों को समझ लेवे.

1 जैसाकि मैंने कहा है आज के ज़माने में ये कहना कि उम्र ज्यादा होने से आप ज्यादा जानकार है सत्य नहीं है ,माउस के एक क्लिक पर आपने अपनी पूरी ज़िन्दगी में जो जानकारी इक्कठा की है वो सारी बल्कि उससे ज्यादा जानकारी हाज़िर हो जाती है ! और उम्र होने के नाते आप अनुभवी है तो मैं कहना चाहूंगा कि अनुभव बिलकुल व्यक्तिगत क्रिया है - बिलकुल आस्था की तरह कि सालो-साल पूजा करनेवाला मंदिर का पुजारी कोरा ही रह जाता है और कभी कभार मंदिर के सामने से गुजरनेवाला भक्त प्रभु को पा जाता है . 55 साल का SHO जिन धाराओं के बारे में नहीं जानता उसी का 18 साल का लड़का नेट पर बैठता है और उन धाराओं का पूरा ब्यौरा बता देता है .

2 . 18 साल का लड़का एक START UP शुरू करता है लाइक माइंडेड ग्रुप्स और आधुनिक साधनों के दम पर डेढ़ से दो साल में अपने पिता से ज्यादा कमा कर अपनी काबिलियत साबित कर देता है .

बुजुर्ग पीढ़ी अपने अनुभव और कमाई के दम पर नयी पीढ़ी पर अगर हावी होना चाहती है तो निश्चित ही वो एक गलत राह पर है और यही शायद पारिवारिक विघटन और पिता-पुत्र के बीच के तनाव की सबसे बड़ी वजह है . भौतिकता के दम पर नयी पीढ़ी पर हावी होना आज संभव नहीं है क्योंकि आजका युग सूचना-प्रधान युग है और इस युग में विजेता वही है जिसने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि उसके पास ज्यादा सटीक और शीघ्र सूचना पहुंचे और वो इन सुचनों का प्रयोग अपने हित में कर सके .और ये व्यवस्था कोई भी खुले दिमाग का समझदार टेक्नोसेवी कर सकता है .

नयी पीढ़ी पर बुजुर्ग पीढ़ी सिर्फ अपने प्रेम ,अपने स्नेह,अपने वात्सल्य के दम पर हावी हो सकती है और मजे की बात ये है कि ये भावनाए हक़ नहीं मांगती ये सिर्फ देना जानती है !!
- सुबोध

Saturday, October 18, 2014

गद्य

उस से मेरी चंद दिनों की मुलाकात , साथ उठना, साथ बैठना , घुल-मिल कर बातें करना ,हंसी -मजाक करना इतना नागवार क्यों गुजर रहा है दुनिया पर कि मुझसे उसका सम्बन्ध क्या है ,पुछा जा रहा है !
ये दुनिया सहज होकर क्यों नहीं सोचती ,इसे क्या बीमारी है कि हर साधारण हरकत को कोम्प्लिकेटेड तरीके से सोचे-समझे !
क्या किसी से बात करने,हंसी-मजाक करने के लिए सम्बन्ध होना ज़रूरी है ?
क्या इतना काफी नहीं है कि मैं भी इंसान हूँ और वो भी इंसान है ,एक इंसान से दूसरे इंसान का क्या इंसानियत का सम्बन्ध नहीं हो सकता ?
बिलकुल वैसा ही सम्बन्ध कि किसी अंधे को आपने हाथ पकड़ कर सड़क पार करवाई ,किसी अपंग की कोई मदद की .
अपंगता क्या सिर्फ शारीरिक होती है मानसिक नहीं ?
अकेलापन दुनिया की सबसे खतरनाक पहेली है और इसका शिकार दुनिया का सबसे बड़ा अपंग .
अगर किसी मानसिक अपंग की अपंगता दूर करने के लिए मैंने उसका अकेलापन दूर कर दिया ,उसके साथ कुछ पल बिता लिए तो क्या गलत किया .
और यहाँ दुनिया सम्बन्धो की तलाश कर रही है !!!!
- सुबोध

Friday, October 17, 2014

गद्य

बड़ी अजीब है ख्वाइश पहचान की , घर-बाहर ,आस-पास,गाँव-शहर ,दूर-नज़दीक,देश-दुनिया हर तरफ हर शख्श एक जंग लड़ रहा है . अपनी पहचान की जंग !

कुछ अपनी पहचान दूसरों को उधार देकर बड़े ,बहुत बड़े बन जाते है , कुछ लोग दूसरों की पहचान उधार लेकर खुद को एक नाम देते है ,खुद की नज़र में बड़े बन जाते है उन्हें मुगालता ये भी होता है कि हम किंग मेकर है .

कुछ लोग चंद सिक्कों में खुद के हुनर को बेच देते है और उस हुनर को खरीददार की पहचान करार देते है , कुछ दूसरों की मेहनत को अपनी पहचान बना लेते है .

कुछ पैसों के बदले में या किसी दबाब में दूसरों को पहचानना बंद कर देते है और कुछ अनजान की पहचान भी क़ुबूल करते है .
क्या निराले खेल है पहचान के !

कुछ पहचान के लिए अजीब से कपडे पहनते है ,कुछ अजीब सी हरकतें करते है ,कुछ गाने का रिकॉर्ड बनाते है ,कुछ नाचने का ,कुछ बार -बार चुनाव लड़ने का ,कोई पढ़ने का !!जितने शख्स उतने तरीके .

चाहता हर कोई है कि मेरी पहचान हो ,तरीका चाहे अजीब हो या फिर ऐसा कुछ करना पड़े कि लोग कहे वाह भाई,वाह या गज़ब या बहुत खूब !!!

जंग पहचान की जो है !!!


सुबोध - अक्टूबर ३, २०१४









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अन्जान लोगों को की हुई मदद को उसने इस तरह लौटाया
कि मुसीबत के वक्त मेरे साथ जो खड़ा था उसे मैं ठीक से जानता भी नहीं था
शायद इसे ही उसकी रहमत कहते है ,शायद यही इंसानियत होती है !!!
सुबोध - २४ सितम्बर, २०१४



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इस मुकाबले में
तुम्हे आगे बढ़ने की जगह दी है
और मैं पीछे हटा हूँ
इसका मतलब ये नहीं है कि
मैं हार रहा हूँ
मैं तो सिर्फ उस पोजीशन में आ रहा हूँ
जहाँ से तुम पर निशाना साध सकूँ
और विजेता बन सकूँ !!!!
सुबोध- २३ सितम्बर, २०१४

Thursday, October 16, 2014

तुम आओगे ..



वो लफ्ज़
जो तुम्हारी आँखों ने कहे थे मुझसे
आज भी सहेज रखे है मैंने
वो लफ्ज़
न दिखते है न मिटते है
एक फाँस की तरह सीने में चुभते है

तब जब
आँखों की कोरों से बहते अश्क
पोंछती है उंगलियाँ
एक दर्द अजीब सा
उँगलियों की पोरों में समां जाता है

वो लफ्ज़
जो कहे तुम्हारी आँखों ने
और मैंने उन लफ़्ज़ों से
बुन लिए सपने
और मेरे सपने
आज भी उघड़े बदन
तेरी बाट जोहते है
सुबह आरती में शीश नवाते है
और साँझ को संध्या करते है .

वो लफ्ज़
जिनमे तेरे कजरे की महक है
अँधेरे में दिये की मानिंद
रौशन है मेरी ज़िन्दगी में
मुझे एतबार है
तेरी आँखों की ज़ुबान पर
उस चाहत पर
जहाँ शरीर पीछे छूट जाते है
मन मिल जाते है
तुम आओगे ..तुम आओगे ...तुम आओगे ...

सुबोध - ११ अक्टूबर,२०१४

गद्य

बड़ी अजीब है ख्वाइश पहचान की , घर-बाहर ,आस-पास,गाँव-शहर ,दूर-नज़दीक,देश-दुनिया हर तरफ हर शख्श एक जंग लड़ रहा है . अपनी पहचान की जंग !

कुछ अपनी पहचान दूसरों को उधार देकर बड़े ,बहुत बड़े बन जाते है , कुछ लोग दूसरों की पहचान उधार लेकर खुद को एक नाम देते है ,खुद की नज़र में बड़े बन जाते है उन्हें मुगालता ये भी होता है कि हम किंग मेकर है .

कुछ लोग चंद सिक्कों में खुद के हुनर को बेच देते है और उस हुनर को खरीददार की पहचान करार देते है , कुछ दूसरों की मेहनत को अपनी पहचान बना लेते है .

कुछ पैसों के बदले में या किसी दबाब में दूसरों को पहचानना बंद कर देते है और कुछ अनजान की पहचान भी क़ुबूल करते है .
क्या निराले खेल है पहचान के !

कुछ पहचान के लिए अजीब से कपडे पहनते है ,कुछ अजीब सी हरकतें करते है ,कुछ गाने का रिकॉर्ड बनाते है ,कुछ नाचने का ,कुछ बार -बार चुनाव लड़ने का ,कोई पढ़ने का !!जितने शख्स उतने तरीके .

चाहता हर कोई है कि मेरी पहचान हो ,तरीका चाहे अजीब हो या फिर ऐसा कुछ करना पड़े कि लोग कहे वाह भाई,वाह या गज़ब या बहुत खूब !!!

जंग पहचान की जो है !!!
सुबोध - अक्टूबर ३, २०१४

गद्य

अन्जान लोगों को की हुई मदद को उसने इस तरह लौटाया
कि मुसीबत के वक्त मेरे साथ जो खड़ा था उसे मैं ठीक से जानता भी नहीं था
शायद इसे ही उसकी रहमत कहते है ,शायद यही इंसानियत होती है !!!
सुबोध - २४ सितम्बर, २०१४

Tuesday, October 14, 2014

गद्य

इस मुकाबले में
तुम्हे आगे बढ़ने की जगह दी है
और मैं पीछे हटा हूँ
इसका मतलब ये नहीं है कि
मैं हार रहा हूँ
मैं तो सिर्फ उस पोजीशन में आ रहा हूँ
जहाँ से तुम पर निशाना साध सकूँ
और विजेता बन सकूँ !!!!
सुबोध- २३ सितम्बर, २०१४

Monday, October 13, 2014

गद्य

जो सपने आपकी नींद उड़ा देते है और आपकी बेहतरीन जानकारी के अनुसार वो सही है तो उनकी आवाज़ सुनिए और उस रास्ते पर बढ़िए जो रास्ता वो बता रहे है .
हो सकता है आपको पहली बार में सफलता न मिले तो उस अस्थायी असफलता की परवाह मत कीजिये क्योंकि सफलता के महल तक पहुंचने के लिए हमेशा उस दरवाज़े से गुजरना पड़ता है जिस पर "असफलता" लिखा हुआ होता है. आपकी ताकत, आपका हौंसला हमेशा असफलताओं से बड़ा होता है !!
और हो सकता है जो काम आप कर रहे है उसके लिए आपको आलोचना सहन करनी पड़े तो उन आलोचकों की परवाह मत कीजिये जिन्होंने हर महान आदमी को अपनी कटुता से आहत किया होता है , अगर वो महान शख़्शियतें उनकी आलोचना सुनकर रुक जाती तो" महान " शब्द ही नहीं होता !
खुद पर भरोसा रखिये और अपने उस ख्वाब को साकार कीजिये जिसके लिए आपके अंदर ज्वाला धधक रही है !!!!
सुबोध- २३ सितम्बर,२०१४

Friday, October 10, 2014

113 . सही या गलत -निर्णय आपका !

अमीर यु हीं अमीर नहीं होता ( ३ )

 

आसान नहीं है

दायरे को तोडना
जो आरामदायक  क्षेत्र (comfort zone) है तुम्हारा
तब्दिल हो गया है आदत में .
-
चाहत तुम्हारी अमीर बनने की
कुछ नहीं भिखारी स्तर के अतिरिक्त .

-
चुनाव तुम्हारा अमीर बनने का
शामिल किये है अपने में
शर्तों का पुलिंदा ,
बेहतर है चाहत से
लेकिन सर्वश्रेष्ठ नहीं
क्योंकि तुम्हारी शर्तें
सुरक्षा देगी आदतों को .

-
समर्पण तुम्हारा अमीर बनने का
बनाएगा तुम्हें अमीर
क्योंकि यहाँ तुम कर रहे हो वो सब
जो ज़रूरी है अमीर बनने के लिए.
त्याग सारे आरामदायक   क्षेत्र का
बिना रुके,बिना थके.
केंद्रित प्रयास,
ज़ज़्बा सब कुछ झोंक देने का,
विशेषज्ञता आत्मविश्वास से भरी,
मानसिकता अमीरों वाली,
कोई अगर,कोई मगर
कोई बहाना, कोई शायद नहीं .
सिर्फ समर्पण,
और समर्पण
और विकल्परहित समर्पण
ज़िन्दगी के आखिरी  लम्हों तक....


सुबोध- मई २९, २०१४ 

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Saturday, October 4, 2014

गद्य

बड़ी अजीब है ख्वाइश पहचान की , घर-बाहर ,आस-पास,गाँव-शहर ,दूर-नज़दीक,देश-दुनिया हर तरफ हर शख्श एक जंग लड़ रहा है . अपनी पहचान की जंग !

कुछ अपनी पहचान दूसरों को उधार देकर बड़े ,बहुत बड़े बन जाते है , कुछ लोग दूसरों की पहचान उधार लेकर खुद को एक नाम देते है ,खुद की नज़र में बड़े बन जाते है उन्हें मुगालता ये भी होता है कि हम किंग मेकर है .

कुछ लोग चंद सिक्कों में खुद के हुनर को बेच देते है और उस हुनर को खरीददार की पहचान करार देते है , कुछ दूसरों की मेहनत को अपनी पहचान बना लेते है .

कुछ पैसों के बदले में या किसी दबाब में दूसरों को पहचानना बंद कर देते है और कुछ अनजान की पहचान भी क़ुबूल करते है .
क्या निराले खेल है पहचान के !

कुछ पहचान के लिए अजीब से कपडे पहनते है ,कुछ अजीब सी हरकतें करते है ,कुछ गाने का रिकॉर्ड बनाते है ,कुछ नाचने का ,कुछ बार -बार चुनाव लड़ने का ,कोई पढ़ने का !!जितने शख्स उतने तरीके .

चाहता हर कोई है कि मेरी पहचान हो ,तरीका चाहे अजीब हो या फिर ऐसा कुछ करना पड़े कि लोग कहे वाह भाई,वाह या गज़ब या बहुत खूब !!!

जंग पहचान की जो है !!!
सुबोध - अक्टूबर ३, २०१४

Thursday, October 2, 2014

बापू



जहाँ बादल इन्द्रधनुष बोते थे
वहां अब संगीनें बोई जाती है
मासूम बच्चे गुड्डे-गुड़िया से खेलने वाले
हथगोलों से खेलते है
पहाड़ी नदियों से बहा है इतना लहू
कि वहां के वाशिंदे
पानी की जगह लहू से मुँह धोते है
खेतों में खलिहानों में
सूनापन छाया है
मरे हुए ढोर-डांगर पड़े है
मोहब्बत का गीत गानेवाला मुल्क मेरा
किसी बुरी खबर पर रो भी नहीं पाता
कि एक हादसा और चला आता है
बापू, क्या यही
तुम्हारे सपनो का देश है ?

आज़ादी की कीमत में
तुमने तो हमें गुलामी खरीद दी
मालिकों के चेहरे भर बदले है
नीयत में तो खोट पहले से ज्यादा है
गावों से उसकी आत्मा निकाल कर
शहर के फूटपाथ पर
लावारिस बना कर लिटा दी गई है
गावों में भारत बसता है
अच्छा मजाक बन गया है
यहाँ मन की शांति
सोने की चिड़िया बन गई है
बापू, क्या यही
तुम्हारे सपनो का देश है ?

-सुबोध - अक्टूबर १,१९८५

Saturday, September 27, 2014

क्या सही है , क्यों सही है ??? ( भाग-5 )


बेटियों को अच्छा बताने के लिए ,क्यों बुरा बताऊ बेटों को ?
समाज ने बेटों को अहमियत दी , बेटी को नहीं दी तो उसका बदला इस तरह लिया जाए ?
बेटी को प्यार दिया, किसने ?
बहु को इज्जत दी , अधिकार दिए . किसने ?
माँ को सम्मान दिया इतना कि चरणो में स्वर्ग मान लिया . किसने ?
ये सब प्यार, इज्जत ,सम्मान देने में क्या मर्द ( बेटे ) शामिल नहीं थे ?
तो फिर सारे मर्द गलत कैसे हो गए ?
--
बहु-बेटी जलाई जाती है, घर से माँ-बाप बेदखल किये जाते है , ढेरों गलत व्यवहार किये जाते है ?
क्या अकेला मर्द करता है ?
--
सालों से कोई प्रताड़ित किया जाता है, आलोचना की जानी चाहिए उसकी
लेकिन आलोचना का मतलब विद्वेष नहीं होता !!!
किसी एक के अहम में हुंकार भरने के लिए
दूसरे का अहम रौंदना तो नहीं चाहिए , कुचलना तो उचित नहीं !
--
और क्या एक के बिना दूसरा पूरा है ?
राखी होगी, कलाई नहीं
कलाई होगी ,राखी नहीं
मांग होगी ,सिन्दूर नहीं
सिन्दूर होगा ,मांग नहीं
एक के बिना दूसरा अधूरा है
बात पूरेपन की करें अधूरेपन की नहीं !!!
सुबोध - २७ सितम्बर,२०१४

Friday, September 26, 2014

ज़िन्दगी इतनी हसीं नहीं रही अब
कि जीने की ख्वाइस बाकी हो !!
जिए जा रहा हूँ बेमन से
बुढ़ापे के अपने दर्द होते है
और अपनी पीड़ा
जिसे समेटे हुए खुद में
जिए जा रहा हूँ मैं
क्योंकि
उसे यकीं है खुद की मोहब्बत पर
कि जब तक वो जिन्दा है
उसकी जिम्मेदारियां मैं उठाऊंगा
और मैं उसका यकीन
बरक़रार रखना चाहता हूँ
आखिर उसने सालों साथ निभाया है
मेरी हर हार में साथ खड़ी रही है मेरे
हर धुप में साया बनकर
हज़ार वैचारिक मतभेद के बावजूद
अँधेरे में दीपक बनकर
वो हर फ़र्ज़ निभाया है उसने
जो एक पत्नी निभाती है !!!
सुबोध-२५ सितम्बर,२०१४

Monday, September 22, 2014

113 . सही या गलत -निर्णय आपका !

अमीर यु हीं अमीर नहीं होता ( ३ )

 

आसान नहीं है

दायरे को तोडना
जो आरामदायक  क्षेत्र (comfort zone) है तुम्हारा
तब्दिल हो गया है आदत में .
-
चाहत तुम्हारी अमीर बनने की
कुछ नहीं भिखारी स्तर के अतिरिक्त .

-
चुनाव तुम्हारा अमीर बनने का
शामिल किये है अपने में
शर्तों का पुलिंदा ,
बेहतर है चाहत से
लेकिन सर्वश्रेष्ठ नहीं
क्योंकि तुम्हारी शर्तें
सुरक्षा देगी आदतों को .

-
समर्पण तुम्हारा अमीर बनने का
बनाएगा तुम्हें अमीर
क्योंकि यहाँ तुम कर रहे हो वो सब
जो ज़रूरी है अमीर बनने के लिए.
त्याग सारे आरामदायक   क्षेत्र का
बिना रुके,बिना थके.
केंद्रित प्रयास,
ज़ज़्बा सब कुछ झोंक देने का,
विशेषज्ञता आत्मविश्वास से भरी,
मानसिकता अमीरों वाली,
कोई अगर,कोई मगर
कोई बहाना, कोई शायद नहीं .
सिर्फ समर्पण,
और समर्पण
और विकल्परहित समर्पण
ज़िन्दगी के आखिरी  लम्हों तक....


सुबोध- मई २९, २०१४ 

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Friday, September 19, 2014

गद्य

धन्यवाद, उन दोस्तों का जिन्होंने मुझे अपनी गलतियों से रूबरू करवाया ,बिना इस बात से डरे कि वो मेरी दोस्ती खो सकते है !!
पक्के दोस्त अच्छे हो ,सच्चे हो ये ज़रूरी नहीं !!
पक्के दोस्त आपकी हर बात का समर्थन करेंगे लेकिन अच्छे और सच्चे दोस्त आपका
सिर्फ वही समर्थन करेंगे जहाँ उन्हें आपकी भलाई नज़र आएगी.
दोस्ती जब चुनने की बारी आये तो पक्के नहीं अच्छे और सच्चे दोस्त चुनिए !
और हाँ, ध्यान रखियेगा आपके अच्छे और सच्चे दोस्त आपकी दोस्ती की परवाह नहीं करेंगे बल्कि उन्हें आपकी अच्छाई की, आपकी भलाई की परवाह होगी , इस दोस्ती के मूल में " दोस्ती जाए लेकिन दोस्त रहे " वाली भावना होती है क्योंकि उन्हें भरोसा होता है कि जिस दिन आप अपना अच्छा और बुरा समझने लगेंगे उस दिन दूरियां ख़त्म करकर वापिस लौट आएंगे !!!

सुबोध - १९ सितम्बर,२०१४

गद्य

ज़िन्दगी हमेशा वादा करती है कि मैं कभी भी आसान नहीं रहूंगी .मैं तुम्हारे सुख में चुनौती बनकर उभरूंगी कि आओ मुझे बरकरार रखो ,और तुम्हारे दुःख में तो संघर्षपूर्ण रहूंगी ही .

अब ये तुम पर है कि तुम आलोचना,हताशा ,निराशा ,पराजय को अपनी ताकत बनाकर उभरते हो -एक ज्वालमुखी की तरह या इन नकारात्मक भावों के नीचे दबकर अपने आप को बर्बाद कर लेते हो !!!

चाकू से सब्ज़ी भी काटी जाती है और आत्महत्या करने के लिए हाथ की नसें भी !

फर्क इस्तेमाल करने वाले की सोच और ताकत में होता है !!!!

सुबोध- १८ सितम्बर, २०१४

Wednesday, September 17, 2014

गद्य

काश!!
कुछ अनलिखे शब्दों को हम पहचान पाते !!!
मीरा ने पहचाना ,पंचतत्व में विलीन हो गई !!
हीर ने पहचाना फ़ना हो गई !!
माँ ने पहचाना वृद्धाश्रम पहुँच गई !!
प्रकृति ने पहचाना , रौद्र हो गई !!!!
और...
और...
और....
एक लम्बी लिस्ट और हम भावनाहीन इंसान !!
शब्दों को ओढ़ते है, शब्दों को बिछाते है,शब्दों को पहनते है
लेकिन शब्दों का अनलिखा नहीं समझते !!!!

 सुबोध- १७ सितम्बर , २०१४ 



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कुछ लम्हे ज़िन्दगी में हताशा देते है और हम उन नकारात्मक लम्हों के बहाव में बहते हुए खुद को नकारा मान लेते है ,हार स्वीकार कर लेते है ,सुनहरी ख्वाबों से खुद को दरकिनार कर लेते है . क्या उन लम्हों पर हम कुछ अलग तरीके से प्रतिक्रिया नहीं दे सकते ?

एक आईना जब टूटता है कुछ कहते है इसे कचरे में फेंक दो और कुछ कहते है आओ एक नया रॉक गार्डन बनाये !!!!

परिस्थितियां आपके बस में नहीं है लेकिन परिस्थितियों पर आप क्या प्रतिक्रिया करते है यह पूरी तरह आपके बस में है .

सुबोध- १७ सितम्बर , २०१४

गद्य

मैं गिर रहा हूँ बार-बार
उस मासूम बच्चे की मानिंद जो चलना सीखने के वक्त गिरता है ,उठता है,कदम बढ़ाता है ,गिरता है, उठता है , कदम बढ़ाता है और अंततः चलना सीख जाता है ,तब उस बच्चे को कोई नहीं कहता कि ये गिर रहा है बल्कि कहते है कि ये चलना सीख रहा है !!!
आज जब मैं गिर रहा हूँ बार-बार
लोग मुझे हारा हुआ ,चुका हुआ ,पराजित क्यों मान रहे है ?

  सुबोध- १६ सितम्बर ,२०१४



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महंगाई का असर जिंसों पर होता है ,वस्तुओं पर होता है ,चीज़ों पर होता है ; भावनाओं पर नहीं,जज्बातों पर नहीं -अगर उन पर भी महंगाई का असर होता तो क्या-क्या होता सोचकर रूह काँपने लगती है !!! या रब तू बड़ा रहम दिल है इंसान की मजबूरियां भी समझता है और नादानियां भी !!!
सुबोध- १५ सितम्बर, २०१४

Monday, September 15, 2014

माँ


मेरी तोतली जुबान को समझना आसान न था
लेकिन तुम समझती थी
बिना कुछ कहे मेरे रोने की असली वजह
तुम समझती थी
मेरी खाली जेब और गुस्से की बातें
तुम समझती थी
आँखों में बसी इश्क़ की खुमारी को
तुम समझती थी
ज़माने की बदलती हवा को
तुम समझती थी
मेरे बदलते रिश्तों का बदलना
तुम समझती थी
और
और मैं तुम्हे कहता था
तुम कुछ नहीं समझती, माँ !!!

मैं कल भी नासमझ था
आज भी नासमझ हूँ
मैं शब्दों को लिखता,पढता,समझता हूँ
और तुम
माँ ,तुम सब कुछ समझती हो !!!

सुबोध- १५,सितम्बर,२०१४

Saturday, September 6, 2014

गद्य

हम प्यार को हमेशा व्यापार क्यों बनाते है ? प्यार के बदले प्यार मिलेगा ये सोचकर प्यार करना खुद को तराजू के एक पलड़े में रखना नहीं तो क्या है ? कि आओ मैं तिज़ारत के लिए हाज़िर हूँ !!! कहते है प्यार किया नहीं जाता , हो जाता है - तो यहाँ तो हम सायास भाव-ताव कर रहे है कि मैं प्यार नामक शब्द तुम को दे रहा हूँ तुम बदले में क्या दोगे ? क्या " प्यार हो जाता है " कहावत गलत है , अब प्यार हो गया बदले में प्यार नहीं मिला तो ? क्या तराजू के एक पलड़े में रखा अपना मन वापिस उठा लोगे ? प्यार तो स्नेह का नाम है, त्याग का नाम है ,खुद की बर्बादी के बाद भी किसी को आबाद करने की चाहत का नाम है , उस बंदगी का नाम है जहाँ " मैं " पिघल कर बह जाता है , बह कर "तुम" में समां जाता है फिर उस से कोई फरक नहीं पड़ता वो तुम मेरा है या नहीं है !!
- सुबोध





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अगर आप गहराई में जाकर सोचे तो आप समझ पाएंगे कि हर आज़ादी खुद में एक बंधन ( इसे आप जिम्मेदारी पढ़े) होती है यह एक बंधन ही है कि आप अपनी संतान का भरण -पोषण कर पाते है तभी तो वो आपको संतान कहने का हक़ देती है .
यह भरण -पोषण एक बंधन है जिसके एवज में आपको संतान कहने का हक़ दिया गया है वो आपकी आज़ादी है - ये संसार के हर रिश्ते पर लागू होता है - इंसान और पैसे के रिश्ते पर भी !!!
- सुबोध

Friday, September 5, 2014

गद्य


शांति जिस कीमत पर भी मिले सस्ती होती है !!! हो सकता है हम आज इसे महसूस न करें , लेकिन जब जीवन में दौड़ते-दौड़ते थक जाएंगे , सत्ता हमारे हाथ से निकल कर नई पीढ़ी के हाथ में आ जाएगी और हमारे पास वक्त ही वक्त होगा - अपनी गुजरी यादों में जीने का ,की गई गलतियों को महसूसने का , पैसे के पीछे भागने का, थोपी हुई व्यस्तताओं के बारे में सोचने का , तब शायद , हाँ शायद तब हमे शांति अनमोल लगे ..हमे महसूस हो जिस के पीछे हम भागे क्या वो इतना महत्त्वपूर्ण था कि हमने पूरी ज़िन्दगी में अशांति पाल ली ..
सुबोध - ५ सितम्बर, २०१४




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तुम्हारा स्पर्श मुझे सहज कर देता है मेरा सारा गुस्सा, मेरी सारी नाराजगी काफूर हो जाती है ...ये कौनसी भाषा है कि गुस्सा हुए बेटे/ बेटी को सीने से लगाता हूँ और वे शांत हो जाते है , जाने कुछ हुआ ही नहीं हो !!! शब्दों से पैदा हुए विवाद / गलतफहमियां एक स्पर्श से दूर हो जाती है ....
सुबोध - ५ सितम्बर, २०१४

Thursday, September 4, 2014

कुछ टुकड़ों में


गिरकर संभलने वाले ही मंज़िल पाते है,
न संभलने वाले नाकामों में गिने जाते है .
तू हार मत, हारना तेरी फितरत नहीं,
मंज़िल पाने वाले ही विजेता कहलाते है
.

सुबोध- ४, सितम्बर , २०१४







---------


ज़माने की ठोकरों ने मजबूती दी है मुझे !
आज फिर एक ठोकर लगी है ,
लगता है अब मेरा वक्त आ गया !!!

सुबोध- ४ सितम्बर , २०१४







--------
 इंसान ज़िंदा रह गया
इंसानियत खो गई !!

ढूँढो उसे , शायद ज़िंदा हो
मुझमे या तुझमे !!! 


सुबोध- ४,सितम्बर,२०१४ 


-------------


उनके देखने के अंदाज़ ने
हमे अपनों से गैर कर दिया !!!!


सुबोध- ४ सितम्बर, २०१४




------------------



अनगिनित दिन, अनगिनित रातें
मेरे साथ चली है
मेरे साथ जली है
अश्कों से नहाईं है
तब निखरी है
गली-गली जिसकी चर्चा
हुई है, बिखरी है
तब कहीं जा के मोहब्बत कहलाई है
और मैं" दीवाना "

सुबोध ,- ४ सितम्बर, २०१४

Wednesday, September 3, 2014

112 . सही या गलत -निर्णय आपका !


                      मेरी पोस्ट 103 .106 .107 .108 .109 .110   में मैंने पैसे की बचत को लेकर विस्तार से लिखा है , इन सारी पोस्ट्स के बाद  सवाल ये आता है कि इस 10 % पैसे को मैनेज कैसे किया जाए . . आपकी सारी कमाई जो टैक्स कटने के बाद आपके घर में आती है सबसे पहले उस कमाई का 10 % आप अलग करें , उस पैसे के लिए आप एक अलग बैंक अकाउंट खोले . इस खाते का नाम आप वित्तीय स्वतंत्रता खाता रखे . यह खाता  सिर्फ निवेश करने और रेजिड्यूअल इनकम ( पोस्ट 56  देखें ) के श्रोत बनाने के लिए ही इस्तेमाल करना है , जब आप  निवेश और रेजिड्यूअल इनकम जैसे शब्दों से प्रायोगिक स्तर पर हकीकत में वाकिफ होते है ( पोस्ट 60  देखें ) सुचना के अलग अलग श्रोत से जुड़ते है - तो आप एक बिलकुल ही नई तरह की शब्दावली सीखते है .एक बिलकुल ही नया और विशाल कैनवास आपकी नज़रों के सामने होता है यहाँ आपको ठहरने और सीखने की ज़रुरत होगी खुद को संतुलित और व्यवस्थित करने की ज़रुरत होगी  ,ये ध्यान रखे आप संसार का सबसे कठिन काम करने जा रहे है - आप फाइनेंसियल एजुकेशन नामक तीसरी शिक्षा पद्धति सीखने जा रहे है -- खुद को बधाई दीजिये !!!!
                    कई तरह के फाइनेंसियल इंस्ट्रूमेंट्स होते है उन को जानिए, सीखिये, समझिए लेकिन खुद के लिए निष्ठुर मत बनिए , खुद को वक्त दीजिये .आपको एक प्रोसेस से ( पोस्ट 42 देखें ) गुजरना होगा जो कि प्रकृति का नियम है उसे नकारने का प्रयास न करें .
                         यह खाता आपके लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी होगा,जिसे आप हर महीने चेक कर सकते है इस अंडे का नाम रेजिड्यूअल इनकम( निष्क्रिय आमदनी ) है.  शर्त सिर्फ ये है कि आप अपनी ज़रुरत के लिए मुर्गी को  क़त्ल न करें . ये ध्यान रखें आपके अंदर अभी भी एक गरीब मानसिकता वाला कीटाणु जिन्दा है जो किसी भी विपरीत परिस्थिति में सबसे पहले अपनी बचत का इस्तेमाल करता है .
                           हर महीने इस खाते में  अपनी कमाई का 10 % जोड़ते रहिये और इस से पैदा होनेवाली   कमाई को भी इसीमे बढ़ाते रहिये ,आपने इस खाते को कभी इस्तेमाल नहीं करना है ,इस खाते में आपने निवेश करना है सिर्फ निवेश , अपने रिटायर होने तक आप इसमें निवेश करें .आप जब रिटायर  होगे तब इससे पैदा होने  वाली कमाई को आप इस्तेमाल कर सकते है उस स्थिति में भी आप मूल रकम को छूकर मुर्गी को कमजोर करने का प्रयास नहीं करेंगे क्योंकि कमजोर मुर्गी से कमजोर अंडे मिलते है. और इस तरह से पैसा हमेशा बढ़ता रहेगा और आपको कभी भी गरीबों वाली स्थिति से दो-चार नहीं होना पड़ेगा .
- सुबोध
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मेरी  पुरानी पोस्ट पढ़ने के लिए कृपया  इस लिंक पर जाएँ
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Tuesday, September 2, 2014

कुछ टुकड़ों में

मुझे पता है मेरी खासियत मैं हूँ
और खासियत आम नहीं होती !!!
सुबोध - २ सितम्बर ,२०१४

Monday, September 1, 2014

कुछ टुकड़ों में



अब वो एहसास न रहे
जो पहली मुलाकात में थे !
कुसूरबार मैं अकेला तो नहीं !!!
सुबोध- १ सितम्बर ,२०१४ 




--------



मैं तो कल भी गैर न था ,आज भी तेरा हूँ
तुझे खुद पे ऐतबार नहीं तो खता मेरी क्या है ?
सुबोध- १ सितम्बर ,२०१४

Sunday, August 31, 2014

111 . सही या गलत -निर्णय आपका !

मेरी पोस्ट  105 पर कुछ सवाल आये थे ,उसका जवाब--
मनीषजी , अंकुरजी 
1) मेरी पोस्ट 86 , 88 और 105 देखें ,समझे .
2) कोई भी काम सोचने और शुरू करने से पहले अपनी टीम से राय करें ,उससे डिस्कस करें .
 3) क्षेत्र के विशेषज्ञ से राय करें उसकी कंसल्टेंसी चार्ज उसे देवे , आपके पसंदीदा क्षेत्र पर वो एक विस्तृत सर्वे करकर आपको जो प्रोजेक्ट रिपोर्ट देगा आप उसे बराबर समझे उसके साथ एक प्रॉपर डिस्कस करें एक-एक पॉइंट पर स्पष्टीकरण  ले तभी काम शुरू करें , मैं इसे बेवकूफी के अलावा कुछ नहीं मानता कि आप कोई भी ऐसा फील्ड चुन  लेवे जिसमे आपका कोई दोस्त ,आपका कोई रिश्तेदार पैसा बनाने में सफल हो गया . ये ध्यान रखें हर व्यक्ति की अपनी-अपनी अलग विशेषता होती है ,हो सकता है उनमे जो क्वालिटी है वो आपमें नहीं हो.हर क्षेत्र में सफलता के लिए अलग-अलग क्वालिटी की ज़रुरत होती है .
4) विशेषज्ञ से रिपोर्ट आने के बाद और उससे डिस्कस  करने के बाद आप अपने लिए एक टू डू लिस्ट  बनाये ,जिसमे आप अपने जिम्मे क्या रखेंगे और अपनी टीम के जिम्मे क्या ,इसकी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करें , जब ये रिपोर्ट बन जाए तब आप देखे क़ि आपके जिम्मे आये हुए काम आप सफलता पूर्वक कर पाएंगे और कर पाएंगे तो कितने प्रतिशत सफलता मिल पायेगी-- इस पॉइंट को बराबर समझे और पूरी ईमानदारी से इसका जवाब देवे , इस मोड़ पर आकर आपका अवचेतन मन आपको इशारा कर देगा कि ये प्रोजेक्ट आपको करना चाहिए या नहीं- अवचेतन मन की आवाज़ को बराबर समझे जो बेहतरीन तर्क आपके पास अपने प्रोजेक्ट को लेकर हो उन्हें सोचे समझे और तब निर्णय करें ,अगर निर्णय हाँ में हो तो अपनी टीम के साथ बैठे और डिटेल में उस से भी चर्चा करें , अगर निर्णय ना में हो तो अपनी जिम्मेदारियां भी उनके साथ डिस्कस करें हो सकता है आपकी टीम में वे जिम्मेदारियां कोई  उठाने को तैयार हो जाएँ - यानी पूरी तरह तसल्ली होने के बाद ही प्रोजेक्ट पर काम शुरू करें . ये ध्यान रखे पैसा बड़ी मुश्किल से इकठ्ठा होता है , और ज़िन्दगी आपको खुद को साबित करने का मौका दे रही है उसे हल्के में ना लेवे ,वैसे कहा ये भी जाता है कि ज़िन्दगी में  रिटेक नहीं होते . सो पैसे की कदर करते हुए ही कोई निर्णय लेवे .
5) आज परिवर्तन इतने ज्यादा हो रहे है उन्हें निगाह में रखे और तभी कोई लाइन चुने मेरी 71 नंबर की पोस्ट देखे , सोचे और समझे कि  कल के स्टार प्रोडक्ट्स आज अपनी अहमियत खो चुके है, क़ल तक सिंगल प्रोडक्ट सिंगल यूज़  का ज़माना था आज मल्टी टास्किंग प्रोडक्ट्स का ज़माना है , कल तक आम आदमी के हाथ में पहने जाने वाली घड़ी और हर टूरिस्ट के हाथ में जरूरी समझा जाने वाला कैमरा मोबाइल में सिमट गया है.
 6) सबसे पहले ये देखें कि आपकी मानसिकता एम्प्लोयी वाली है या बिजनेसमैन वाली , दोनों की अलग अलग विशेषता होती है और दोनों ही एक-दूसरे की सोच को आसानी से नहीं अपना सकते . मालिक की एक दिन की छुट्टी पर झल्लाहट   और एम्प्लोयी की खुशियों के उदाहरण आपके आस-पास बिखरे हुए है उन्हें गौर करें और समझे . एक मज़दूर से बात करें और एक मालिक से दोनों से बात करने के बाद आप सोचे क़ि आप खुद को सोच-समझ के मामले में किस के नज़दीक पाते है अगर आप को लगता है कि मज़दूर सही है तो बिज़नेस करने से पहले अपनी मानसिकता सुधारने की कोशिश करें .
ये पोस्ट एक जवाब के तौर पर लिखी गई है इसलिए प्रोपरली  मैंने एडिट नहीं की है ,अगर कहीं अस्पष्ट हो रहा हूँ तो जानकारी देवे.  शुभकामनाये .
- सुबोध
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Saturday, August 30, 2014

ख्वाइशें

ख्वाइशें
काफी दिनों से ठहरी है
मेरे साथ मेरे घर में .

एक पुराने बिछड़े दोस्त की तरह
वक्त-बेवक्त
जगाती है मुझे
और पूछने लगती है
वही जाने- पहचाने सवाल
जो कभी चिढ़ाते है मुझे
और कभी लगते है खुद का वजूद

जब भी तन्हा होता हूँ
मेरे पास आकर बैठ जाती है
उसके आने से मन में उजाला
हो जाता है
तन्हाई उसकी बातों से
खिलखिलाने लगती है
एक नए सन्दर्भ के साथ

मुझे अहसास है
जब ये जुदा होगी मुझसे
मैं बिखरूँगा
और जब ये बन-संवरकर
आ जाएगी मेरी ज़िन्दगी में
मैं निखरूँगा.

सुबोध- ३० अगस्त, २०१४

Friday, August 29, 2014

110 . सही या गलत -निर्णय आपका !

      पैसा हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है , यह कड़ी मेहनत अमीर मानसिकता  के लिए अस्थायी होती है और गरीब मानसिकता  के लिए स्थायी . इसकी वजह ये है कि कड़ी मेहनत से कमाए हुए पैसे को लेकर दोनों के दृष्टिकोण अलग-अलग होते है - एक इसलिए कमाता है कि पैसे जमा कर सके और दूसरा इसलिए कि अच्छी ज़िन्दगी जी सके ,एक का दृष्टिकोण बड़ी खुशिया हासिल करने पर होता है और दूसरा बड़ी खुशियों के लिए छोटी-छोटी खुशिया नकार नहीं सकता ,एक आनेवाले कल को देखता है और दूसरा आज में जीता है . और अंततः होता ये है कि एक के पास कुछ पैसे जुड़ जाते है और दुसरे के पास नहीं जुड़ते .
                    असली खेल यही से शुरू होता है -- पैसा ऊर्जा का एक रूप है ,जिस तरह काम ऊर्जा का एक रूप है . गरीब मानसिकता काम से ऊर्जा यानि पैसा पैदा करती है  जबकि अमीर मानसिकता पैसे से ऊर्जा यानि पैसा पैदा करती है ,सीधे शब्दों में कहुँ तो गरीब मानसिकता अब भी अपनी कड़ी मेहनत से पैसा पैदा करती है जबकि अमीर मानसिकता अपने इकट्ठे किये हुए पैसे के दम पर एम्प्लोयी रखती है जो उसके लिए कड़ी मेहनत करकर पैसा पैदा करता है यानि उसका पैसा उसके लिए पैसा पैदा करता है  और यहीं से खेल दिलचस्प  होना शुरू हो जाता है . अमीर मानसिकता अब भी जी-तोड़ मेहनत करती है पैसा बचाती है और बचे हुए पैसे के दम पर  एम्प्लाइज की संख्या बढाती जाती है और उसके  द्वारा पैसे के दम पर  करवाई हुई कड़ी मेहनत  ढेर सारा पैसा पैदा करने लगती  है लेकिन गरीब मानसिकता द्वारा की हुई कड़ी मेहनत ढेर सारा पैसा  पैदा नहीं कर पाती नतीजतन अमीर मानसिकता अमीर बन जाती है और गरीब मानसिकता गरीब  रह जाती है .
                    ये साधारण सी बात गरीब मानसिकता की समझ में नहीं आती कि शुरू में सारा खेल साधारण से त्याग का है ,अपनी इच्छाओं का,छोटी-छोटी   खुशियों का,अपनी सुविधाओं के त्याग का, जो आगे जाकर दिमागी तिकड़म का,बुद्धि कौशलता का और अमीरी का खेल बन जाता है . और गरीब मानसिकता के लोग हारे हुए खिसियाए खिलाडी की तरह जीते हुए खिलाडी में कमियाँ निकालते है अपनी इतर अच्छी क्वालिटीज की बात करते है , गालियों और हाथापाई पर उतर आते है ,सब कुछ करते है - एक अच्छे खिलाडी की तरह अपनी हार स्वीकार कर कर नए सिरे से जीत के लिए जुटने के अलावा.  नतीजे में जो होना चाहिए वही होता है कड़ी मेहनत गरीब मानसिकता के लिए स्थायी बन जाती है और अमीर मानसिकता के लिए अस्थायी.
- सुबोध
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Thursday, August 28, 2014

109 . सही या गलत -निर्णय आपका !

              पैसे के प्रबंधन के बारे में जब गरीबों से बात की जाती है तो उनका जो जवाब होता है वो ये होता है कि " जब मेरे पास बहुत सारा पैसा होगा तब मैं पैसे का प्रबंध करना शुरू  करूँगा ."
                         अगर आप गहराई में जाए तो आप समझ पाएंगे कि उनके लिए पैसे का प्रबंधन एक समस्या के अलावा कुछ भी नहीं है , अमूनन ये तत्काल संतुष्टि वाली श्रेणी के लोग है  ( पोस्ट ९७ देखें) और ये लोग पैसे का प्रबंध करने की बजाय   उसे खर्च करने वाले होते है , ये प्रबंध  नामक समस्या को  एक गलत नंबर के चश्मे से देखते है .
                     पहली बात  आप के पास पैसा तब होगा जब आप उसका प्रबंध करना शुरू करोगे  ये तो कहना ही गलत है कि मेरे पास पैसा ज्यादा होगा तो मैं इसका प्रबध करूँगा , ये कहना तो बिलकुल ऐसा ही है कि  एक कमजोर आदमी  ये कहे   कि मेरे मस्सल्स मजबूत हो जायेंगे तो मैं जिम ज्वाइन करूँगा  , जबकि हकीकत ये है कि जिम ज्वाइन करने से उसके  मस्सल्स मजबूत होंगे. परिणाम हमेशा मेहनत करने के बाद मिलते है ,मेहनत करने से पहले परिणाम  चाहना  एक अच्छे चुटकुले के अलावा क्या है ?
                  दूसरी बात - प्रकृति का एक साधारण सा नियम है  " दिया उसे जाता है जिसकी सम्हालने की क्षमता होती है " अगर आप 100 - 200  रुपये भी नहीं सम्हाल पा रहे हो तो चिंता न करें प्रकृति के इस साधारण से नियम की अवहेलना नहीं होगी और आपको हज़ारों - लाखों रुपये नहीं दिए जायेंगे क्योंकि प्रकृति जानती है कि ये कमजोर प्राणी है इसकी क्षमता छोटी चीज़ों को सम्हालने की नहीं है तो ये बड़ी कैसे सम्हालेगा .धन्यवाद प्रकृति, तुम बड़ी दयालु हो .
               तीसरी बात - एक प्रोसेस होता है उस से गुजर कर ही आप किसी काबिल बनते है ,बिना उस प्रोसेस से गुजरे किसी भी तरह की सफलता पाना और उस सफलता को बरकरार रख पाना संभव नहीं होता और वो प्रोसेस है  " बनाना-बिगाड़ना-फिर से बनाना " (पोस्ट 42  देखें ) जिंदगी में सीढ़ियां नहीं होती जो सीधी ऊपर जाती है ,यहाँ तो पर्वतों के साथ मैदान और खाइयां  होती है और हर पथिक को ,हाँ हर पथिक को इन्ही टेढ़े -मेढ़े अनगढ़  रास्तों से गुजरना होता है तब वो बांछित  को हासिल कर पाता है  .
               अगर आप ये समझते है कि पैसा आएगा और आता रहेगा और ढेर सारा हो जायेगा तो मैं इसका प्रबंध करना शुरू करूँगा तो मेरी शुभकामनाएं आपके साथ है कि  "भगवान करें  ऐसा ही हो ",लेकिन मैं भी जानता हूँ और मेरा भगवान भी कि ये एक शुभकामना के अलावा कुछ नहीं है .
- सुबोध

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मेरी पुरानी पोस्ट्स देखने के लिए कृपया इस  लिंक पर करें -
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Wednesday, August 27, 2014

प्यार का किस्सा


तुमने जब थामा मेरा हाथ
आंसुओं की हंसी फ़िज़ा में तैर गई

मन के किनारों पर
भावनाओं के हुजूम में
एक-एक किस्सा
एक-एक लम्हा
सर पर हाथ रखने लगा
आशीष की तरह

डूबता सूरज
नारंगी बिंदी बन
चस्पा हो गया
मेरे माथे पर
मैं खिल गई
महक गई
पूनम की रात में
रात रानी सी

लिखने लगी जब
प्यार का किस्सा
मेरी कलम
तुम्हारे नाम पे अटक गई !!!

सुबोध - २७ अगस्त, २०१४

Tuesday, August 26, 2014

मेरा इश्क़ मेरा नसीब



इश्क़ का कुरता मैला हो गया
और मेरी जीभ में जख्म
इसकी पाकीज़गी बताते-बताते
मगर निगोड़ा ज़माना
मोहब्बत को
ज़िन्दगी की अमावस समझता है
रूह का नूर नहीं .

शायद खुद गुजरे है
उस नाकाम मोहब्बत के मकाम से
आग के तूफ़ान से
कि ज़माने को बचाने लगे है
मोहब्बत के नाम से .

ऐ ! मौला
तेरी छत के नीचे
वादों की छत बना रहा हूँ
ठिठुरते इश्क़ को आगोश की गर्मी
शायद कुछ सुकून दे
और सूरज सा हौंसला
मेरे ख्यालो को सच्चाई दे.

मेरे मौला !!
तू गवाह रहना
जो हारे है उनका भी
और मेरी जीत का भी
उनकी नाकामी मेरा नसीब क्यों बने
क्यों न मेरी जीत मेरी ज़िन्दगी बने ?

  सुबोध - २६ अगस्त ,२०१४

Monday, August 25, 2014

108 . सही या गलत -निर्णय आपका !

             जब गरीबों से पैसे के प्रबंधन की बात की जाती है तो आम तौर पर उनका जवाब होता है कि मेरे पास इतने पैसे है ही नहीं कि उनका प्रबंधन करूँ ,मुश्किल से दो वक्त की रोटी जुटा पाता हूँ .

                   उनको जो  सलाह हो सकती  है वो ये है कि ऐसी हालत में भी उनको अपनी कमाई का 10 % हिस्सा  अपने भविष्य के लिए अलग से निकाल कर रख देना चाहिए .बाकी बचे  90 % में गुजारा करना चाहिए , एक महीने में  वे 90 % में गुजारा करना सीख जायेंगे और अगर उन्होंने अपनी इच्छाओं पर एक महीने तक  कंट्रोल कर लिया तो वे आगे भी कर सकते है . बात इच्छाओं को मारने की नहीं है बल्कि  बात पैसे के प्रबंधन की आदत की है, उस आदत की  जिस से अमीरी का दरवाज़ा खुलता है .

                कुछ गरीब कह सकते है कि 10 % निकालने के बाद हमें भूखा सोना पड़ेगा ,मेरा जवाब होगा- हाँ , आप भूखे सो जाइये और इस कहावत को याद कीजिये " भूखा पेट चिल्लाता है " और ये चिल्लाहट आपको अतिरिक्त पैदा करने को मजबूर करेगी , अतिरिक्त सोचने को मजबूर करेगी ,आपके कम्फर्ट जोन को तोड़ने को आपको विवश करेगी आपको नया कुछ करने को मजबूर करेगी ,दिमाग और जिस्म में लगी जंग हटाएगी .

                बात कुल मिलाकर पैसे के प्रबंधन की आदत की है जैसा कि मैंने अपनी पहले की पोस्ट में लिखा था बचत को उत्सव नहीं आदत बनाइये .
-सुबोध
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Sunday, August 24, 2014

107. सही या गलत -निर्णय आपका !



                  मालिक वो होता है ,जो हासिल चीज़ों को सुव्यवस्थित तरीके से प्रबंधित करता है ,जो अपनी चीज़ों को बराबर प्रबंधित नहीं करते , वे जल्दी ही उन चीज़ों को या तो नष्ट हो जाने देते है या अपना मालिकाना हक़ खो देते है ,पैसा  इस साधारण से  सिद्धांत  का अपवाद नहीं है .
                  वित्तीय सफलता ( अमीर ) और वित्तीय असफलता (गरीब ) के बीच का सबसे बड़ा फर्क पैसे के प्रबंधन का होता है .
                 अमीर लोग पैसे का प्रबंधन करने में माहिर होते है और उसकी वजह मैंने अपनी पोस्ट 103  और  106  में बताई थी .
               गरीब लोगों द्वारा  पैसे का प्रबंधन न करना उनकी आधी-अधूरी सोच का नतीजा हो सकता  है या फिर उनकी गलत  कंडीशनिंग इसकी वजह हो सकती है - गलत कंडीशनिंग से छुटकारा पाने का तरीका वे  मेरी पोस्ट 96  में देख सकते है ,और सोच विकसित करने के लिए उन्हें खुद पर कठिन मेहनत करनी पड़ेगी, उनकी सहायता सिर्फ ये हो सकती है वे  मेरी सारी पोस्ट देखे और समझे , इसके अलावा भी मार्किट में बहुत कुछ उपलब्ध है - करना तो उन्हें खुद ही पड़ेगा .

- सुबोध
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Saturday, August 23, 2014

क्या सही है , क्यों सही है ??? ( भाग-4 )

एक तूफ़ान जो गुजरा मेरे जिस्म पर से
मेरी मासूमियत उड़ा ले गया
मौत से भी खौफनाक
ज़िन्दगी छोड़ गया
जिनकी बाँहों में खेली-कूदी
उनकी निगाहों में गलीज़ हो गई
बाप के कंधे झुक गए
माँ की आँखों में पानी भर गया
भाई कहीं कमजोर हो गया
सखी सहेलियाँ ,सारी गलबहियाँ
अजनबी हो गई.
फुसफुसाहट अपनी हो गई
खिलखिलाहट  पराई हो गई
खिड़की जो खोली थी
सूरज ने रोशनी की
अमावस की काली रात हो गई
  उफ़ !
मैं औरत
औरत  न रहकर 
 जिस्म हो गई
बलात्कार झेला हुआ एक नाम हो गई
बदन का पानी तेजाब बन
जलाने लगा खुद को
पड़ोसियों की कानाफूसी
पीड़ा का पेड़ हो गई
यारब ! ये क्या हो गया
कल का फूल
आज काँटा हो गया
होठों  की हँसी
आँखों की बरसात हो गई
ज़माने में दिखाने को
मेरा दर्द अपना हो गया
और झेलने को
पराया हो गया
औरत होने की पीड़ा
मेरा  नसीब हो गई
माँ - बहन की कोख इज्जत हो गई
और मेरी कोख गरम गोश्त हो गई
रौंदी मैं गई
और उफ़ !
उफ़!!
 गुनाहगार भी
मैं ही हो गई   !!

सुबोध- २४ अगस्त,२०१४

Friday, August 22, 2014

106. सही या गलत -निर्णय आपका !

हकीकत में अमीर गरीबों से ज्यादा स्मार्ट नहीं होते है. बस उनकी पैसे से सम्बंधित आदतें गरीबों से अलग और पैसे को बढ़ाने में मददगार होती है  जो मूल रूप से उनकी अतीत की कंडीशनिंग से जुडी होती है .

                                       गरीबों के लिए बचत या निवेश उत्सव की तरह होते है जबकि अमीरों के लिए हर रोज़ किये जानेवाले  कामों की तरह एक आदत.और ये आदत होना ही उन्हें परफेक्शन देता है जो गरीबों के हिस्से में नहीं आती .

                         अगर आप पैसे का उचित प्रबंधन नहीं करते है तो दो बातें हो सकती है ,पहली आपके दिमाग में इसकी प्रोग्रामिंग ही नहीं हुई है और दूसरी शायद आप ये जानते ही नहीं है कि पैसे का सही और उचित प्रबंधन कैसे किया जाता है .पहली बात आपकी कंडीशनिंग से जुडी है(इसके लिए  मेरी पोस्ट 91 ,92 ,96  देखें )और दूसरी आपकी शिक्षा से जुडी है ( मेरी पुरानी पोस्ट पढ़े ).

                      
                        दुर्भाग्य से स्कूलों  में मनी मैनेजमेंट नाम का कोई सब्जेक्ट नहीं होता है ,आपकी स्कूल का मुझे नहीं पता ,मेरी स्कूल में नहीं था.  हमारे किसी भी  स्कूल टीचर ने हमें कभी भी पैसे के बारे में नहीं सिखाया अगर हम उनसे कभी पैसे के बारे में पूछ भी लेते थे तो उनका हमेशा यही जवाब होता था कि अपने सब्जेक्ट को बराबर याद करो तुम अभी इस बारे में सीखने के लिए बहुत छोटे  हो - और स्कूल क्या कॉलेज छोड़ने तक हम छोटे ही रहे ,बाहर की दुनिया ने हमे कब बड़ा बनाया पता ही नहीं चला ,हाँ,किस खूबसूरती से हमारे टीचर्स  ने हमसे अपनी गरीबी और पैसे की नासमझी छुपाई ये अब समझ में आता है .
- सुबोध
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Thursday, August 21, 2014

105. सही या गलत -निर्णय आपका !

एक सवाल
Ratan Arjun
Aug 9th, 2:07pm
Dear sir, mane job chod kr do bar apna kam suru kiya lakin dono bar asaflta mili . m construction line m hu or m ab kuch nya krna chahta hu . pls mujhe koi rasta btao sir..


मेरा जवाब

रतनजी,
दो बार की असफलता के बाद भी आप तीसरी बार कोशिश करना चाहते है ,आपके जज्बे और सोच को सलाम !
कंस्ट्रक्सन लाइन में आप क्या करते है ,ये आपने स्पष्ट नहीं किया ,अगर आप स्पष्ट करते तो शायद में बेहतर तरीके से जवाब दे पाता.
सर , आप मेरे पुराने पाठक है और मेँ ये मानकर चल रहा हूँ कि आपने मेरी सारी पोस्ट पढ़ी और समझी है ,अगर हो सके तो उन्हें दुबारा पढ़  लेवे, कुछ चीज़े जितनी ज्यादा बार रिपीट की जाती है उनके बारे मेँ आपका  दृष्टिकोण  उतना ही ज्यादा  साफ़-सुथरा होता जाता है .
मैं ये मानकर चल रहा हूँ कि दो बार की असफलता ने आपको बहुत कुछ सिखाया होगा ,ध्यान रखियेगा वे असफलताएँ नहीं है वे आपकी आर्थिक आज़ादी की बैकबोन है और ताउम्र आपकी बेस्ट टीचर रहेगी .
सर, कोई  नया व्यवसाय शुरू करने से पहले इन बातों का  ध्यान रखे -   
 1)अपने शौक को -उस शौक को जिसे आप जूनून की हद तक चाहते है ,व्यवसाय बनाने की कोशिश करें ,अगर आप ऐसा कर पाते है तो ये आपकी ग्रोथ को क्वांटम लीप दे देगा क्योंकि तब आप बिना थके घंटो कार्य कर पाएंगे , नये - नये आइडिया के साथ. 
2) कोई भी व्यवसाय चुने तो कोशिश करें ऐसा व्यवसाय चुनने की जिसमे कई तरीके से कमाने के मौके हो .
3) जिस से आम आदमी जुड़ सके,जो उनकी ज़रुरत का हो ऐसे व्यवसाय को करें .
4) सुचना क्रांति युग में बहुत से व्यवसाय अगर अपडेट नहीं किये जाते है तो उनकी ज़िन्दगी  3 -4  साल की ही होती है , अगर आप ढीले-ढाले या टालू राम  नेचर के  हो तो ऐसे किसी भी व्यवसाय में नहीं उतरे , बाकि अगर ऐसे नेचर के हो तो मेरे ख्याल से आपको व्यवसाय ही नहीं करना चाहिए , इस मानसिकता के लोगों के लिए तो जॉब ही  ठीक रहता है ,क्योंकि व्यवसाय में मिलने वाला  पुरूस्कार आपको आपके प्रदर्शन के आधार पर दिया जाता है, व्यवसाय में दिए गए समय के आधार पर नहीं दिया जाता.  
5) जिस व्यवसाय में विकास की सम्भावनाये न हो , जिसका मार्किट सिमट रहा हो ,जो धारा के विपरीत हो ऐसा व्यवसाय न करें .
6 ) जिस व्यवसाय में मार्जिन बहुत कम हो ,ऐसा व्यवसाय न करें , क्योंकि मार्जिन कम होने का एक अर्थ ये होता है कि यहाँ कम्पीटीशन ज्यादा है . और आप नये होने की वजह से बहुत से ऐसे हथकंडो से वाकिफ ही नहीं होंगे जिनकी वजह से कॉस्टिंग कम करकर मार्किट   में माल डाला जा सके . ये ध्यान रखे पुराना व्यवसायी अपनी गुडविल की वजह से हल्का माल भी मार्किट में उतारता है तो उस पर उंगली नहीं उठती जबकि आप नये होने की वजह से लाइम लाइट में रहेंगे और आपकी कोई भी गलती आपको मार्किट में टिकने नहीं देगी . 
7) ऐसा व्यवसाय शुरू करें जिसमे  शुरू में आपको अपना पैसा कम से कम लगाना पड़े ,अगर शुरू में ही आपने अपना पूरा पैसा लगा दिया और व्यवसाय नहीं चला तो किसी दुसरे व्यवसाय के लिए आपके पास डाउन पेमेंट भी नहीं बचेगा .
जो कुछ भी जब भी शुरू करें अपनी टीम से और इस क्षेत्र के विशेषज्ञ से जरूर राय करें ,अगर उसे पेमेंट देना पड़े तो देवे , कंसल्टेंसी के पैसे बचाने की कोशिश करना मेरी निगाह में बेवकूफी है .
कोई भी नया व्यवसाय शुरू करने के लिए इतनी ज्यादा बातें है कि एक पोस्ट में सब कुछ कवर करना संभव नहीं है .
बाकि किसी और पोस्ट में ,
शुभकामनाएं .
-सुबोध
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Wednesday, August 20, 2014

104. सही या गलत -निर्णय आपका !


अमीर यु हीं अमीर नहीं होता ( २)

दायरा
जो बनाते है आप
निर्भर है उसकी उपलब्धि
आपके समर्पण पर ...
-
दायरा
मेंढक का
होता है तालाब,
और
बाज़ का
आकाश,
सरहदों से आज़ाद आकाश .
-
मेंढक
जब सोचता है
बाज़ बनने की,
रोकती है उसे
उसकी मानसिकता,
जहाँ मौजूद है
फ़ेहरिश्त खतरों की .
-
त्याग है
आरामदेह दायरे का,
ख़ौफ है
अपनी वास्तविकता बदलने का ,
मेहनत है
अपनी काबिलियत के विस्तार की,
और जहाँ ज़रूरत है
एकाग्रता की ,
साहस की,
विशेषज्ञता की ,
शत प्रतिशत प्रयास की ,
और सबसे बड़ी
बाज़ की मानसिकता की.
.-
और देखकर
इस फ़ेहरिश्त को
कुछ मेंढक
मेंढक रह जाते है
और कुछ मेंढक
बाज़ बन जाते है .
-
अपना-अपना दायरा है
चाहत का,
चुनाव का,
समर्पण का.
क्योंकि
दायरा
जो बनाते है आप
निर्भर है उसकी उपलब्धि
आपके समर्पण पर ..

सुबोध- २२ मई , २०१४

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Photo: अमीर यु हीं अमीर नहीं होता ( २)दायराजो बनाते है आपनिर्भर है उसकी उपलब्धिआपके समर्पण पर ...-दायरामेंढक काहोता है तालाब,औरबाज़ काआकाश,सरहदों से आज़ाद आकाश .-मेंढकजब सोचता हैबाज़ बनने की,रोकती है उसेउसकी मानसिकता,जहाँ मौजूद हैफ़ेहरिश्त खतरों की .-त्याग हैआरामदेह दायरे का,ख़ौफ हैअपनी वास्तविकता बदलने का ,मेहनत हैअपनी काबिलियत के विस्तार की,और जहाँ ज़रूरत हैएकाग्रता की ,साहस की,विशेषज्ञता की ,शत प्रतिशत प्रयास  की ,और सबसे बड़ीबाज़ की मानसिकता की..-और देखकरइस फ़ेहरिश्त कोकुछ मेंढकमेंढक रह जाते हैऔर कुछ मेंढकबाज़ बन जाते है .-अपना-अपना दायरा हैचाहत का,चुनाव का,समर्पण का.क्योंकिदायराजो बनाते है आपनिर्भर है उसकी उपलब्धिआपके समर्पण पर ..सुबोध-  २२ मई , २०१४

Tuesday, August 19, 2014

103 . सही या गलत -निर्णय आपका !

103 . सही या गलत -निर्णय आपका !

                   गरीब मानसिकता के लोग एक रुपये को सिर्फ एक रूपया मानते है जिसके बदले में वे लोग कोई चीज़ खरीदकर तत्काल संतुष्टि चाहते है उनकी निगाह में ये ऐसा गेहूँ है जिसकी  रोटी बननी है और उसे खाना है   जबकि अमीर मानसिकता के लोग इसे एक रूपया नहीं मानते , वे इसे ऐसा योद्धा मानते है जिसके दम पर उन्हें वित्तीय स्वतंत्रता हासिल होगी .उनके लिए ये गेहूँ एक बीज है जिसे बोकर वे ढेरों गेहूँ  पाएंगे -और उन ढेरों गेहुंओं  को बोकर और ढेरों गेहूँ पाएंगे- चक्रवृद्धि व्याज की तरह.
  

                                      गरीब मानसिकता  एक रुपये की कीमत आज में देखती  है जबकि अमीर मानसिकता उस एक रुपये की कीमत आज में नहीं कल में देखती  है - और ये कल में देखना ही उसे निवेश करने को उत्साहित करता है .
                        सिर्फ एक हलकी  सी कैलकुलेशन करें कि आज के  25  रुपयेकी  कीमत  20  साल बाद 10 % सालाना वृद्धि  के बाद क्या होगी ? संभवतः आपका डेरी मिल्क या आइसक्रीम खाने का नजरिया बदल जाए. .... या तो आप खाएंगे या नहीं खाएंगे और दोनों ही स्थितियों में जो तर्क देंगे उन तर्कों को बड़े गौर से सुने और समझे . ये तर्क, तर्क नहीं है बल्कि आपकी मानसिकता है जो आपके  25  रुपये का  भविष्य निर्धारित करेगी .......और आपके 250 ,2500 ,25000 ,250000 ,2500000 ,25000000  का भी .
-सुबोध 

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Monday, August 18, 2014

102 . सही या गलत -निर्णय आपका !

हम सभी में दो भावनाएँ होती हैं डर और लालच .
पैसा न होने के डर से हमे कार्य करने की प्रेरणा मिलती है और पैसा हाथ में आने के बाद लालच की भावना जाग जाती है ,ये भी हमारे पास होना चाहिए और वो भी . लालच -इसे इच्छा भी कह सकते है, का कहीं कोई अंत नहीं होता , सो आदमी एक चक्र में फंस जाता है पैसा कमाओ इच्छाएं पूरी करो और कमाओ और इच्छाएं पूरी करो और कमाओ --- ये चक्र कहीं रुकता नहीं है .इसे पढ़े-लिखे लोग कोल्हू का बैल, रेट रेस  कहते है कि सब कुछ किया लेकिन अंततः वही के वही रह गए - कमाने से बिल चुकाने तक .
 वित्तीय स्वतंत्रता आपको इस रेट रेस से आज़ादी दिलाती है .
- सुबोध
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Sunday, August 17, 2014

आओ कान्हा ,आओ !!



तंग न करो कान्हा
न बजाओ बांसुरी
मैं बहुत दुखी हूँ
अभी हरे है
कई घाव
दर्द से कराहती आत्मा के साथ
कैसे नाचूँ
कैसे झूमूँ
तुम्हारी बांसुरी की तान पर ...

कुछ करो कान्हा
अब झूट-मूट का
तुम्हारा जन्मदिन मनाने का नहीं
सच में तुम्हारा
अवतार का वक्त आ गया है .
आओ कान्हा ,
आओ !!
जन्मों नहीं
अवतार लो !!!
अब तो
पीड़ित मानवता के दर्द हरो !!!

सुबोध- अगस्त १७, २०१४ जन्माष्टमी पर