ज़िन्दगी इतनी हसीं नहीं रही अब
कि जीने की ख्वाइस बाकी हो !!
जिए जा रहा हूँ बेमन से
बुढ़ापे के अपने दर्द होते है
और अपनी पीड़ा
जिसे समेटे हुए खुद में
जिए जा रहा हूँ मैं
क्योंकि
उसे यकीं है खुद की मोहब्बत पर
कि जब तक वो जिन्दा है
उसकी जिम्मेदारियां मैं उठाऊंगा
और मैं उसका यकीन
बरक़रार रखना चाहता हूँ
आखिर उसने सालों साथ निभाया है
मेरी हर हार में साथ खड़ी रही है मेरे
हर धुप में साया बनकर
हज़ार वैचारिक मतभेद के बावजूद
अँधेरे में दीपक बनकर
वो हर फ़र्ज़ निभाया है उसने
जो एक पत्नी निभाती है !!!
सुबोध-२५ सितम्बर,२०१४

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