ख्वाबों की शाल
ख्वाबों की शाल जो बुनी थी रात में सुबह खुल गई कोई गिरह सारे ख्वाब बिखर गए चुन चुन कर कर रही हूँ उन्हें इकट्ठे मोहब्बत की गठरी में . दिन जब गहराएगा यादों का आँचल हवा के झोंके से लहराकर चूमेगा मेरा माथा. विरह की बर्फीली चोटियों से एक टुकड़ा रौशनी लेकर उधार उंडेल लुंगी जिस्म पर और करुँगी तेरा इंतज़ार. अंजुरी भर चांदनी बाँधी है मैंने अपने दुपट्टे में तुम्हारे लिए जब भी मिलेंगे हम इकट्ठे बैठकर बुनेंगे ख्वाबों की शाल. ख्वाब जो इकट्ठे किये है मैंने मोहब्बत की गठरी में . सुबोध ३० , मई २०१४