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28 . ज़िंदगी – एक नज़रिया

ज़िन्दगी जब मुश्किल हो जाये ,इतनी मुश्किल कि तुम हौंसला हारने लगो तो गौर करना और देखना डूबते हुए सूरज को कल वो वापिस लौटेगा कुछ सुस्ताने के बाद ,नए सिरे से इस संसार को रोशन करने ; तो गौर करना और महसूस करना जिस्म से छूटती हुई सांस को , वो छोड़ी इसलिए जाती है कि कार्बन डाई ऑक्साइड निकाल सके और नई ऊर्जा के लिए ऑक्सीजन ले सके . ज़माने में कुछ ऐसे लोग थे जिन पर तुम्हे अटूट भरोस ा था और वे तुम्हारे इस मुश्किल दौर में तुम्हारे साथ नहीं थे ( अच्छा हुआ कार्बन डाई ऑक्साइड निकल गई - वे तुम्हारी ज़िन्दगी के बैरियर थे ) लेकिन कुछ ऐसे लोग भी थे जिनसे तुम्हे कोई उम्मीद नहीं थी फिर भी वे जाने- अनजाने तुम्हारे साथ खड़े थे . और शुक्रिया अदा करना नीली छतरी वाले का कि उसने तुम्हे मौका दिया अपने पंख पसारने का, तुम्हारे अनुभव के संसार को समृद्ध करने का , असली और नकली की पहचान करने का ,बंद अँधेरे विश्वास की गलियों में भटकते मन में उजाला भरने का ,और शुक्रिया अदा करना उन साथियों के लिए जो मुश्किलों के दौर में तुम्हारे साथ खड़े थे कुछ पुराने और कुछ नए साथी . तुम अपनी ज़िन्दगी की मुश्किलें मत देखन...

27 . ज़िंदगी – एक नज़रिया

गलतियां हर इंसान करता है - अगर वो ज़िंदा है तो ! लेकिन फर्क इससे पड़ता है कि आपने उन गलतियों पर प्रतिक्रिया क्या और कैसे की है ,आपने गलती होने के बाद अपना माथा पीटा है या उन गलतियों से सबक लिया है .आपने आगे से कोई गलती न हो जाए इस डर से चलना ही बंद कर दिया है या बार-बार गलती कर कर, गिर-गिर कर साईकिल चलाना सीख लिया है . अगर आपने साईकिल चलाना सीख लिया है तो जाहिर सी बात ह ै उन दिनों आपके अंदर कोई एक आग जल रही थी ,कोई एक लगन लगी थी जो बार-बार गिरने ,चोट लगने के डर से ज्यादा ताकतवर थी . और अगर आपने नहीं सीखा है तो इसकी वजह ये नहीं थी कि साइकिल लम्बी थी या पेडल तक आपके पैर नहीं पहुँच पा रहे थे या पीछे से पकड़ने वाला सही नहीं था या आपको सिखानेवाला कोई भी नहीं था बल्कि असली वजह ये थी कि आपमें वो आग ही नहीं थी ,वो लगन ही नहीं थी जो आपको साइकिल चलाना सिखवा दे . तीन साल पुरानी घटना याद आती है ,रात को एक बजे ठक -ठक  की आवाज़ आ रही थी मैंने जानकारी की तो पता चला कपूर साहब का लड़का क्रिकेट सीख रहा है ,रात को एक बजे अपने किसी दोस्त के साथ वो डिफेन्स की प्रैक्टिस कर रहा था ,इस...

26 . ज़िंदगी – एक नज़रिया

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एक दिन तुम्हारे चेहरे की ख़ूबसूरती पुरानी पड़ जाएगी ,तुम्हारा कसा हुआ जिस्म झुर्रियों से भर जायेगा , चमड़ी का कसाव, उसकी चमक अतीत की बात हो जाएगी , घनी लहराती जुल्फे चांदी के तारों में बदल जाएगी ,तुम्हारी रौबीली खनकदा र आवाज़ लड़खड़ाने लगेगी ,वो कदम जिनसे धरती हिलती है उठाये न उठेंगे , वो हाथ जो कइयों के लिए सहारा बनते है किसी सहारे की तलाश करेंगे - सब के साथ ऐसा होता है तुम्हारे साथ भी होगा लेकिन तुम एक भ्रम में जी रहे हो जैसे जवानी का अमृत पीकर आये हो !! तुम्हारी जवानी तुम्हारे बचपन को कुचलकर आई है तो कोई तुम्हारी जवानी को भी कुचलेगा ,स्थायी कुछ भी नहीं होता और तुम हो कि अपनी जवानी के जोश में ज़माने को अपनी मुट्ठी में करने चले हो !! बंधु,जमाना तो मुट्ठी में भिंची हुई रेत है जितना कसोगे तुम्हारी पकड़ से फिसलता जायेगा . आखिर में चंद जर्रे तुम्हारी हथेली से चिपके रह जायेंगे जो तुम्हारी अच्छाइयां ,तुम्हारी बुराइयां ,तुम्हारी खासियतें ,तुम्हारी कमियां तुम्हे याद दिलाएंगे . मैं नहीं कहता कि तुम ये करो या वो करो - कोई उपदेश कोई नसीहत नहीं - निर्णय तुम्हारा है जो भी तुम क...

25 . ज़िंदगी – एक नज़रिया

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कल का मेरा सच आज सच नहीं रहा ,जब मैं उस सच को आज झूठ बताता हूँ तो तुम आश्चर्य करते हो ! आज जिसे मैं सच मान रहा हूँ हो सकता है कल मैं उसे सच नहीं मानूं हो सकता है तुम मेरी बात नहीं समझ पाओ और फिर आश्चर्य करो. बेहतर है तुम मेरे कल के सच क ो जो आज झूठ बन गया है , सच और झूठ के शब्दों में मत उलझाओ बल्कि उन तर्कों को सुनो और समझो जो मैंने तब दिए थे या जो अब दे रहा हूँ ,अगर मैं दोषी हूँ तो दोषी तुम भी हो जिसने मेरे तर्क सुने और माने और उन तर्कों को सच या झूठ का नाम दे दिया . ज़माने की रफ़्तार इतनी बढ़ गई है कि कल के सच या झूठ आज सच या झूठ नहीं रहे , सारी धारणाये बदल गई ,सारे तर्क बदल गए . दो सौ साल पहले का सच था शांति से बिना चीखे-चिल्लाये एक दुसरे की बात सुनना हो तो दोनों को आस-पास होना चाहिए लेकिन आज का सच है सात समुन्दर पार का इंसान भी बिना चीखे-चिल्लाये शांति से एक दूसरे की बात सुन सकता है सिर्फ उसे मोबाइल का इस्तेमाल करना है . एक अविष्कार कई सच झूठ बना देता है और कई झूठ सच हो जाते है . सौ साल पहले महाभारत का संजय जो कुरुक्षेत्र का आँखों देखा हाल धृतराष्ट्र को बतात...

एक कोशिश और

मुझे याद नहीं कितनी बार गिरा हूँ मैं कितने ज़ख्म बने मेरे जिस्म पर कितनी बार दिल चीरती हँसी हँसी गई मुझ पर मगर रूका नहीं मैं गिर-गिर कर उठा मैं झाड़ी अपनी धूल मुस्कुराया हल्का सा कसी अपनी मुट्ठियाँ और डाल कर आँखों में आँखे कहा ज़िन्दगी से - मैंने हार से बचने का एक तरीका और सीखा है , सफलता इंतज़ार कर रही है मेरा आ, एक कोशिश और करें ! - सुबोध १३ नवंबर, २०१४

कविता

उन्हें मुगालता ये हो गया कि वे कवि हो गए मैं उनको पढता हूँ और हँसता हूँ ! अंदर से कोई कहता है तुम कवि नाम के प्राणी सिर्फ दूसरों की टांग खींचते हो अनगढ़ शब्दों को वाक्य विन्यासों को पढ़ते हो ,देखते हो व्याकरण की शुद्धि जांचते हो, चर्चा करते हो नाक मुंह सिकोड़ते हो भावों को नहीं पढ़ते दिल की आवाज़ नहीं सुनते तुम जैसे कवि तालाब के मेंढक होते है कविता के नाम पर धब्बा होते है क्या कविता सिर्फ शब्दों का जोड़-तोड़ है तालियों की गड़गड़ाहट है मूक संवेदना, मूक भाव, लडखडाती अभिव्यक्ति लूले-लंगड़े,आधे-अधूरे शब्द क्या किसी की कविता नहीं हो सकते ? सोचना - सोचकर जवाब देना - अन्यथा बेड़ियों में बंधी हुई संस्कारों में जकड़ी हुई तुम्हारी कविता नए युग की आंधी में दम तोड़ देगी सिर्फ किताबों की शोभा बढ़ाएगी तालिया पीटने के काम आएँगी आम आदमी से दूर हो जाएगी अँधे युग में अँधो को लुभाएगी पागलों को हँसाने और गूंगे-बहरों से तालियां पिटवाने के काम आएगी !! सुबोध- ८ नवंबर ,२०१४

गद्य

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सिर्फ एक प्रचलित मुहावरा है जिसे जन समर्थन प्राप्त है और वो भावनाओं से ओत -प्रोत है इसलिए वो सही नहीं हो जाता . मैं किसी की भावनाएं आहत नहीं करना चाहता सिर्फ मेरा एक पक्ष रख रहा हूँ ,हो सकता है आप इससे सहमत न हो तो कृपया अपना पक्ष रखे -तर ्क और शालीनता के साथ जिस तरह से मैं रख रहा हूँ ! लोग माँ-बाप को भगवान से भी ऊपर दर्ज़ा देते है - उनकी निगाह में सुख-दुःख भगवान उनके भाग्य में लिखता है ,जबकि माँ-बाप सिर्फ सुख ही लिखते है !! फेसबुक पर डालने और लाइक लेने में इसका मुकाबला नहीं है - बिलकुल किसी लोकप्रिय टॉपिक की तरह !! आइये थोड़ा इसका विश्लेषण करे !! क्या वाकई भाग्य भगवान लिखता है ? या इंसान के किये गए कर्म ही उसे सुख या दुःख देते है , सफलता और असफलता भगवान ने गढ़ी है या इंसान ने ? दूसरा वाक्य माँ-बाप भाग्य में सिर्फ सुख ही लिखते है,क्या वाकई ? मेरे कॉलोनी में रहने वाले रहीम भाई के घर पिछले महीने आठवाँ बच्चा पैदा हुआ है . रहीम भाई खुद साईकिल के पंचर बनाने का काम करते है उनकी शरीके हयात सबीना भाभी लाख की चूड़ियाँ बनाने का काम करती है ,ज़रुरत पर कॉलोनी वाले उनसे घरों में...

गद्य

कुछ ऐसे शानदार दोस्त जिनके बारे में कल्पना तक न की थी कि ज़िन्दगी में कभी बिछुड़ जाएंगे, होली दिवाली भी याद न करे तो उनके ख्याल से ही सारी खुशियां दर्द में बदल जाती है- सब कुछ पाकर भी कुछ भी न बचा पाने का दर्द , संबंधों को अपनी आँखों के सामने मरते हुए देखने का दर्द , जानी पहचानी रूह में उतरती आवाज़ों को खो देने का दर्द !! उफ़ ! ये दर्द ,ये खामोशी ,ये चाहत ,ये कशमकश , ये लम्हों को जीने की आग सिर्फ म ेरे सीने में धड़क रही है या उस तरफ भी कोई तड़फ ज़िंदा है ? क्या मैं मेरे गुरुर को,मेरे अहंकार को ,मेरी ईगो को ,मेरे घमंड को अपनी पूरी नकारात्मकता के साथ छोड़कर मोबाइल पर उसके नंबर डायल कर सकता हूँ? अगर " हाँ " तो करता क्यों नहीं ? अगर " नहीं " तो झूठे विलाप , झूठे प्रपंच और एक नकाब को क्यों ढ़ो रहा हूँ ? हे मेरे अराध्य ! मुझे इतनी शक्ति दो कि मैं किसी और में दोष न देखुं और अपने दोष स्वीकार कर सकूँ ,सुधार सकूँ !!!! - सुबोध , २५ अक्टूबर, २०१४ ----   तुम्हारी आज की बर्बादी कल किये गए कार्यों का परिणाम है ,तुम्हारी कामचोरी ,तुम्हारे गलत निर्णय ,आधी-अधूरी...

गद्य

मध्यमवर्गीय बुजुर्ग पीढ़ी औद्योगिक युग के संस्कार और तकरीबन मज़दूरों वाली स्थिति से गुजरी है और वो अपनी पीड़ा आज की पीढ़ी को देना चाहती है कि ज़िन्दगी आसान नहीं है ,बड़े पापड़ बेलने पड़ते है,बड़ी मेहनत करनी पड़ती है ,दिन-रात एक करते है तो दो वक्त की रोटी जुटा पाते है .सारी दुश्वारियां,सारी मुसीबतें उनकी जुबां पर होती है लेकिन वे शायद समझ नहीं पाते है कि आज का युग पहलेवाला नहीं है ,आज बैलगाड़ी की जगह गाड़ियां आ गई है ,लालटेन की रोशनी में टिमटिमानेवाली रातें रोशनी से जगमगाती है .उनका वक़्त ,उनकी सोच,उनके साधन सब कुछ बदल गया है ,आज सूचना क्रांति के युग में पैसे पेड़ पर नहीं लगते वाली कहावत गलत हो गई है अब इस युग में पैसे पेड़ पर लगते है ,बस लगाने की काबिलियत और ज़ज्बा होना चाहिए . मानवीय मूल्य उस युग में भी कीमती थे लेकिन उस युग में ईमानदारी और संस्कारों वाली जनरेशन का आपसी कम्पीटीशन होने की वजह से सफलता के उतने मौके नहीं थे ,लेकिन आज की पीढ़ी में ज्यादातर मूल्यहीन और क्विक फिक्स वाली मानसिकता के लोग होने की वजह से सफलता के चांस बहुत-बहुत ज्यादा है बशर्ते आप टुच्ची मानसिकता वाले न हो और...

गद्य

जानकारी का ताल्लुक उम्र से होता है ऐसा सोचनेवाले पाषाण युग के बचे हुए अवशेष है क्योंकि तब ज़िन्दगी और गुजरने वाली घटनाये प्रसारित करने के साधन नहीं थे ,आज सूचनाएं अबाध गति से हवाओं में तैरती रहती है और ज़रूरतमंद अगर टेक्नोलॉजी का सहारा लेता है तो स्थिति क्या होगी आप खुद ही समझ सकते है ,18 साल का लड़का 60 साल के बुजुर्ग पर सूचनाओं के मामले में भारी पड़ता है . बुजुर्ग पीढ़ी के पास नयी पीढ़ी पर हावी होने के अमूनन दो तरीके होते थे ( शब्दों पर गौर करें "थे") 1 . बुजुर्ग पीढ़ी ज्यादा उम्रदराज है और इस नाते ज्यादा अनुभवी है . 2 . बुजुर्ग पीढ़ी ज्यादा कमाती है या उसने ज्यादा जोड़ रखा है . आइये उनके दोनों तर्कों को समझ लेवे. 1 जैसाकि मैंने कहा है आज के ज़माने में ये कहना कि उम्र ज्यादा होने से आप ज्यादा जानकार है सत्य नहीं है ,माउस के एक क्लिक पर आपने अपनी पूरी ज़िन्दगी में जो जानकारी इक्कठा की है वो सारी बल्कि उससे ज्यादा जानकारी हाज़िर हो जाती है ! और उम्र होने के नाते आप अनुभवी है तो मैं कहना चाहूंगा कि अनुभव बिलकुल व्यक्तिगत क्रिया है - बिलकुल आस्था की तरह कि सालो-साल ...

गद्य

उस से मेरी चंद दिनों की मुलाकात , साथ उठना, साथ बैठना , घुल-मिल कर बातें करना ,हंसी -मजाक करना इतना नागवार क्यों गुजर रहा है दुनिया पर कि मुझसे उसका सम्बन्ध क्या है ,पुछा जा रहा है ! ये दुनिया सहज होकर क्यों नहीं सोचती ,इसे क्या बीमारी है कि हर साधारण हरकत को कोम्प्लिकेटेड तरीके से सोचे-समझे ! क्या किसी से बात करने,हंसी-मजाक करने के लिए सम्बन्ध होना ज़रूरी है ? क्या इतना काफी नहीं है कि मैं भी इं सान हूँ और वो भी इंसान है ,एक इंसान से दूसरे इंसान का क्या इंसानियत का सम्बन्ध नहीं हो सकता ? बिलकुल वैसा ही सम्बन्ध कि किसी अंधे को आपने हाथ पकड़ कर सड़क पार करवाई ,किसी अपंग की कोई मदद की . अपंगता क्या सिर्फ शारीरिक होती है मानसिक नहीं ? अकेलापन दुनिया की सबसे खतरनाक पहेली है और इसका शिकार दुनिया का सबसे बड़ा अपंग . अगर किसी मानसिक अपंग की अपंगता दूर करने के लिए मैंने उसका अकेलापन दूर कर दिया ,उसके साथ कुछ पल बिता लिए तो क्या गलत किया . और यहाँ दुनिया सम्बन्धो की तलाश कर रही है !!!! - सुबोध

गद्य

बड़ी अजीब है ख्वाइश पहचान की , घर-बाहर ,आस-पास,गाँव-शहर ,दूर-नज़दीक,देश-दुनिया हर तरफ हर शख्श एक जंग लड़ रहा है . अपनी पहचान की जंग ! कुछ अपनी पहचान दूसरों को उधार देकर बड़े ,बहुत बड़े बन जाते है , कुछ लोग दूसरों की पहचान उधार लेकर खुद को एक नाम देते है ,खुद की नज़र में बड़े बन जाते है उन्हें मुगालता ये भी होता है कि हम किंग मेकर है . कुछ लोग चंद सिक्कों में खुद के हुनर को बेच देते है और उस हुनर को खर ीददार की पहचान करार देते है , कुछ दूसरों की मेहनत को अपनी पहचान बना लेते है . कुछ पैसों के बदले में या किसी दबाब में दूसरों को पहचानना बंद कर देते है और कुछ अनजान की पहचान भी क़ुबूल करते है . क्या निराले खेल है पहचान के ! कुछ पहचान के लिए अजीब से कपडे पहनते है ,कुछ अजीब सी हरकतें करते है ,कुछ गाने का रिकॉर्ड बनाते है ,कुछ नाचने का ,कुछ बार -बार चुनाव लड़ने का ,कोई पढ़ने का !!जितने शख्स उतने तरीके . चाहता हर कोई है कि मेरी पहचान हो ,तरीका चाहे अजीब हो या फिर ऐसा कुछ करना पड़े कि लोग कहे वाह भाई,वाह या गज़ब या बहुत खूब !!! जंग पहचान की जो है !!! सुबोध - अक्टूबर ३, २०१४ ...

तुम आओगे ..

वो लफ्ज़ जो तुम्हारी आँखों ने कहे थे मुझसे आज भी सहेज रखे है मैंने वो लफ्ज़ न दिखते है न मिटते है एक फाँस की तरह सीने में चुभते है तब जब आँखों की कोरों से बहते अश्क पोंछती है उंगलियाँ एक दर्द अजीब सा उँगलियों की पोरों में समां जाता है वो लफ्ज़ जो कहे तुम्हारी आँखों ने और मैंने उन लफ़्ज़ों से बुन लिए सपने और मेरे सपने आज भी उघड़े बदन तेरी बाट जोहते है सुबह आरती में शीश नवाते है और साँझ को संध्या करते है . वो लफ्ज़ जिनमे तेरे कजरे की महक है अँधेरे में दिये की मानिंद रौशन है मेरी ज़िन्दगी में मुझे एतबार है तेरी आँखों की ज़ुबान पर उस चाहत पर जहाँ शरीर पीछे छूट जाते है मन मिल जाते है तुम आओगे ..तुम आओगे ...तुम आओगे ... सुबोध - ११ अक्टूबर,२०१४

गद्य

बड़ी अजीब है ख्वाइश पहचान की , घर-बाहर ,आस-पास,गाँव-शहर ,दूर-नज़दीक,देश-दुनिया हर तरफ हर शख्श एक जंग लड़ रहा है . अपनी पहचान की जंग ! कुछ अपनी पहचान दूसरों को उधार देकर बड़े ,बहुत बड़े बन जाते है , कुछ लोग दूसरों की पहचान उधार लेकर खुद को एक नाम देते है ,खुद की नज़र में बड़े बन जाते है उन्हें मुगालता ये भी होता है कि हम किंग मेकर है . कुछ लोग चंद सिक्कों में खुद के हुनर को बेच देते है और उस हुनर को खर ीददार की पहचान करार देते है , कुछ दूसरों की मेहनत को अपनी पहचान बना लेते है . कुछ पैसों के बदले में या किसी दबाब में दूसरों को पहचानना बंद कर देते है और कुछ अनजान की पहचान भी क़ुबूल करते है . क्या निराले खेल है पहचान के ! कुछ पहचान के लिए अजीब से कपडे पहनते है ,कुछ अजीब सी हरकतें करते है ,कुछ गाने का रिकॉर्ड बनाते है ,कुछ नाचने का ,कुछ बार -बार चुनाव लड़ने का ,कोई पढ़ने का !!जितने शख्स उतने तरीके . चाहता हर कोई है कि मेरी पहचान हो ,तरीका चाहे अजीब हो या फिर ऐसा कुछ करना पड़े कि लोग कहे वाह भाई,वाह या गज़ब या बहुत खूब !!! जंग पहचान की जो है !!! सुबोध - अक्टूबर ३, २०१४

गद्य

अन्जान लोगों को की हुई मदद को उसने इस तरह लौटाया कि मुसीबत के वक्त मेरे साथ जो खड़ा था उसे मैं ठीक से जानता भी नहीं था शायद इसे ही उसकी रहमत कहते है ,शायद यही इंसानियत होती है !!! सुबोध - २४ सितम्बर, २०१४

गद्य

इस मुकाबले में तुम्हे आगे बढ़ने की जगह दी है और मैं पीछे हटा हूँ इसका मतलब ये नहीं है कि मैं हार रहा हूँ मैं तो सिर्फ उस पोजीशन में आ रहा हूँ जहाँ से तुम पर निशाना साध सकूँ और विजेता बन सकूँ !!!! सुबोध- २३ सितम्बर, २०१४

गद्य

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जो सपने आपकी नींद उड़ा देते है और आपकी बेहतरीन जानकारी के अनुसार वो सही है तो उनकी आवाज़ सुनिए और उस रास्ते पर बढ़िए जो रास्ता वो बता रहे है . हो सकता है आपको पहली बार में सफलता न मिले तो उस अस्थायी असफलता की परवाह मत कीजिये क्योंकि सफलता के महल तक पहुंचने के लिए हमेशा उस दरवाज़े से गुजरना पड़ता है जिस पर "असफलता" लिखा हुआ होता है. आपकी ताकत, आपका हौंसला हमेशा असफलताओं से बड़ा होता है !! और हो सकता है जो काम आप कर रहे है उसके लिए आपको आलोचना सहन करनी पड़े तो उन आलोचकों की परवाह मत कीजिये जिन्होंने हर महान आदमी को अपनी कटुता से आहत किया होता है , अगर वो महान शख़्शियतें उनकी आलोचना सुनकर रुक जाती तो" महान " शब्द ही नहीं होता ! खुद पर भरोसा रखिये और अपने उस ख्वाब को साकार कीजिये जिसके लिए आपके अंदर ज्वाला धधक रही है !!!! सुबोध- २३ सितम्बर,२०१४

113 . सही या गलत -निर्णय आपका !

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अमीर यु हीं अमीर नहीं होता ( ३ )   आसान नहीं है दायरे को तोडना जो आरामदायक  क्षेत्र (comfort zone) है तुम्हारा तब्दिल हो गया है आदत में . - चाहत तुम्हारी अमीर बनने की कुछ नहीं भिखारी स्तर के अतिरिक्त . - चुनाव तुम्हारा अमीर बनने का शामिल किये है अपने में शर्तों का पुलिंदा , बेहतर है चाहत से लेकिन सर्वश्रेष्ठ नहीं क्योंकि तुम्हारी शर्तें सुरक्षा देगी आदतों को . - समर्पण तुम्हारा अमीर बनने का बनाएगा तुम्हें अमीर क्योंकि यहाँ तुम कर रहे हो वो सब जो ज़रूरी है अमीर बनने के लिए. त्याग सारे आरामदायक   क्षेत्र का बिना रुके,बिना थके. केंद्रित प्रयास , ज़ज़्बा सब कुछ झोंक देने का, विशेषज्ञता आत्मविश्वास से भरी, मानसिकता अमीरों वाली, कोई अगर,कोई मगर कोई बहाना, कोई शायद नहीं . सिर्फ समर्पण, और समर्पण और विकल्परहित समर्पण ज़िन्दगी के आखिरी  लम्हों तक.... सुबोध- मई २९, २०१४  www.saralservices.com ( one sim all recharge , MLM )        

गद्य

बड़ी अजीब है ख्वाइश पहचान की , घर-बाहर ,आस-पास,गाँव-शहर ,दूर-नज़दीक,देश-दुनिया हर तरफ हर शख्श एक जंग लड़ रहा है . अपनी पहचान की जंग ! कुछ अपनी पहचान दूसरों को उधार देकर बड़े ,बहुत बड़े बन जाते है , कुछ लोग दूसरों की पहचान उधार लेकर खुद को एक नाम देते है ,खुद की नज़र में बड़े बन जाते है उन्हें मुगालता ये भी होता है कि हम किंग मेकर है . कुछ लोग चंद सिक्कों में खुद के हुनर को बेच देते है और उस हुनर को खर ीददार की पहचान करार देते है , कुछ दूसरों की मेहनत को अपनी पहचान बना लेते है . कुछ पैसों के बदले में या किसी दबाब में दूसरों को पहचानना बंद कर देते है और कुछ अनजान की पहचान भी क़ुबूल करते है . क्या निराले खेल है पहचान के ! कुछ पहचान के लिए अजीब से कपडे पहनते है ,कुछ अजीब सी हरकतें करते है ,कुछ गाने का रिकॉर्ड बनाते है ,कुछ नाचने का ,कुछ बार -बार चुनाव लड़ने का ,कोई पढ़ने का !!जितने शख्स उतने तरीके . चाहता हर कोई है कि मेरी पहचान हो ,तरीका चाहे अजीब हो या फिर ऐसा कुछ करना पड़े कि लोग कहे वाह भाई,वाह या गज़ब या बहुत खूब !!! जंग पहचान की जो है !!! सुबोध - अक्टूबर ३, २०१४

बापू

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जहाँ बादल इन्द्रधनुष बोते थे वहां अब संगीनें बोई जाती है मासूम बच्चे गुड्डे-गुड़िया से खेलने वाले हथगोलों से खेलते है पहाड़ी नदियों से बहा है इतना लहू कि वहां के वाशिंदे पानी की जगह लहू से मुँह धोते है खेतों में खलिहानों में सूनापन छाया है मरे हुए ढोर-डांगर पड़े है मोहब्बत का गीत गानेवाला मुल्क मेरा किसी बुरी खबर पर रो भी नहीं पाता कि एक हादसा और चला आता है बापू, क्या यही तुम्हारे सपनो का देश है ? आज़ादी की कीमत में तुमने तो हमें गुलामी खरीद दी मालिकों के चेहरे भर बदले है नीयत में तो खोट पहले से ज्यादा है गावों से उसकी आत्मा निकाल कर शहर के फूटपाथ पर लावारिस बना कर लिटा दी गई है गावों में भारत बसता है अच्छा मजाक बन गया है यहाँ मन की शांति सोने की चिड़िया बन गई है बापू, क्या यही तुम्हारे सपनो का देश है ? -सुबोध - अक्टूबर १,१९८५

क्या सही है , क्यों सही है ??? ( भाग-5 )

बेटियों को अच्छा बताने के लिए ,क्यों बुरा बताऊ बेटों को ? समाज ने बेटों को अहमियत दी , बेटी को नहीं दी तो उसका बदला इस तरह लिया जाए ? बेटी को प्यार दिया, किसने ? बहु को इज्जत दी , अधिकार दिए . किसने ? माँ को सम्मान दिया इतना कि चरणो में स्वर्ग मान लिया . किसने ? ये सब प्यार, इज्जत ,सम्मान देने में क्या मर्द ( बेटे ) शामिल नहीं थे ? तो फिर सारे मर्द गलत कैसे हो गए ? -- बहु-बेटी जलाई जाती है, घर से माँ-बाप बेदखल किये जाते है , ढेरों गलत व्यवहार किये जाते है ? क्या अकेला मर्द करता है ? -- सालों से कोई प्रताड़ित किया जाता है, आलोचना की जानी चाहिए उसकी लेकिन आलोचना का मतलब विद्वेष नहीं होता !!! किसी एक के अहम में हुंकार भरने के लिए दूसरे का अहम रौंदना तो नहीं चाहिए , कुचलना तो उचित नहीं ! -- और क्या एक के बिना दूसरा पूरा है ? राखी होगी, कलाई नहीं कलाई होगी ,राखी नहीं मांग होगी ,सिन्दूर नहीं सिन्दूर होगा ,मांग नहीं एक के बिना दूसरा अधूरा है बात पूरेपन की करें अधूरेपन की नहीं !!! सुबोध - २७ सितम्बर,२०१४
ज़िन्दगी इतनी हसीं नहीं रही अब कि जीने की ख्वाइस बाकी हो !! जिए जा रहा हूँ बेमन से बुढ़ापे के अपने दर्द होते है और अपनी पीड़ा जिसे समेटे हुए खुद में जिए जा रहा हूँ मैं क्योंकि उसे यकीं है खुद की मोहब्बत पर कि जब तक वो जिन्दा है उसकी जिम्मेदारियां मैं उठाऊंगा और मैं उसका यकीन बरक़रार रखना चाहता हूँ आखिर उसने सालों साथ निभाया है मेरी हर हार में साथ खड़ी रही है मेरे हर धुप में साया बनकर हज़ार वैचारिक मतभेद के बावजूद अँधेरे में दीपक बनकर वो हर फ़र्ज़ निभाया है उसने जो एक पत्नी निभाती है !!! सुबोध-२५ सितम्बर,२०१४

113 . सही या गलत -निर्णय आपका !

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अमीर यु हीं अमीर नहीं होता ( ३ )   आसान नहीं है दायरे को तोडना जो आरामदायक  क्षेत्र (comfort zone) है तुम्हारा तब्दिल हो गया है आदत में . - चाहत तुम्हारी अमीर बनने की कुछ नहीं भिखारी स्तर के अतिरिक्त . - चुनाव तुम्हारा अमीर बनने का शामिल किये है अपने में शर्तों का पुलिंदा , बेहतर है चाहत से लेकिन सर्वश्रेष्ठ नहीं क्योंकि तुम्हारी शर्तें सुरक्षा देगी आदतों को . - समर्पण तुम्हारा अमीर बनने का बनाएगा तुम्हें अमीर क्योंकि यहाँ तुम कर रहे हो वो सब जो ज़रूरी है अमीर बनने के लिए. त्याग सारे आरामदायक   क्षेत्र का बिना रुके,बिना थके. केंद्रित प्रयास , ज़ज़्बा सब कुछ झोंक देने का, विशेषज्ञता आत्मविश्वास से भरी, मानसिकता अमीरों वाली, कोई अगर,कोई मगर कोई बहाना, कोई शायद नहीं . सिर्फ समर्पण, और समर्पण और विकल्परहित समर्पण ज़िन्दगी के आखिरी  लम्हों तक.... सुबोध- मई २९, २०१४  www.saralservices.com ( one sim all recharge , MLM )          

गद्य

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धन्यवाद, उन दोस्तों का जिन्होंने मुझे अपनी गलतियों से रूबरू करवाया ,बिना इस बात से डरे कि वो मेरी दोस्ती खो सकते है !! पक्के दोस्त अच्छे हो ,सच्चे हो ये ज़रूरी नहीं !! पक्के दोस्त आपकी हर बात का समर्थन करेंगे लेकिन अच्छे और सच्चे दोस्त आपका सिर्फ वही समर्थन करेंगे जहाँ उन्हें आपकी भलाई नज़र आएगी. दोस्ती जब चुनने की बारी आये तो पक्के नहीं अच्छे और सच्चे दोस्त चुनिए ! और हाँ, ध्यान रखियेगा आपके अच्छे और सच्चे दोस्त आपकी दोस्ती की परवाह नहीं करेंगे बल्कि उन्हें आपकी अच्छाई की, आपकी भलाई की परवाह होगी , इस दोस्ती के मूल में " दोस्ती जाए लेकिन दोस्त रहे " वाली भावना होती है क्योंकि उन्हें भरोसा होता है कि जिस दिन आप अपना अच्छा और बुरा समझने लगेंगे उस दिन दूरियां ख़त्म करकर वापिस लौट आएंगे !!! सुबोध - १९ सितम्बर,२०१४

गद्य

ज़िन्दगी हमेशा वादा करती है कि मैं कभी भी आसान नहीं रहूंगी .मैं तुम्हारे सुख में चुनौती बनकर उभरूंगी कि आओ मुझे बरकरार रखो ,और तुम्हारे दुःख में तो संघर्षपूर्ण रहूंगी ही . अब ये तुम पर है कि तुम आलोचना,हताशा ,निराशा ,पराजय को अपनी ताकत बनाकर उभरते हो -एक ज्वालमुखी की तरह या इन नकारात्मक भावों के नीचे दबकर अपने आप को बर्बाद कर लेते हो !!! चाकू से सब्ज़ी भी काटी जाती है और आत्महत्या करने के लिए हाथ की नसें भी ! फर्क इस्तेमाल करने वाले की सोच और ताकत में होता है !!!! सुबोध- १८ सितम्बर, २०१४

गद्य

काश!! कुछ अनलिखे शब्दों को हम पहचान पाते !!! मीरा ने पहचाना ,पंचतत्व में विलीन हो गई !! हीर ने पहचाना फ़ना हो गई !! माँ ने पहचाना वृद्धाश्रम पहुँच गई !! प्रकृति ने पहचाना , रौद्र हो गई !!!! और... और... और.... एक लम्बी लिस्ट और हम भावनाहीन इंसान !! शब्दों को ओढ़ते है, शब्दों को बिछाते है,शब्दों को पहनते है लेकिन शब्दों का अनलिखा नहीं समझते !!!!   सुबोध- १७ सितम्बर , २०१४   ----------------------------------------- कुछ लम्हे ज़िन्दगी में हताशा देते है और हम उन नकारात्मक लम्हों के बहाव में बहते हुए खुद को नकारा मान लेते है ,हार स्वीकार कर लेते है ,सुनहरी ख्वाबों से खुद को दरकिनार कर लेते है . क्या उन लम्हों पर हम कुछ अलग तरीके से प्रतिक्रिया नहीं दे सकते ? एक आईना जब टूटता है कुछ कहते है इसे कचरे में फेंक दो और कुछ कहते है आओ एक नया रॉक गार्डन बनाये !!!! परिस्थितियां आपके बस में नहीं है लेकिन परिस्थितियों पर आप क्या प्रतिक्रिया करते है यह पूरी तरह आपके बस में है . सुबोध- १७ सितम्बर , २०१४

गद्य

मैं गिर रहा हूँ बार-बार उस मासूम बच्चे की मानिंद जो चलना सीखने के वक्त गिरता है ,उठता है,कदम बढ़ाता है ,गिरता है, उठता है , कदम बढ़ाता है और अंततः चलना सीख जाता है ,तब उस बच्चे को कोई नहीं कहता कि ये गिर रहा है बल्कि कहते है कि ये चलना सीख रहा है !!! आज जब मैं गिर रहा हूँ बार-बार लोग मुझे हारा हुआ ,चुका हुआ ,पराजित क्यों मान रहे है ?   सुबोध- १६ सितम्बर ,२०१४ ------------------------------------------ महंगाई का असर जिंसों पर होता है ,वस्तुओं पर होता है ,चीज़ों पर होता है ; भावनाओं पर नहीं,जज्बातों पर नहीं -अगर उन पर भी महंगाई का असर होता तो क्या-क्या होता सोचकर रूह काँपने लगती है !!! या रब तू बड़ा रहम दिल है इंसान की मजबूरियां भी समझता है और नादानियां भी !!! सुबोध- १५ सितम्बर, २०१४

माँ

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मेरी तोतली जुबान को समझना आसान न था लेकिन तुम समझती थी बिना कुछ कहे मेरे रोने की असली वजह तुम समझती थी मेरी खाली जेब और गुस्से की बातें तुम समझती थी आँखों में बसी इश्क़ की खुमारी को तुम समझती थी ज़माने की बदलती हवा को तुम समझती थी मेरे बदलते रिश्तों का बदलना तुम समझती थी और और मैं तुम्हे कहता था तुम कुछ नहीं समझती, माँ !!! मैं कल भी नासमझ था आज भी नासमझ हूँ मैं शब्दों को लिखता,पढता,समझता हूँ और तुम माँ ,तुम सब कुछ समझती हो !!! सुबोध- १५,सितम्बर,२०१४

गद्य

हम प्यार को हमेशा व्यापार क्यों बनाते है ? प्यार के बदले प्यार मिलेगा ये सोचकर प्यार करना खुद को तराजू के एक पलड़े में रखना नहीं तो क्या है ? कि आओ मैं तिज़ारत के लिए हाज़िर हूँ !!! कहते है प्यार किया नहीं जाता , हो जाता है - तो यहाँ तो हम सायास भाव-ताव कर रहे है कि मैं प्यार नामक शब्द तुम को दे रहा हूँ तुम बदले में क्या दोगे ? क्या " प्यार हो जाता है " कहावत गलत है , अब प्यार हो गया बदले में प्या र नहीं मिला तो ? क्या तराजू के एक पलड़े में रखा अपना मन वापिस उठा लोगे ? प्यार तो स्नेह का नाम है, त्याग का नाम है ,खुद की बर्बादी के बाद भी किसी को आबाद करने की चाहत का नाम है , उस बंदगी का नाम है जहाँ " मैं " पिघल कर बह जाता है , बह कर "तुम" में समां जाता है फिर उस से कोई फरक नहीं पड़ता वो तुम मेरा है या नहीं है !! - सुबोध --------- अगर आप गहराई में जाकर सोचे तो आप समझ पाएंगे कि हर आज़ादी खुद में एक बंधन ( इसे आप जिम्मेदारी पढ़े) होती है यह एक बंधन ही है कि आप अपनी संतान का भरण -पोषण कर पाते है तभी तो वो आपको संतान कहने का हक़ देती...

गद्य

शांति जिस कीमत पर भी मिले सस्ती होती है !!! हो सकता है हम आज इसे महसूस न करें , लेकिन जब जीवन में दौड़ते-दौड़ते थक जाएंगे , सत्ता हमारे हाथ से निकल कर नई पीढ़ी के हाथ में आ जाएगी और हमारे पास वक्त ही वक्त होगा - अपनी गुजरी यादों में जीने का ,की गई गलतियों को महसूसने का , पैसे के पीछे भागने का, थोपी हुई व्यस्तताओं के बारे में सोचने का , तब शायद , हाँ शायद तब हमे शांति अनमोल लगे ..हमे महसूस हो जिस के पीछे हम भागे क्या वो इतना महत्त्वपूर्ण था कि हमने पूरी ज़िन्दगी में अशांति पाल ली .. सुबोध - ५ सितम्बर, २०१४ ------ तुम्हारा स्पर्श मुझे सहज कर देता है मेरा सारा गुस्सा, मेरी सारी नाराजगी काफूर हो जाती है ...ये कौनसी भाषा है कि गुस्सा हुए बेटे/ बेटी को सीने से लगाता हूँ और वे शांत हो जाते है , जाने कुछ हुआ ही नहीं हो !!! शब्दों से पैदा हुए विवाद / गलतफहमियां एक स्पर्श से दूर हो जाती है .... सुबोध - ५ सितम्बर, २०१४

कुछ टुकड़ों में

गिरकर संभलने वाले ही मंज़िल पाते है, न संभलने वाले नाकामों में गिने जाते है . तू हार मत, हारना तेरी फितरत नहीं, मंज़िल पाने वाले ही विजेता कहलाते है . सुबोध- ४, सितम्बर , २०१४ --------- ज़माने की ठोकरों ने मजबूती दी है मुझे ! आज फिर एक ठोकर लगी है , लगता है अब मेरा वक्त आ गया !!! सुबोध- ४ सितम्बर , २०१४ --------   इंसान ज़िंदा रह गया इंसानियत खो गई !! ढूँढो उसे , शायद ज़िंदा हो मुझमे या तुझमे !!!  सुबोध- ४,सितम्बर,२०१४  ------------- उनके देखने के अंदाज़ ने हमे अपनों से गैर कर दिया !!!! सुबोध- ४ सितम्बर, २०१४ ------------------ अनगिनित दिन, अनगिनित रातें मेरे साथ चली है मेरे साथ जली है अश्कों से नहाईं है तब निखरी है गली-गली जिसकी चर्चा हुई है, बिखरी है तब कहीं जा के मोहब्बत कहलाई है और मैं" दीवाना " सुबोध ,- ४ सितम्बर, २०१४

112 . सही या गलत -निर्णय आपका !

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                       मेरी पोस्ट 103 .106 .107 .108 .109 .110   में मैंने पैसे की बचत को लेकर विस्तार से लिखा है , इन सारी पोस्ट्स के बाद  सवाल ये आता है कि इस 10 % पैसे को मैनेज कैसे किया जाए . . आपकी सारी कमाई जो टैक्स कटने के बाद आपके घर में आती है सबसे पहले उस कमाई का 10 % आप अलग करें , उस पैसे के लिए आप एक अलग बैंक अकाउंट खोले . इस खाते का नाम आप वित्तीय स्वतंत्रता खाता रखे . यह खाता  सिर्फ निवेश करने और रेजिड्यूअल इनकम ( पोस्ट 56  देखें ) के श्रोत बनाने के लिए ही इस्तेमाल करना है , जब आप  निवेश और रेजिड्यूअल इनकम जैसे शब्दों से प्रायोगिक स्तर पर हकीकत में वाकिफ होते है ( पोस्ट 60  देखें ) सुचना के अलग अलग श्रोत से जुड़ते है - तो आप एक बिलकुल ही नई तरह की शब्दावली सीखते है .एक बिलकुल ही नया और विशाल कैनवास आपकी नज़रों के सामने होता है यहाँ आपको ठहरने और सीखने की ज़रुरत होगी खुद को संतुलित और व्यवस्थित करने की ज़रुरत होगी ...

कुछ टुकड़ों में

मुझे पता है मेरी खासियत मैं हूँ और खासियत आम नहीं होती !!! सुबोध - २ सितम्बर ,२०१४

कुछ टुकड़ों में

अब वो एहसास न रहे जो पहली मुलाकात में थे ! कुसूरबार मैं अकेला तो नहीं !!! सुबोध- १ सितम्बर ,२०१४  -------- मैं तो कल भी गैर न था ,आज भी तेरा हूँ तुझे खुद पे ऐतबार नहीं तो खता मेरी क्या है ? सुबोध- १ सितम्बर ,२०१४

111 . सही या गलत -निर्णय आपका !

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मेरी पोस्ट  105 पर कुछ सवाल आये थे ,उसका जवाब-- मनीषजी , अंकुरजी  1) मेरी पोस्ट 86 , 88 और 105 देखें ,समझे . 2) कोई भी काम सोचने और शुरू करने से पहले अपनी टीम से राय करें ,उससे डिस्कस करें .   3) क्षेत्र के विशेषज्ञ से राय करें उसकी कंसल्टेंसी चार्ज उसे देवे , आपके पसंदीदा क्षेत्र पर वो एक विस्तृत सर्वे करकर आपको जो प्रोजेक्ट रिपोर्ट देगा आप उसे बराबर समझे उसके साथ एक प्रॉपर डिस्कस करें एक-एक पॉइंट पर स्पष्टीकरण  ले तभी काम शुरू करें , मैं इसे बेवकूफी के अलावा कुछ नहीं मानता कि आप कोई भी ऐसा फील्ड चुन  लेवे जिसमे आपका कोई दोस्त ,आपका कोई रिश्तेदार पैसा बनाने में सफल हो गया . ये ध्यान रखें हर व्यक्ति की अपनी-अपनी अलग विशेषता होती है ,हो सकता है उनमे जो क्वालिटी है वो आपमें नहीं हो.हर क्षेत्र में सफलता के लिए अलग-अलग क्वालिटी की ज़रुरत होती है . 4) विशेषज्ञ से रिपोर्ट आने के बाद और उससे डिस्कस  करने के बाद आप अपने लिए एक टू डू लिस्ट  बनाये ,जिसमे आप अपने जिम्मे क्या रखेंगे और अपनी टीम के जिम्मे क्या ,इसकी विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर...

ख्वाइशें

ख्वाइशें काफी दिनों से ठहरी है मेरे साथ मेरे घर में . एक पुराने बिछड़े दोस्त की तरह वक्त-बेवक्त जगाती है मुझे और पूछने लगती है वही जाने- पहचाने सवाल जो कभी चिढ़ाते है मुझे और कभी लगते है खुद का वजूद जब भी तन्हा होता हूँ मेरे पास आकर बैठ जाती है उसके आने से मन में उजाला हो जाता है तन्हाई उसकी बातों से खिलखिलाने लगती है एक नए सन्दर्भ के साथ मुझे अहसास है जब ये जुदा होगी मुझसे मैं बिखरूँगा और जब ये बन-संवरकर आ जाएगी मेरी ज़िन्दगी में मैं निखरूँगा. सुबोध- ३० अगस्त, २०१४

110 . सही या गलत -निर्णय आपका !

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       पैसा हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है , यह कड़ी मेहनत अमीर मानसिकता  के लिए अस्थायी होती है और गरीब मानसिकता  के लिए स्थायी . इसकी वजह ये है कि कड़ी मेहनत से कमाए हुए पैसे को लेकर दोनों के दृष्टिकोण अलग-अलग होते है - एक इसलिए कमाता है कि पैसे जमा कर सके और दूसरा इसलिए कि अच्छी ज़िन्दगी जी सके ,एक का दृष्टिकोण बड़ी खुशिया हासिल करने पर होता है और दूसरा बड़ी खुशियों के लिए छोटी-छोटी खुशिया नकार नहीं सकता ,एक आनेवाले कल को देखता है और दूसरा आज में जीता है . और अंततः होता ये है कि एक के पास कुछ पैसे जुड़ जाते है और दुसरे के पास नहीं जुड़ते .                     असली खेल यही से शुरू होता है -- पैसा ऊर्जा का एक रूप है ,जिस तरह काम ऊर्जा का एक रूप है . गरीब मानसिकता काम से ऊर्जा यानि पैसा पैदा करती है  जबकि अमीर मानसिकता पैसे से ऊर्जा यानि पैसा पैदा करती है ,सीधे शब्दों में कहुँ तो गरीब मानसिकता अब भी अपनी कड़ी मेहनत से पैसा पैदा करती है जबकि अमीर मानसिकता अपने इकट्ठे किये ह...

109 . सही या गलत -निर्णय आपका !

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              पैसे के प्रबंधन के बारे में जब गरीबों से बात की जाती है तो उनका जो जवाब होता है वो ये होता है कि " जब मेरे पास बहुत सारा पैसा होगा तब मैं पैसे का प्रबंध करना शुरू  करूँगा ."                          अगर आप गहराई में जाए तो आप समझ पाएंगे कि उनके लिए पैसे का प्रबंधन एक समस्या के अलावा कुछ भी नहीं है , अमूनन ये तत्काल संतुष्टि वाली श्रेणी के लोग है  ( पोस्ट ९७ देखें) और ये लोग पैसे का प्रबंध करने की बजाय   उसे खर्च करने वाले होते है , ये प्रबंध  नामक समस्या को  एक गलत नंबर के चश्मे से देखते है .                      पहली बात  आप के पास पैसा तब होगा जब आप उसका प्रबंध करना शुरू करोगे  ये तो कहना ही गलत है कि मेरे पास पैसा ज्यादा होगा तो मैं इसका प्रबध करूँगा , ये कहना तो बिलकुल ऐसा ही है कि  एक कमजोर आदमी  ये कहे   कि मेरे मस्सल्स ...

प्यार का किस्सा

तुमने जब थामा मेरा हाथ आंसुओं की हंसी फ़िज़ा में तैर गई मन के किनारों पर भावनाओं के हुजूम में एक-एक किस्सा एक-एक लम्हा सर पर हाथ रखने लगा आशीष की तरह डूबता सूरज नारंगी बिंदी बन चस्पा हो गया मेरे माथे पर मैं खिल गई महक गई पूनम की रात में रात रानी सी लिखने लगी जब प्यार का किस्सा मेरी कलम तुम्हारे नाम पे अटक गई !!! सुबोध - २७ अगस्त, २०१४

मेरा इश्क़ मेरा नसीब

इश्क़ का कुरता मैला हो गया और मेरी जीभ में जख्म इसकी पाकीज़गी बताते-बताते मगर निगोड़ा ज़माना मोहब्बत को ज़िन्दगी की अमावस समझता है रूह का नूर नहीं . शायद खुद गुजरे है उस नाकाम मोहब्बत के मकाम से आग के तूफ़ान से कि ज़माने को बचाने लगे है मोहब्बत के नाम से . ऐ ! मौला तेरी छत के नीचे वादों की छत बना रहा हूँ ठिठुरते इश्क़ को आगोश की गर्मी शायद कुछ सुकून दे और सूरज सा हौंसला मेरे ख्यालो को सच्चाई दे. मेरे मौला !! तू गवाह रहना जो हारे है उनका भी और मेरी जीत का भी उनकी नाकामी मेरा नसीब क्यों बने क्यों न मेरी जीत मेरी ज़िन्दगी बने ?   सुबोध - २६ अगस्त ,२०१४

108 . सही या गलत -निर्णय आपका !

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             जब गरीबों से पैसे के प्रबंधन की बात की जाती है तो आम तौर पर उनका जवाब होता है कि मेरे पास इतने पैसे है ही नहीं कि उनका प्रबंधन करूँ ,मुश्किल से दो वक्त की रोटी जुटा पाता हूँ .                    उनको जो  सलाह हो सकती  है वो ये है कि ऐसी हालत में भी उनको अपनी कमाई का 10 % हिस्सा  अपने भविष्य के लिए अलग से निकाल कर रख देना चाहिए .बाकी बचे  90 % में गुजारा करना चाहिए , एक महीने में  वे 90 % में गुजारा करना सीख जायेंगे और अगर उन्होंने अपनी इच्छाओं पर एक महीने तक  कंट्रोल कर लिया तो वे आगे भी कर सकते है . बात इच्छाओं को मारने की नहीं है बल्कि  बात पैसे के प्रबंधन की आदत की है, उस आदत की  जिस से अमीरी का दरवाज़ा खुलता है .                 कुछ गरीब कह सकते है कि 10 % निकालने के बाद हमें भूखा सोना पड़ेगा ,मेरा जवाब होगा- हाँ , आप भूखे सो जाइये और इस कहावत को याद कीजिये " भूखा पेट चिल्लाता है " और य...

107. सही या गलत -निर्णय आपका !

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                   मालिक वो होता है ,जो हासिल चीज़ों को सुव्यवस्थित तरीके से प्रबंधित करता है ,जो अपनी चीज़ों को बराबर प्रबंधित नहीं करते , वे जल्दी ही उन चीज़ों को या तो नष्ट हो जाने देते है या अपना मालिकाना हक़ खो देते है ,पैसा  इस साधारण से  सिद्धांत  का अपवाद नहीं है .                   वित्तीय सफलता ( अमीर ) और वित्तीय असफलता (गरीब ) के बीच का सबसे बड़ा फर्क पैसे के प्रबंधन का होता है .                  अमीर लोग पैसे का प्रबंधन करने में माहिर होते है और उसकी वजह मैंने अपनी पोस्ट 103  और  106  में बताई थी .                 गरीब लोगों द्वारा  पैसे का प्रबंधन न करना उनकी आधी-अधूरी सोच का नतीजा हो सकता  है या फिर उनकी गलत  कंडीशनिंग इसकी वजह...

क्या सही है , क्यों सही है ??? ( भाग-4 )

एक तूफ़ान जो गुजरा मेरे जिस्म पर से मेरी मासूमियत उड़ा ले गया मौत से भी खौफनाक ज़िन्दगी छोड़ गया जिनकी बाँहों में खेली-कूदी उनकी निगाहों में गलीज़ हो गई बाप के कंधे झुक गए माँ की आँखों में पानी भर गया भाई कहीं कमजोर हो गया सखी सहेलियाँ ,सारी गलबहियाँ अजनबी हो गई. फुसफुसाहट अपनी हो गई खिलखिलाहट  पराई हो गई खिड़की जो खोली थी सूरज ने रोशनी की अमावस की काली रात हो गई   उफ़ ! मैं औरत औरत  न रहकर   जिस्म हो गई बलात्कार झेला हुआ एक नाम हो गई बदन का पानी तेजाब बन जलाने लगा खुद को पड़ोसियों की कानाफूसी पीड़ा का पेड़ हो गई यारब ! ये क्या हो गया कल का फूल आज काँटा हो गया होठों  की हँसी आँखों की बरसात हो गई ज़माने में दिखाने को मेरा दर्द अपना हो गया और झेलने को पराया हो गया औरत होने की पीड़ा मेरा  नसीब हो गई माँ - बहन की कोख इज्जत हो गई और मेरी कोख गरम गोश्त हो गई रौंदी मैं गई और उफ़ ! उफ़!!  गुनाहगार भी मैं ही हो गई   !! सुबोध- २४ अगस्त,२०१४

106. सही या गलत -निर्णय आपका !

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हकीकत में अमीर गरीबों से ज्यादा स्मार्ट नहीं होते है. बस उनकी पैसे से सम्बंधित आदतें गरीबों से अलग और पैसे को बढ़ाने में मददगार होती है  जो मूल रूप से उनकी अतीत की कंडीशनिंग से जुडी होती है .                                        गरीबों के लिए बचत या निवेश उत्सव की तरह होते है जबकि अमीरों के लिए हर रोज़ किये जानेवाले  कामों की तरह एक आदत.और ये आदत होना ही उन्हें परफेक्शन देता है जो गरीबों के हिस्से में नहीं आती .                          अगर आप पैसे का उचित प्रबंधन नहीं करते है तो दो बातें हो सकती है ,पहली आपके दिमाग में इसकी प्रोग्रामिंग ही नहीं हुई है और दूसरी शायद आप ये जानते ही नहीं है कि पैसे का सही और उचित प्रबंधन कैसे किया जाता है .पहली बात आपकी कं...

105. सही या गलत -निर्णय आपका !

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एक सवाल Ratan Arjun Aug 9th, 2:07pm Dear sir, mane job chod kr do bar apna kam suru kiya lakin dono bar asaflta mili . m construction line m hu or m ab kuch nya krna chahta hu . pls mujhe koi rasta btao sir.. मेरा जवाब रतनजी, दो बार की असफलता के बाद भी आप तीसरी बार कोशिश करना चाहते है ,आपके जज्बे और सोच को सलाम ! कंस्ट्रक्सन लाइन में आप क्या करते है ,ये आपने स्पष्ट नहीं किया ,अगर आप स्पष्ट करते तो शायद में बेहतर तरीके से जवाब दे पाता. सर , आप मेरे पुराने पाठक है और मेँ ये मानकर चल रहा हूँ कि आपने मेरी सारी पोस्ट पढ़ी और समझी है ,अगर हो सके तो उन्हें दुबारा पढ़  लेवे, कुछ चीज़े जितनी ज्यादा बार रिपीट की जाती है उनके बारे मेँ आपका  दृष्टिकोण   उतना ही ज्यादा  साफ़-सुथरा होता जाता है . मैं ये मानकर चल रहा हूँ कि दो बार की असफलता ने आपको बहुत कुछ सिखाया होगा ,ध्यान रखियेगा वे असफलताएँ नहीं है वे आपकी आर्थिक आज़ादी की बैकबोन है और ताउम्र आपकी बेस्ट टीचर रहेगी . सर, कोई  नया व्यवसाय शुरू करने से पहले इन बातों का  ध्यान रखे -  ...

104. सही या गलत -निर्णय आपका !

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अमीर यु हीं अमीर नहीं होता ( २) दायरा जो बनाते है आप निर्भर है उसकी उपलब्धि आपके समर्पण पर ... - दायरा मेंढक का होता है तालाब, और बाज़ का आकाश, सरहदों से आज़ाद आकाश . - मेंढक जब सोचता है बाज़ बनने की, रोकती है उसे उसकी मानसिकता, जहाँ मौजूद है फ़ेहरिश्त खतरों की . - त्याग है आरामदेह दायरे का, ख़ौफ है अपनी वास्तविकता बदलने का , मेहनत है अपनी काबिलियत के विस्तार की, और जहाँ ज़रूरत है एकाग्रता की , साहस की, विशेषज्ञता की , शत प्रतिशत प्रयास की , और सबसे बड़ी बाज़ की मानसिकता की. .- और देखकर इस फ़ेहरिश्त को कुछ मेंढक मेंढक रह जाते है और कुछ मेंढक बाज़ बन जाते है . - अपना-अपना दायरा है चाहत का, चुनाव का, समर्पण का. क्योंकि दायरा जो बनाते है आप निर्भर है उसकी उपलब्धि आपके समर्पण पर .. सुबोध- २२ मई , २०१४  www.saralservices.com ( one sim all recharge , MLM )

103 . सही या गलत -निर्णय आपका !

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103 . सही या गलत -निर्णय आपका !                    गरीब मानसिकता के लोग एक रुपये को सिर्फ एक रूपया मानते है जिसके बदले में वे लोग कोई चीज़ खरीदकर तत्काल संतुष्टि चाहते है उनकी निगाह में ये ऐसा गेहूँ है जिसकी  रोटी बननी है और उसे खाना है   जबकि अमीर मानसिकता के लोग इसे एक रूपया नहीं मानते , वे इसे ऐसा योद्धा मानते है जिसके दम पर उन्हें वित्तीय स्वतंत्रता हासिल होगी .उनके लिए ये गेहूँ एक बीज है जिसे बोकर वे ढेरों गेहूँ  पाएंगे -और उन ढेरों गेहुंओं  को बोकर और ढेरों गेहूँ पाएंगे- चक्रवृद्धि व्याज की तरह.                                          गरीब मानसिकता  एक रुपये की कीमत आज में देखती  है जबकि अमीर मानसिकता उस एक रुपये की कीमत आज में नहीं कल में देखती  है - और ये कल में देखना ही उसे निवेश करने को उत्साहित करता है .    ...