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जनवरी, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कुछ टुकड़ों में

मेरी जेब की खनखनाहट क्यों कर चुभती है तुम्हे , जिंदादिली के एवज़ में चंद सिक्के मिले है मुझे . सुबोध- १४ जनवरी, २०१४ ------------------ सारे तीज-त्योंहार तुम्हारे थे , तुमने मनाये थे , मैं अपने घर से दूर था इतना कि सिर्फ ख्याल मेरे पास थे सुबोध- १४ जनवरी, २०१४ ----------- तुम्हारा सुकून तुम्हारे साथ था और मेरी उलझने मेरे साथ तुम दस्तरखान पर बैठे थे और मैं रिज़क कमा रहा था सुबोध- १४ जनवरी, २०१४  

29 . ज़िंदगी – एक नज़रिया

हो सकता है ये छोटा सा नज़र आने वाला अवसर ही बड़ा अवसर हो और आप इस ताक में बैठे हो कि कोई बड़ा अवसर मिले और मेरे वारे- न्यारे हो जाये . अगर गौर करें तो अवसर सिर्फ एक तटस्थता भरी परिस्थिति है वे आपके प्रयास है जो इनमे रंग भरते है या इन्हे बदरंग करते है जिस तरह एग्जामिनेशन हॉल में मिला हुआ पेपर एक तटस्थता भर है आपके प्रयास अगर उचित स्तर के है तो आपके सामने ये बेहतरीन अवसर है अन्यथा ये एक छोटा अवसर था जिसे आपने कोई ईज्जत नहीं दी और बदले में आपकी बेईज्जती हो गई !! क्या ज़िन्दगी में आपकी हर समस्या के साथ यही नहीं हो रहा है ? आप बाहर को सुधारने की कोशिश कर रहे है ,या ये उम्मीद कर रहे है कि बाहर सुधर जायेगा और आपके लिए बेहतरीन अवसर पैदा करेगा - आपके अंदर क्या है आप इसे जानना और समझना ही नहीं चाहते . ये जानिये और समझिए जब तक आप अंदर से काबिल नहीं बनेंगे बाहर चाहे जितने बड़े अवसर हो आप नाकाम ही रहेंगे . सचिन तेंदुलकर के लिए जो शॉट आसान है आपके लिए वो मुश्किल है इसकी वजह "बॉल मुश्किल थी" नहीं है बल्कि ये है कि सचिन की तैयारी अंदर से है जिसे उसने लगातार के अभ्यास...