वक़्त की नब्ज़ — AI
2. स्विच तुम्हारे हाथ में है
तुमने कहा — AI को अपनाना इतना आसान नहीं।
मैंने पूछा — या अपनाने की कोशिश इतनी कम है?
ज़िन्दगी में हर बड़ा बदलाव पहले मुश्किल लगता है — फिर आदत बन जाता है — फिर ज़रूरत बन जाता है — और एक दिन ऐसा आता है कि उसके बिना ज़िन्दगी की कल्पना भी नहीं होती।
याद करो जब पहली बार मोबाइल हाथ में आया था।
उस वक़्त कितने लोगों ने कहा था — "हमें क्या ज़रूरत इस खिलौने की, हमारा काम तो landline से चल जाता है।" आज वही लोग मोबाइल के बिना एक दिन नहीं गुज़ार सकते — सुबह अलार्म से लेकर रात को तकिये के नीचे रखने तक।
बदलाव नहीं आया था तो मुश्किल लगता था।
बदलाव आ गया तो ज़िन्दगी का हिस्सा बन गया।
AI भी उसी रास्ते पर है।
लेकिन एक फ़र्क है —
मोबाइल आया तो वक़्त था अपनाने का — धीरे-धीरे, आराम से। AI आया है तो वक़्त उतना नहीं है — दुनिया इस बार बहुत तेज़ दौड़ रही है। जो आज सीखेगा वो कल आगे होगा — जो आज टालेगा वो कल पीछे होगा।
और पीछे रहने का दर्द — वो दर्द सीखने की तकलीफ़ से कहीं ज़्यादा होता है।
एक बात और —
AI को अपनाने के लिए इंजीनियर होना ज़रूरी नहीं। कोडिंग जाननी ज़रूरी नहीं। बड़ी डिग्री ज़रूरी नहीं। बस एक चीज़ ज़रूरी है — जिज्ञासा। वो जिज्ञासा जो बच्चे में होती है जब वो पहली बार कुछ नया देखता है — आँखें बड़ी हो जाती हैं, हाथ आगे बढ़ता है, मन पूछता है — "ये क्या है?"
वो बच्चा तुम्हारे भीतर अभी भी है।
बस उसे एक मौका दो।
कोडक ने नहीं दिया — मिट गई।
नोकिया ने नहीं दिया — इतिहास बन गई।
और न जाने कितने लोग हैं जिन्होंने वक़्त की आवाज़ नहीं सुनी — और वक़्त उन्हें सुनाता रहा।
तुम उनमें से नहीं हो — या हो?
ये सवाल तुमसे है, मुझसे नहीं।
क्योंकि स्विच हमेशा से तुम्हारे हाथ में था — बिजली हमेशा से थी। फ़र्क सिर्फ इतना था कि किसी ने स्विच दबाया और रोशनी में चला गया — और किसी ने हाथ पर हाथ धरे अँधेरे में बैठे रहने को ही अपनी नियति मान लिया।
नियति वो नहीं जो होती है —
नियति वो है जो तुम चुनते हो।
स्विच तुम्हारे हाथ में है —
दबाओगे या नहीं?
ये फ़ैसला तुम्हारा है।

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