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ख्वाबों की शाल

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ख्वाबों की शाल   जो बुनी   थी रात में सुबह खुल गई कोई गिरह सारे ख्वाब बिखर गए चुन चुन कर कर रही हूँ उन्हें इकट्ठे मोहब्बत की गठरी में . दिन जब गहराएगा यादों का आँचल हवा के झोंके से लहराकर चूमेगा मेरा माथा. विरह की बर्फीली चोटियों   से एक टुकड़ा रौशनी लेकर उधार उंडेल लुंगी जिस्म पर और करुँगी तेरा इंतज़ार. अंजुरी भर चांदनी बाँधी है मैंने अपने दुपट्टे   में तुम्हारे लिए जब भी मिलेंगे हम इकट्ठे बैठकर बुनेंगे    ख्वाबों की शाल. ख्वाब जो इकट्ठे किये है   मैंने मोहब्बत की गठरी में . सुबोध   ३० , मई २०१४  

अमीर यु हीं अमीर नहीं होता (४)

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ख्वाइश इतनी सी कि हालात बेहतर हो जाए मेरा आरामदेह क्षेत्र ( comfort   zone   ) रहे सुरक्षित इस सोच की वजह से   कोशिशें होती है आधी-अधूरी.   शुभचिंतकों की असफलता की   फिक्र फुला देती है हाथ-पाँव . काम की शुरुआत अकेले से होती है ख़त्म २-४ पर होती है. इस्तेमाल किये जाते है औद्यौगिक युग के औज़ार , पेड़ काटने के लिए कुल्हाड़ी .   हर काम /उपाय/कोशिश   होते है छोटे ज़ाहिर है सफल होने पर सफलता भी प्रयासों के अनुरूप ही परिणाम देगी लिहाज़ा छोटे क़दमों   की सफलता किसी कोने में दुबकी रह जाती है क्योंकि जो छोटा सोचते है वो गरीब होते है ..... - उन्हें झोंकना पड़ता है अपना सब कुछ , सब कुछ माने सब कुछ - समय , ऊर्जा , मेहनत , पूँजी , हार न मानने का ज़ज़्बा , काबिलियत. नकारना होता है समाज/दोस्तों का खौफ , मज़ा आरामदेह क्षेत्र का. शुरुआत होती है अकेले से   लेकिन जोड़ लेते है   पूरी टीम , पूरा नेटवर्क. इस्तेमाल किये जाते है आधुनिक युग के औज़ा...

अमीर यु हीं अमीर नहीं होता ( ३ )

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आसान नहीं है दायरे को तोडना जो आरामदायक   क्षेत्र (comfort zone) है तुम्हारा तब्दिल हो गया है आदत में . - चाहत तुम्हारी अमीर बनने की कुछ नहीं भिखारी स्तर के अतिरिक्त . - चुनाव तुम्हारा अमीर बनने का शामिल किये है अपने में शर्तों का पुलिंदा , बेहतर है चाहत से लेकिन सर्वश्रेष्ठ नहीं क्योंकि तुम्हारी शर्तें सुरक्षा देगी आदतों को . - समर्पण तुम्हारा अमीर बनने का बनाएगा तुम्हें अमीर क्योंकि यहाँ तुम कर रहे हो वो सब जो ज़रूरी है अमीर बनने के लिए. त्याग सारे आरामदायक  क्षेत्र का बिना रुके,बिना थके. केंद्रित प्रयास, ज़ज़्बा सब कुछ झोंक देने का, विशेषज्ञता आत्मविश्वास से भरी, मानसिकता अमीरों वाली, कोई अगर,कोई मगर कोई बहाना, कोई शायद नहीं . सिर्फ समर्पण, और समर्पण और विकल्परहित समर्पण ज़िन्दगी के आखिरी  लम्हों तक...... सुबोध- मई २९, २०१४

इश्क़ की पीड़ा

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धीमी-धीमी बरसात में हल्की सुनहरी  धूप, मिट्टी की सोंधी-सोंधी महक, आसमान में अंगड़ाई लेता इन्द्रधनुष और ऐसे में  तेरा ख़्याल  लगता है ऐसा जाने गुज़र  रहा हूँ आग से या कोई चीर रहा है पोर-पोर . खो देता हूँ सुध-बुध , घंटों घूरता रहता हूँ ख़ाली दीवारों को. - अँधेरे की चादर जब चूमती है चाँदनी का बदन खिलती है कही दूर रात की रानी और महक होकर हवाओं के परों पर सवार बस जाती है मेरे ज़िस्म  में तब ख़्यालों में  बहुत कुछ आकर भी कुछ नहीं आता है . ख़ाली बर्तन की तरह मन रीता रह जाता है .  ये इश्क़ की पीड़ा है जो वक़्त की कोख से टपके लम्हों की गोद में हँसाती है, रुलाती है, तड़फ़ाती है और वक्त-बेवक्त तन्हा छोड़ जाती है    इसे वही समझे जिसने इश्क़  पढ़ा नहीं बल्कि किया है ...... सुबोध- २३ मई ,२०१४ 

अमीर यु हीं अमीर नहीं होता ( २)

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दायरा जो बनाते है आप निर्भर है उसकी उपलब्धि आपके समर्पण पर ... - दायरा मेंढक का होता है तालाब, और बाज़ का आकाश, सरहदों से आज़ाद आकाश . - मेंढक जब सोचता है बाज़ बनने की, रोकती है उसे उसकी मानसिकता, जहाँ मौजूद है फ़ेहरिश्त खतरों की . - त्याग है आरामदेह दायरे का, ख़ौफ है अपनी वास्तविकता बदलने का , मेहनत है अपनी काबिलियत के विस्तार की, और जहाँ ज़रूरत है एकाग्रता की , साहस की, विशेषज्ञता की , शत प्रतिशत प्रयास  की , और सबसे बड़ी बाज़ की मानसिकता की. .- और देखकर इस फ़ेहरिश्त को कुछ मेंढक मेंढक रह जाते है और कुछ मेंढक बाज़ बन जाते है . - अपना-अपना दायरा है चाहत का, चुनाव का, समर्पण का. क्योंकि दायरा जो बनाते है आप निर्भर है उसकी उपलब्धि आपके समर्पण पर .. सुबोध-  २२ मई , २०१४

ताकि कल जीत सकूँ ....

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हाँ,  मैं स्वीकार करता हूँ अपनी हार  ... लेता हूँ पूरी जिम्मेदारी ... नहीं देता किसीको भी दोष तरफदारी नहीं करूँगा खुद की कि मैं सही था वक़्त गलत हो गया नहीं करूँगा बेवजह  की शिकायत और ये सब कर रहा हूँ सिर्फ इसलिए कि कल मेरी कोई हार न हो ... ... मैं करता हूँ स्वीकार मुझमे नहीं था वो जज़्बा कि जीत होती मेरी संपूर्ण समर्पण से ही हासिल होता है लक्ष्य ...... -- मैं करता रहा शिकायत कमियों की, खामियों की भूल गया हासिल को और सारा ध्यान रहा कमियों,खामियों पर कहते है जिसके बारे में शिद्दत से  सोचते हो वही मिलता है सो मुझे  कमिया और खामिया मिल  गयी करता अगर प्रयास लगा कर जान की बाज़ी इन्हे दूर करने का तो निश्चित ही अलग होता परिणाम  - मेरा पूरा प्रयास था बचूं  हार से शायद इसी लिए हार गया  क्योंकि मेरे  अवचेतन में लक्ष्य हार से बचना भर था जीत का तो कहीं ज़िक्र भी न था . हाँ, में स्वीकार करता हूँ अपनी हार लेता हूँ  पूरी जिम्मेदारी ताकि कल जीत सकूँ .... सुबोध- २१, मई २०१४

अमीर यु हीं अमीर नहीं होता

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सुरक्षित करने को अपना आज दांव पर लगा देते  है अपना  भविष्य हाँ, यही करते है अधिकतर लोग.... बिना ये समझे कि ख़ूबसूरत भविष्य की जड़  में आज की खाद होती है .... -. चूजे को कर दिया जाता है हलाल मुर्गी बनने से पहले . और रोते है रोना कि ज्यादा सफ़ेद क्यों है  पड़ोसी की  शर्ट . - इतना व्यस्त होते है रोने में कोसने में कि तलाशते नहीं वजह ...वजह....वजह. - छोटे लक्ष्य छोटी वास्तविकताएं छोटे प्रयत्न ज़ाहिर सी बात है छोटी ही होगी उपलब्धियाँ... - अमीरी के रास्ते जाने वाली सोच की सड़क शुरू होती है सवालों से क्योंकि विस्तार वास्तविकता का काबिलियत का शुरू होता है. सवालों से ..... क्या क्यों  कब  कैसे  कहाँ लेकिन गरीब देता है   आधे -अधूरे जवाब नतीजा  आधी- अधूरी उपलब्धिया और दोष नसीब को ????? अमीर  लेता है जिम्मेदारी नहीं बनाता बहाने ...... छोटी-छोटी बातें पैदा करती है बड़ा फर्क ....... सुबोध-   १६ मई,२०१४

सपने छोटे क्यों ?

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छोटी सोच वाले छोटे सपने देखते है और सिर्फ देखते है....... - बड़े सपने देखने पर शुभचिंतक हो जाते है दहशतज़दा  वे ढूंढते है बड़ी समस्याओं के लिए छोटे-छोटे समाधान. - नहीं समझ पाते कि  सपने देखने से  नहीं बल्कि पूरे होते है सुव्यवस्थित प्रयास से , नहीं समझ पाते कि वे इस किनारे पर है  दुसरे पर उनके सपने और बीच में समस्याओं की नदी . - उन्हें सिर्फ बनाना है एक पुल इस किनारे से उस किनारे तक उन्हें पुल बनाने का जुटाना है सामान पैदा करनी है काबिलियत उसके बाद सपने  उनके होंगे. हाँ, जो भी देखे होंगे, चाहे बड़े हो या छोटे. तो छोटे क्यों ? सुबोध-    १४ मई,२०१४

इश्क़

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दो अनजान परिंदों की तरह  मिले  हम बचपन  के आखिरी  छोर पर जहाँ से शुरू हुआ  काफ़िला सितारों का झूमना आसमान  का संगीत हवाओं का  दे कर  हाथों  में हाथ देखे  हमने  इंद्रधनुषी ख़्वाब चुने  अक्षर हमने ख़ामोशी के पेड़ से क़तरा-क़तरा रूह में चाहत  के फूल खिले   रौशनी के चमन में केसर की महक में चांदनी  खिलखिला कर बोली जा मेहंदी लग जा हथेली पर तक़दीर बनके महबूब की. सुबोध  १२ मई २०१४

गलतियाँ पूर्ण बनाती है

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इंसान होगा तो कर्म करेगा , भेजा है कर्म करने के लिए ख़ुदा ने उसे. और गलतियाँ होती है कर्म करने वालों से न कि मुर्दों से . - देखते है अाधी- अधूरी सोच वाले किसने , कितनी गलतियाँ की और पीटते है माथा कोसने की शक्ल में - लेकिन ख़ुदा ये देखता है कि बजाय बहाने बनाने के किसने स्वीकारी जिम्मेदारी..... और वो ये देखता है कि किसने , कितना सीखा अपनी गलतियों से . क्योंकि वो जानता है मैंने इंसान को पूर्ण बनाकर नहीं भेजा है बल्कि भेजा है पूर्ण बनने  के लिए.. सुबोध  १२ मई,२०१४

ठहरा है मेरे कमरे में इन्द्रधनुष

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मैंने लाने के लिए इन्द्रधनुष पैदा की थी खुद में काबिलियत कि मौजूद न रहे कोई वजह इन्द्रधनुष न आने की. सारे डर असफल होने के छोड़ आया था उस कब्रगाह में जहाँ दफन है अतीत मेरा असफलता का . और सफलता सिर्फ निर्भर थी इस काबिलियत पर कि असफलता के भय को किस तरह करूँ प्रबंधित मेरे कमरे में इन्द्रधनुष लाया है सुरमई उजाला ईनाम के .तौर पर क्योंकि मेरी कोशिश का स्तर उच्च था इतना कि संभव ही नहीं था असफल होना. मैं क्यों डरूँ इन्द्रधनुष और सुरमई उजाले के मेरे कमरे में होने से ? जानता हूँ मैं इनकी वजह से सौंपें जायेंगे मुझे कुछ उत्तरदायित्व जो हमेशा सौंपें जाते है क्षमतावान को . सुबोध ११ मई , २०१४

दहेज़ - एक पहलु यह भी

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दहेज़ का दंश झेलते टी.व्ही . और स्कूटर बन गए है आग के बंद कमरे कि जिसमे सुलगो ,रोओ चुपचाप . - बेटी की पैदाइश क्यों जुटा देती है फिक्र का सामान कि अच्छी साड़ी पाते ही रख दी जाती है संदूक में ? कि लटकने लगती है दहशत की एक तलवार सर पर ? - नहीं,हम सिर्फ फिक्र करते है अपनी उसकी नहीं बल्कि उसके दहेज़ को लेकर हमारी खौफनाक चिंताएं न जाने किन लम्हों नोंच देती है उसकी मासूमियत के पर, शरारत,खिलखिलाहट का जंगल. - और हम ओढ़ते है एक मुखौटा कि हमारी बेटी धीरे-धीरे समझदार हो रही है जबकि वह बिखर रही होती है उसके लिए हमारी फिक्र , परेशानियाँ देख देख कर हर पल टुकड़ों में बँटती हुई. सुबोध दिसंबर १९८६

तुझे इश्क़ जो हुआ है

सारे अक्षर खिलखिला कर घेर लेते है मुझे गाते हुए एक अनजाना गीत जिसकी धून पहचानी सी लगती है सूरज की किरणे भीगी -भीगी शबनम का माथा सहलाती है एक चिड़िया आती है फुदकती हुई मुंह में घास का तिनका लिए बैठ जाती है अलगनी पर टंगे कुर्ते पर आम की भीनी -भीनी महक भर देती है मेरे कमरे में हवा एक तितली आती है चुपके से गुनगुनाती है सारे अक्षर हंस पड़ते है जोर से कहते हुए चलो , नाचते है गाते है पार्टी करते है तुझे इश्क़ जो हुआ है ............ सुबोध १० मई , २०१४

मेरी हथेली पर किसी और की मेहंदी है .

मेरी हथेली पर तेरे इश्क़ की मेहंदी नहीं बेवफाई के अंगारे है फिर भी न जाने क्यों महकती है मेरे जिस्म की शाखें एक तेरे जिक्र से. - भूले से सही हिज़्र जब उतारता है अपने कपड़े एक सूरज आकर चूम लेता है मेरा माथा और मैं बालती हूँ चूल्हा तेरे लिए सोंधी-सोंधी रोटी जो पकानी है , हुलस कर साफ़ करती हूँ चौबारे को तलाशती हूँ दुपट्टे का साफ़ किनारा नाक पोंछनी है तेरे बच्चो की.. - वक्त का जंगल जब छूता है मेरे वज़ूद को एक ज़हर का घूंट मेरे जिस्म में उतर जाता है जैसे समाती है समुन्दर में कोई नदी छितरा देता है ख्यालों के सितारे क्योंकि मेरे बच्चो का बाप तू नहीं मेरी हथेली पर किसी और की मेहंदी है . सुबोध ९ मई २०१४

क्या उसकी हत्यारी मैं हूँ ?

संस्कारों के अँधेरे में पली हुई मैं दिखा कर ससुराल का भय क़त्ल करती रही उसकी मासूमियत . - झल्लाती उसके बचपने पर थोपती रही उस पर सलीके से उठना-बैठना और बातचीत का अंदाज़ . - उसकी निरीह आँखें टपक पड़ती बेबसी में खुद को खुद में जज्ब करती. - उसके खामोश मासूम चेहरे की उष्णता सहेजने की चाहत लगकर मेरी छाती से बंद मुट्ठी का सपना बन गई . - जवान होती बेटी के लिए अपनी गरीबी में जोड़ती दहेज़ न चाहते हुए भी कोसने लगती उसे. - वह चुपचाप सुनती कोसने छुपाती अपनी झल्लाहट ढेरों काम में और गुस्सा अपने होठों में . - उसकी पैदाइश पर उठाती उंगली बात-बेबात डांटने लगती उसे समझाने खुद को.. - मिलना -जुलना लड़कों से हँसना या बातें करना जोर से या घूमना - फिरना बाहर बंद कर दिया उसका सुना-सुना कर अपने ज़माने की बातें --, बंदिशे . लेकिन आज कोहराम मचा है घर में जवान बेटी जल मरी है सबसे ऊँची चीख मेरी कहती है मुझसे 'उसकी हत्यारी मैं हूँ ' क्या आप भी यही समझते है ? सुबोध सितम्बर, १९८६

यादों के शहर में

एक अकेला मैं यादों के शहर में वर्क उलटता हुआ इश्क़ के खो गया हूँ बरसों की हथेली में चुभे हिज़्र का कांटा निकालने में . - विश्वास की झील में घोल दिया मजबूरियों ने बेवफ़ाई का ज़हर और इश्क़ का पानी जल गया चूल्हे पे चढ़ी भूख की देग में . - आँखों में लहराती सुकून की लाली नोंच ले गया संस्कारों का गिद्ध और मैं जो कल साथ था कविता के आज अकेला हो गया हूँ - सुरज ने बंद कर दी है किरणों की खिड़की और बेनूर चाँद सिसक रहा है यादों के शहर में इश्क़ के वर्क उलटता . सुबोध अगस्त १९८६

जब माँ तुम जैसी होती है ....

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करता है मुझे आज़ाद तुम्हारा विश्वास अपने डर से और तुम्हारा प्यार उन बंदिशों से जो डालती है पैरों में बेड़िया बदल जाते है बेटी शब्द के मायने जब माँ तुम जैसी होती है .... जो सिखाती है कसना मुठ्ठियों को और वार करना जरूरत होने पर जो बताती है फर्क बोझ और वरदान में जिम्मेदारी और पलायन में और करती है आज़ाद बेटी होने के अभिशाप से जब माँ तुम जैसी होती है ..... बेटियाँ आंसू नहीं अँधेरे लम्हों का नूर होती है बिखरते लफ़्ज़ों को सम्हालती चांदनी का समुन्दर होती है जो रिश्तों को सहेजती है परीकथाओ वाले इंद्रधनुषी ख्वाब बुनती है सुन्दर वर्तमान के साथ ख़ूबसूरत जिम्मेदार भविष्य होती है जब माँ तुम जैसी होती है .... सुबोध मई ४, २०१४

मत बेचो खुद को सस्ते में

मत बेचो खुद को पूरी करने सिर्फ अपनी दैनिक ज़रूरतें निकलो सुविधा के खोल से बाहर और वो तलाश करो जो संभव है पाना तुम्हारे लिए. नियम है ज़िन्दगी का इस से पाने का जो तुम प्रयास करोगे देगी ये तुम्हे उतना ; तुम पर है ये क़ि तुम इस से क्या लेते हो. शर्त ये है क़ि मज़दूरी तुम्हे नहीं तुम्हारी काबिलियत को दी जाती है. सुबोध अप्रैल ३०,२०१४

आपकी वास्तविकता

बनाने के दौरान आप सीखते है बर्बाद करना और बर्बाद करने के दौरान सबक सीखते है आप अपनी गलतियों से और बन जाते है इतने समझदार कि दोहराव न हो गलतियों का . और फिर बनाते है बर्बाद हुए को नए सिरे से. - यह पूरा क्रिया-चक्र बनाना बर्बाद करना और फिर से बनाना बनाता है आपको संपूर्ण . इस दौरान जो बनते है आप वही होती है आपकी सच्ची वास्तविकता . - उसके बाद आने वाली असफलताएँ विचलित नहीं करती आपको बल्कि उत्साहित करती है चुनौती की तरह . क्योंकि आप जानते है नए सिरे से बनाने की पूरी प्रकिया को . - बनाते-बनाते आप वह बन जाते है जहाँ सफलता और असफलता महत्व नहीं रखती क्योंकि पहुँच जाते है आप उस शिखर पर जो आपकी वास्तविकता है . सुबोध अप्रैल ३०,२०१४

महत्वपूर्ण नहीं है बनना

महत्वपूर्ण नहीं है बनना महत्वपूर्ण है करते करते बनना फ़ासला कोशिश करने और होने के दरमियाँ का आपको सिखाता है बनना जिसमे सीखते है आप बनने वाली चीज़ों को सम्हालना. बिना फ़ासला तय किये पाई हुई दौलत सम्हाली नहीं जा सकती क्योंकि आप सिर्फ पैसे वाले बने है . वो हुनर जो सिखाता है सम्हालना वो सीखा जाता है उस वक़्त के दरमियान फ़ासला तय करते - करते . इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है बनना महत्वपूर्ण है करते करते बनना. सुबोध - अप्रैल ३०, २०१४

गुरुमंत्र - सफलता का

सफलता मिलती है गुजरकर असफलताओं से. जिनमे माद्दा नहीं असफल होने का वे डरपोक क्या चखेंगे स्वाद सफलता का ? चाहिए सफलता के लिए सबसे ज्यादा असफल होने की हिम्मत , लेकर सबक असफलता से बैठने की नहीं दुबारा कोशिश करने की हिम्मत , हर असफलता के साथ एक नया पाठ पढ़ने की हिम्मत तब तक जब तक असफल न हो जाये असफलता. सुबोध अगस्त २००५

भाग्य खैरात नहीं देता

मैंने पढ़ा सोचा समझा अवसर देखा सीखा किया और तुमने पढ़ा सोचा समझा कठिनाईयाँ देखी और छोड़ दिया. अब तुम कहते हो मुझे सफलता भाग्य से खैरात में मिली है. क्या तुम नहीं जानते मैंने चूमे है ढेरों मेंढक पाने को राजकुमार और तुम छुप गए कछुए के खोल में बचाने को अपने होठों की खूबसूरती. मेरे दोस्त ! सफलता भाग्य से मिलती है लेकिन भाग्य खैरात नहीं देता क्योंकि सफलता और भाग्य दोनों सतत प्रयासों का परिणाम है जहाँ सिर्फ पड़ाव होते है मंज़िल नहीं ... सुबोध

चुप रहने की सज़ा

जिस्म में लगती है आग गुजरता हूँ जब उसके ख्याल से.. अच्छी बोलचाल थी अच्छी उठ-बैठ थी अच्छी पहचान थी और अच्छी तमीज़ थी, लिहाज़ था कि कर न बैठूँ कोई ऐसी हरकत जो उसे नागवार गुजरे और वो गुजरे दर्द से बस ! यहीं भले होने ने तबाह कर दिया मुझे कोई ऐसा आया जिसने न किया लिहाज़ न अपनाई तमीज़ और न सोचा उसके दर्द के बारे में बल्कि कर बैठा इज़हारे-मौहब्बत. वो हो गई उसकी और में लिहाज़ और तमीज़ गले से लगाये रह गया. . सुबोध अगस्त २००५

आधा हिस्सा पीहर में

हाँ,आज भी टूट जाता है घर आँगन अंदर तक जब बेटी विदा होती है. अपनी ससुराल जाकर भी अपना आधा हिस्सा छोड़ जाती है पीहर में. फ़िक्र अपने भाई की, मालिश पापा के सिर की, आलिंगनबद्ध होना माँ से ललक बचपन को जीने की कर देती है भाव - विभोर जमघट सहेलियों का दौर चाय -कॉफी का देर रात तक गीली-गीली रातों में अलाव जलता है जज्बातों का. शायद बेटियां पीहर जीने आती है-- छूटे हुए बचपन की यादें भाई के साथ की गई शरारतें पापा से की गई ज़िद माँ के हाथ की रोटी और कहीं गिरा पड़ा वो लम्हा जिसमे दर्द भी था,खुशी भी. और इन सबको जी कर जब वो लौटती है ससुराल अपना आधा हिस्सा छोड़ जाती है पीहर में. सुबोध

जब हो जाती है हद

रिक्त हथेलियों पर ठहरा हुआ कालापन किसी गर्म लम्हे की तलाश में भिगोता है माँ का आँचल . सिसकता है लगकर भाई के कंधे से या घुटता रहता है चुपचाप अंदर ही अंदर . भूल जाते है होंठ मुस्कुराना शबनमी मुस्कान मांगें, मनुहार भरी. चेहरे की उदासी उतर आती है चूड़ियों पर काँप जाती है देह हर आहट पर आतंक से . टुकड़ों में बंटती हुई पल-पल बदल जाते है शब्दों के अर्थ , घर आँगन से जुड़ने के मोह की तरह और जब हो जाती है हद अख़बारों की लुत्फभरी कतरनें ज़िंदा हो जाती है बनने से पहले खंडहर हो गए ताजमहल की लाश पर सुबोध १९८७

तुम्हारे बिना

वक्त के आँसू नहीं मिटा पाये है विरह का ज़ख्म . इश्क़ का शहर उदास लेटा है मन के आइने पर . बाँसुरी की तान , खामोश वादियाँ, बदन टटोलती हवा , ताज़ा खिला गुलाब कुछ भी अच्छा नहीं लगता तुम्हारे बिना सुबोध अगस्त १९८६

दहेज़ - हत्या

नहीं छूट पाती हाथों की मेहंदी नहीं मिटती जिस्म से नवविवाहिता की गंध कि दरकने लगते है सपने ; सास के चेहरे से उतर जाता है माँ के चेहरे का मुखौटा, खिल्ली उड़ाता हुआ पति हो जाता है पराया अपना बनने से पहले. जिस्म और रूह बन जाते है ज़ख्मों का जेल-खाना . आतंक उभर उठता है आँखों में- अंदर ही अंदर घुटता . लम्हे दर लम्हे मोह घर - आँगन का जुड़ भी नहीं पाता कि क़त्ल कर दी जाती है मासूमियत. बेअसर हो जाती है माँ की हिदायतें सखियों के सुझाव. और एक रोज़ जब हो जाती है हद समाज के अवैध खाते में दर्ज़ हिसाब न चूका में विवश ज़िन्दगी दहशत की चमक में अपनी डोर सौंप देती है काले अँधेरे को. और अख़बारों की चटख भरी ख़बरों में जुड़ जाती है खिलने से पहले मुरझा गए गुलाब की खबर . सुबोध फरबरी १९८७

अस्तित्व

शिराओं में खून की जगह दौड़ने लगा है दर्द . जब रिश्ते सहलाते है सर खिंच जाती है एक आग की लकीर जिस्म के आर-पार. शोषण पर - एक सच पर परदा डालने की कोशिश भर देती है एक खौफ मुझ में . नहीं चाहता नकार दूँ उस शोषण को जिसमे से गुजरकर स्थापित करना है मुझे अपना अस्तित्व ........ सुबोध जुलाई १९८३

हथियार

हथियार आदमी की भाषा से जज़्बातों से अन्जान है. हाथ चुल्लू में ज़हर भर कर हथियारों को अर्ध्य देते है और हथियार पैरों में खून का भंवर . आदमी आदमी के हाथों पे बौखलाहट रखता है. एक पल के लिये हाथ कांपता है और दुसरे पल आवेश सुविधा के समर्थन में विवशता और आत्महत्या हवा में उछाल देता है महंगाई की नोंक पर . और अख़बार छापते है लफ़्ज़ों के शहर में भूखी, कराहती झोपड़ियों का उथला -उथला दर्द. तब जब आँसू से चमकीली तलवार की धार अँगुलियों की पोरों पर उतर आती है और सिर्फ एक लम्हे के लिये आदमियत के बौनेपन पर मन कसकता है. और फिर एक रोज़ आग से घिरी झोंपड़ियों को बुझाने वाले हाथ हथियारों को अर्ध्य देते है........ मैं उस बढ़ते समूह को देख एक पल के लिये ठिठकता हूँ अपना पिचका पेट भूख की त्राश जो छूरे की तेजी से कलेजा चीरती है, महसूसता हूँ और अपने लंगड़ाते क़दमों के साथ उस समूह का अंग बन जाता हूँ समूह का एक फटेहाल आगे बढ़ मेरी कमर में हाथ डाल मेरी लंगड़ाहट दूर करने की कोशिश करता है मैं उससे पूछता हूँ तुम्हारे पास कोई हथियार है ? वह उत्तर के बदले में एक सवाल उछलता है ...

दहेज़-हत्या

निरीह आँखों में ठहरा हुआ अँधेरा अंदर ही अंदर नोंच रहा है आरज़ूओं का जिस्म. उदासियाँ सिसकती है लगकर अपने कंधे से तड़पाती है माँ के मोह को. वहशियत उगने से पहले क़त्ल कर देती है रौशनी,मासूमियत,चाहत और मुस्कान. खिंच जाता है चेहरे पर खौफ ,भय हर आहट पर ! पति हो जाता है गैर मर्द और सास,ननद,ससुराल अँधेरी , ऊंघती सुरंग सांप और बिच्छुओं से भरी हुई कि चिल्लाओ तो काटने लगती है खुद ही की आवाज़ खुद को हज़ारों तरफ से लौटती पोर-पोर में भर देती है दहशत. या दर्द का दरिया मुठ्ठियों में समेट खिलखिलाने की कोशिश गिरा देती है सांप और बिच्छुओं की ज़हरीली बिलबिलाती दुनियाँ में. और ज़हरीली आग में झुलसती अँधेरे को झेलती-झेलती बन जाती है अँधेरे का हिस्सा. लिहाज़ा कविता छोड़ देती है साथ घर से टूटने के दर्द की तरह. और जब लोभ के शहर में गिरवी रख दी जाती है आखिरी पोर आदमियत की तब अखबार देते है खबर जिसे आम ख़बरों की तरह उलट देते है हम बिना सहानुभूति ,बिना दर्द के कि फिर किसी मदांध हाथी ने रौंद दिया है कमल का फूल. सुबोध मई १९८७

ढूंढ दो न जरा !

आदत जो बन गई है हादसा क़त्ल करती है भाषा,मुहब्बत,मासूमियत. याद करते है पेड़ वारिस शाह जंगल में दौड़ते खरगोश और सरसों के खेत ! चेहरा जब देखता है आईना हाथों में रख देता है दहशत उफ़ ! ये किस हीर का लहू है ? किस कबीर की लाश है ? किसने क़त्ल किया है बरसों का याराना ? किसने उगा दिया है आँगन में नफरत का दरख़्त ? क्या बेटे भूल गए है गोद की लाज , वे अभाव जो दूर किये मिल-जुल कर ? या-रब ! आदमियत कहाँ खो गई है ? ढूंढ दो न जरा !!!! सुबोध अक्टूबर १९८६

दर्द

दर्द की हदें हवा में मत उछालो. दर्द, प्यास के शहर में अकेलेपन की आग है दोस्त, दुबका लो इसे सीने में. दर्द एक जाम है हसीन महबूब का, रौशन ज़िन्दगी के लिये उठाओ ये जाम और अन्धेरें में भटकते होठों को नूर की बरात दो. पहचान जो कीचड़ के समंदर से गुज़र कर उजला जाती है; पहचान जो गंदली केंचुल को जिस्म से उतार फेंकती है दर्द भी वैसी ही एक पहचान है- आदमी होने की. नकारो न इसे . पलकों के सीने पर मचलता दर्द दूसरों के सीने में उतारना हार है अपनी मेरे दोस्त. आओ , दर्द उड़ेलने की नहीं खुद झेलने की बात करें एक अच्छी कविता के लिये. सुबोध अगस्त १९८३.

जागरूकता

मैं मेरे बच्चे को एक सपना देता हूँ उसकी आँखों में एक लम्हे के लिये चमक उभरती है फिर दुसरे लम्हे वह भोली मासूम चमक मुझ पर एक सवाल उछाल देती है, पापा जो दर्द ग्रांडप्पा ने आपको दिया वो मुझे क्यों देते है ? और मुझे लगता है इसका दिमाग अब सोलहसाला नहीं रहा है. सुबोध अगस्त १९८३