संदेश

सितंबर, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्या सही है , क्यों सही है ??? ( भाग-5 )

बेटियों को अच्छा बताने के लिए ,क्यों बुरा बताऊ बेटों को ? समाज ने बेटों को अहमियत दी , बेटी को नहीं दी तो उसका बदला इस तरह लिया जाए ? बेटी को प्यार दिया, किसने ? बहु को इज्जत दी , अधिकार दिए . किसने ? माँ को सम्मान दिया इतना कि चरणो में स्वर्ग मान लिया . किसने ? ये सब प्यार, इज्जत ,सम्मान देने में क्या मर्द ( बेटे ) शामिल नहीं थे ? तो फिर सारे मर्द गलत कैसे हो गए ? -- बहु-बेटी जलाई जाती है, घर से माँ-बाप बेदखल किये जाते है , ढेरों गलत व्यवहार किये जाते है ? क्या अकेला मर्द करता है ? -- सालों से कोई प्रताड़ित किया जाता है, आलोचना की जानी चाहिए उसकी लेकिन आलोचना का मतलब विद्वेष नहीं होता !!! किसी एक के अहम में हुंकार भरने के लिए दूसरे का अहम रौंदना तो नहीं चाहिए , कुचलना तो उचित नहीं ! -- और क्या एक के बिना दूसरा पूरा है ? राखी होगी, कलाई नहीं कलाई होगी ,राखी नहीं मांग होगी ,सिन्दूर नहीं सिन्दूर होगा ,मांग नहीं एक के बिना दूसरा अधूरा है बात पूरेपन की करें अधूरेपन की नहीं !!! सुबोध - २७ सितम्बर,२०१४
ज़िन्दगी इतनी हसीं नहीं रही अब कि जीने की ख्वाइस बाकी हो !! जिए जा रहा हूँ बेमन से बुढ़ापे के अपने दर्द होते है और अपनी पीड़ा जिसे समेटे हुए खुद में जिए जा रहा हूँ मैं क्योंकि उसे यकीं है खुद की मोहब्बत पर कि जब तक वो जिन्दा है उसकी जिम्मेदारियां मैं उठाऊंगा और मैं उसका यकीन बरक़रार रखना चाहता हूँ आखिर उसने सालों साथ निभाया है मेरी हर हार में साथ खड़ी रही है मेरे हर धुप में साया बनकर हज़ार वैचारिक मतभेद के बावजूद अँधेरे में दीपक बनकर वो हर फ़र्ज़ निभाया है उसने जो एक पत्नी निभाती है !!! सुबोध-२५ सितम्बर,२०१४

113 . सही या गलत -निर्णय आपका !

चित्र
अमीर यु हीं अमीर नहीं होता ( ३ )   आसान नहीं है दायरे को तोडना जो आरामदायक  क्षेत्र (comfort zone) है तुम्हारा तब्दिल हो गया है आदत में . - चाहत तुम्हारी अमीर बनने की कुछ नहीं भिखारी स्तर के अतिरिक्त . - चुनाव तुम्हारा अमीर बनने का शामिल किये है अपने में शर्तों का पुलिंदा , बेहतर है चाहत से लेकिन सर्वश्रेष्ठ नहीं क्योंकि तुम्हारी शर्तें सुरक्षा देगी आदतों को . - समर्पण तुम्हारा अमीर बनने का बनाएगा तुम्हें अमीर क्योंकि यहाँ तुम कर रहे हो वो सब जो ज़रूरी है अमीर बनने के लिए. त्याग सारे आरामदायक   क्षेत्र का बिना रुके,बिना थके. केंद्रित प्रयास , ज़ज़्बा सब कुछ झोंक देने का, विशेषज्ञता आत्मविश्वास से भरी, मानसिकता अमीरों वाली, कोई अगर,कोई मगर कोई बहाना, कोई शायद नहीं . सिर्फ समर्पण, और समर्पण और विकल्परहित समर्पण ज़िन्दगी के आखिरी  लम्हों तक.... सुबोध- मई २९, २०१४  www.saralservices.com ( one sim all recharge , MLM )          

गद्य

चित्र
धन्यवाद, उन दोस्तों का जिन्होंने मुझे अपनी गलतियों से रूबरू करवाया ,बिना इस बात से डरे कि वो मेरी दोस्ती खो सकते है !! पक्के दोस्त अच्छे हो ,सच्चे हो ये ज़रूरी नहीं !! पक्के दोस्त आपकी हर बात का समर्थन करेंगे लेकिन अच्छे और सच्चे दोस्त आपका सिर्फ वही समर्थन करेंगे जहाँ उन्हें आपकी भलाई नज़र आएगी. दोस्ती जब चुनने की बारी आये तो पक्के नहीं अच्छे और सच्चे दोस्त चुनिए ! और हाँ, ध्यान रखियेगा आपके अच्छे और सच्चे दोस्त आपकी दोस्ती की परवाह नहीं करेंगे बल्कि उन्हें आपकी अच्छाई की, आपकी भलाई की परवाह होगी , इस दोस्ती के मूल में " दोस्ती जाए लेकिन दोस्त रहे " वाली भावना होती है क्योंकि उन्हें भरोसा होता है कि जिस दिन आप अपना अच्छा और बुरा समझने लगेंगे उस दिन दूरियां ख़त्म करकर वापिस लौट आएंगे !!! सुबोध - १९ सितम्बर,२०१४

गद्य

ज़िन्दगी हमेशा वादा करती है कि मैं कभी भी आसान नहीं रहूंगी .मैं तुम्हारे सुख में चुनौती बनकर उभरूंगी कि आओ मुझे बरकरार रखो ,और तुम्हारे दुःख में तो संघर्षपूर्ण रहूंगी ही . अब ये तुम पर है कि तुम आलोचना,हताशा ,निराशा ,पराजय को अपनी ताकत बनाकर उभरते हो -एक ज्वालमुखी की तरह या इन नकारात्मक भावों के नीचे दबकर अपने आप को बर्बाद कर लेते हो !!! चाकू से सब्ज़ी भी काटी जाती है और आत्महत्या करने के लिए हाथ की नसें भी ! फर्क इस्तेमाल करने वाले की सोच और ताकत में होता है !!!! सुबोध- १८ सितम्बर, २०१४

गद्य

काश!! कुछ अनलिखे शब्दों को हम पहचान पाते !!! मीरा ने पहचाना ,पंचतत्व में विलीन हो गई !! हीर ने पहचाना फ़ना हो गई !! माँ ने पहचाना वृद्धाश्रम पहुँच गई !! प्रकृति ने पहचाना , रौद्र हो गई !!!! और... और... और.... एक लम्बी लिस्ट और हम भावनाहीन इंसान !! शब्दों को ओढ़ते है, शब्दों को बिछाते है,शब्दों को पहनते है लेकिन शब्दों का अनलिखा नहीं समझते !!!!   सुबोध- १७ सितम्बर , २०१४   ----------------------------------------- कुछ लम्हे ज़िन्दगी में हताशा देते है और हम उन नकारात्मक लम्हों के बहाव में बहते हुए खुद को नकारा मान लेते है ,हार स्वीकार कर लेते है ,सुनहरी ख्वाबों से खुद को दरकिनार कर लेते है . क्या उन लम्हों पर हम कुछ अलग तरीके से प्रतिक्रिया नहीं दे सकते ? एक आईना जब टूटता है कुछ कहते है इसे कचरे में फेंक दो और कुछ कहते है आओ एक नया रॉक गार्डन बनाये !!!! परिस्थितियां आपके बस में नहीं है लेकिन परिस्थितियों पर आप क्या प्रतिक्रिया करते है यह पूरी तरह आपके बस में है . सुबोध- १७ सितम्बर , २०१४

गद्य

मैं गिर रहा हूँ बार-बार उस मासूम बच्चे की मानिंद जो चलना सीखने के वक्त गिरता है ,उठता है,कदम बढ़ाता है ,गिरता है, उठता है , कदम बढ़ाता है और अंततः चलना सीख जाता है ,तब उस बच्चे को कोई नहीं कहता कि ये गिर रहा है बल्कि कहते है कि ये चलना सीख रहा है !!! आज जब मैं गिर रहा हूँ बार-बार लोग मुझे हारा हुआ ,चुका हुआ ,पराजित क्यों मान रहे है ?   सुबोध- १६ सितम्बर ,२०१४ ------------------------------------------ महंगाई का असर जिंसों पर होता है ,वस्तुओं पर होता है ,चीज़ों पर होता है ; भावनाओं पर नहीं,जज्बातों पर नहीं -अगर उन पर भी महंगाई का असर होता तो क्या-क्या होता सोचकर रूह काँपने लगती है !!! या रब तू बड़ा रहम दिल है इंसान की मजबूरियां भी समझता है और नादानियां भी !!! सुबोध- १५ सितम्बर, २०१४

माँ

चित्र
मेरी तोतली जुबान को समझना आसान न था लेकिन तुम समझती थी बिना कुछ कहे मेरे रोने की असली वजह तुम समझती थी मेरी खाली जेब और गुस्से की बातें तुम समझती थी आँखों में बसी इश्क़ की खुमारी को तुम समझती थी ज़माने की बदलती हवा को तुम समझती थी मेरे बदलते रिश्तों का बदलना तुम समझती थी और और मैं तुम्हे कहता था तुम कुछ नहीं समझती, माँ !!! मैं कल भी नासमझ था आज भी नासमझ हूँ मैं शब्दों को लिखता,पढता,समझता हूँ और तुम माँ ,तुम सब कुछ समझती हो !!! सुबोध- १५,सितम्बर,२०१४

गद्य

हम प्यार को हमेशा व्यापार क्यों बनाते है ? प्यार के बदले प्यार मिलेगा ये सोचकर प्यार करना खुद को तराजू के एक पलड़े में रखना नहीं तो क्या है ? कि आओ मैं तिज़ारत के लिए हाज़िर हूँ !!! कहते है प्यार किया नहीं जाता , हो जाता है - तो यहाँ तो हम सायास भाव-ताव कर रहे है कि मैं प्यार नामक शब्द तुम को दे रहा हूँ तुम बदले में क्या दोगे ? क्या " प्यार हो जाता है " कहावत गलत है , अब प्यार हो गया बदले में प्या र नहीं मिला तो ? क्या तराजू के एक पलड़े में रखा अपना मन वापिस उठा लोगे ? प्यार तो स्नेह का नाम है, त्याग का नाम है ,खुद की बर्बादी के बाद भी किसी को आबाद करने की चाहत का नाम है , उस बंदगी का नाम है जहाँ " मैं " पिघल कर बह जाता है , बह कर "तुम" में समां जाता है फिर उस से कोई फरक नहीं पड़ता वो तुम मेरा है या नहीं है !! - सुबोध --------- अगर आप गहराई में जाकर सोचे तो आप समझ पाएंगे कि हर आज़ादी खुद में एक बंधन ( इसे आप जिम्मेदारी पढ़े) होती है यह एक बंधन ही है कि आप अपनी संतान का भरण -पोषण कर पाते है तभी तो वो आपको संतान कहने का हक़ देती...

गद्य

शांति जिस कीमत पर भी मिले सस्ती होती है !!! हो सकता है हम आज इसे महसूस न करें , लेकिन जब जीवन में दौड़ते-दौड़ते थक जाएंगे , सत्ता हमारे हाथ से निकल कर नई पीढ़ी के हाथ में आ जाएगी और हमारे पास वक्त ही वक्त होगा - अपनी गुजरी यादों में जीने का ,की गई गलतियों को महसूसने का , पैसे के पीछे भागने का, थोपी हुई व्यस्तताओं के बारे में सोचने का , तब शायद , हाँ शायद तब हमे शांति अनमोल लगे ..हमे महसूस हो जिस के पीछे हम भागे क्या वो इतना महत्त्वपूर्ण था कि हमने पूरी ज़िन्दगी में अशांति पाल ली .. सुबोध - ५ सितम्बर, २०१४ ------ तुम्हारा स्पर्श मुझे सहज कर देता है मेरा सारा गुस्सा, मेरी सारी नाराजगी काफूर हो जाती है ...ये कौनसी भाषा है कि गुस्सा हुए बेटे/ बेटी को सीने से लगाता हूँ और वे शांत हो जाते है , जाने कुछ हुआ ही नहीं हो !!! शब्दों से पैदा हुए विवाद / गलतफहमियां एक स्पर्श से दूर हो जाती है .... सुबोध - ५ सितम्बर, २०१४

कुछ टुकड़ों में

गिरकर संभलने वाले ही मंज़िल पाते है, न संभलने वाले नाकामों में गिने जाते है . तू हार मत, हारना तेरी फितरत नहीं, मंज़िल पाने वाले ही विजेता कहलाते है . सुबोध- ४, सितम्बर , २०१४ --------- ज़माने की ठोकरों ने मजबूती दी है मुझे ! आज फिर एक ठोकर लगी है , लगता है अब मेरा वक्त आ गया !!! सुबोध- ४ सितम्बर , २०१४ --------   इंसान ज़िंदा रह गया इंसानियत खो गई !! ढूँढो उसे , शायद ज़िंदा हो मुझमे या तुझमे !!!  सुबोध- ४,सितम्बर,२०१४  ------------- उनके देखने के अंदाज़ ने हमे अपनों से गैर कर दिया !!!! सुबोध- ४ सितम्बर, २०१४ ------------------ अनगिनित दिन, अनगिनित रातें मेरे साथ चली है मेरे साथ जली है अश्कों से नहाईं है तब निखरी है गली-गली जिसकी चर्चा हुई है, बिखरी है तब कहीं जा के मोहब्बत कहलाई है और मैं" दीवाना " सुबोध ,- ४ सितम्बर, २०१४

112 . सही या गलत -निर्णय आपका !

चित्र
                       मेरी पोस्ट 103 .106 .107 .108 .109 .110   में मैंने पैसे की बचत को लेकर विस्तार से लिखा है , इन सारी पोस्ट्स के बाद  सवाल ये आता है कि इस 10 % पैसे को मैनेज कैसे किया जाए . . आपकी सारी कमाई जो टैक्स कटने के बाद आपके घर में आती है सबसे पहले उस कमाई का 10 % आप अलग करें , उस पैसे के लिए आप एक अलग बैंक अकाउंट खोले . इस खाते का नाम आप वित्तीय स्वतंत्रता खाता रखे . यह खाता  सिर्फ निवेश करने और रेजिड्यूअल इनकम ( पोस्ट 56  देखें ) के श्रोत बनाने के लिए ही इस्तेमाल करना है , जब आप  निवेश और रेजिड्यूअल इनकम जैसे शब्दों से प्रायोगिक स्तर पर हकीकत में वाकिफ होते है ( पोस्ट 60  देखें ) सुचना के अलग अलग श्रोत से जुड़ते है - तो आप एक बिलकुल ही नई तरह की शब्दावली सीखते है .एक बिलकुल ही नया और विशाल कैनवास आपकी नज़रों के सामने होता है यहाँ आपको ठहरने और सीखने की ज़रुरत होगी खुद को संतुलित और व्यवस्थित करने की ज़रुरत होगी ...

कुछ टुकड़ों में

मुझे पता है मेरी खासियत मैं हूँ और खासियत आम नहीं होती !!! सुबोध - २ सितम्बर ,२०१४

कुछ टुकड़ों में

अब वो एहसास न रहे जो पहली मुलाकात में थे ! कुसूरबार मैं अकेला तो नहीं !!! सुबोध- १ सितम्बर ,२०१४  -------- मैं तो कल भी गैर न था ,आज भी तेरा हूँ तुझे खुद पे ऐतबार नहीं तो खता मेरी क्या है ? सुबोध- १ सितम्बर ,२०१४