संदेश

27 . ज़िंदगी – एक नज़रिया

सच क्या सिर्फ वही है जो तुम देखते हो , महसूस करते हो , छूते हो, गले लगाते हो, जीते हो और ख़ुश होते हो कि तुम सच से रूबरू हो !!! सच का एक दूसरा पहलू भी होता है जिसे तुम सब कुछ जाने के बाद भी नहीं जानते !!! एक अनदेखा ,अन्जाना, अचिन्हित सच !! तुम्हारा आज का सच क्या पता कब सिक्के का दूसरा पहलु बन जाए !! जिस सच को तुम पकड़ कर गौरवान्वित हो रहे हो,एक कोलंबस उसे तिरोहित कर देता है !!! एक नई खोज , एक नया आविष्कार कितनी पुरानी धारणाएं, कितने पुराने सच बदल देता है सोच कर आश्चर्य है क ि हम किस सच को ज़िन्दगी का सम्बल मान रहे है !! उस सच को - जिसके बारे में निश्चित नहीं कि कल वो सच सच रहेगा या नहीं !!! तांगे का सच ' नया दौर ' के दिलीप कुमार का सच हो सकता है लेकिन ज़िन्दगी का सच नहीं हो सकता , अगर उस सच को , उस बदलाव को आप स्वीकार नहीं कर पा रहे है तो निश्चित ही आप ज़माने की रफ़्तार को रोकने की कोशिश कर रहे है , कोडक कैमरे के भरोसे मोबाइल के फोटो फीचर्स को रोकने का प्रयास कर रहे है !! इस सूचना क्रांति युग में कोई भी सच कभी भी पुराना सच हो सकता है - एक रिकॉर्ड प्लेयर की तरह !! पुराने सच का सम्मान...

37 . पैसा बोलता है ...

तुम्हारी हार की वजह , असफलता की वजह तुम्हारा अहंकार है कि मैं सब कुछ जानता हूँ - मैं मानता हूँ तुम बहुत कुछ जानते हो , जवान हो , काबिल हो, नई पीढ़ी से हो, टेक्नोलॉजी कैसे काम करती है, सिस्टम कैसे बनाये जाते है , कैसे चलाये जाते है - सब कुछ जानते हो तुम और इस सब कुछ जानने ने तुम्हे अहंकारी बना दिया है जिसे तुम सब कुछ जानना समझ रहे हो और जिस वजह से तुम्हे अपने ज्ञान का गुरूर है वो सब कुछ जानना तब तुम्हारी हार की पोल खोल देता है जब तुम्हारे बैंक स्टेटमेंट द ेखे जाते है !! तुम्हारा सारा ज्ञान किताबी ज्ञान है , सामाजिक ज्ञान है , लफ्फाजी ज्ञान है - इतने वाक्पटु हो तुम , इतने कॉंफिडेंट नज़र आते हो कि किसी को भी भरमा सकते हो , जब मार्केटिंग की बात आती है तो जितनी डिटेल में जाकर तुम चीज़ों को बयां करते हो , तुम पर गर्व होता है , जब सेल्स की बात आती है तो जितने कफिडेन्स से तुम क्लाइंट से बात करते हो और प्रोडक्ट सेल कर देते हो , आश्चर्य होता है और तुम्हारे भविष्य को सिक्योर महसूस करता हूँ लेकिन परेशान तब हो जाता हूँ जब तुम्हारे बैंक स्टेटमेंट देखता हूँ !! क्या है ऐसा जो तुम नही...
हाँ मैं मेट्रो में रहता हूँ मैं हँसता हूँ क्या फर्क है शहर की खड्डों वाली और गाँव की टूटी सड़क में ? क्या शहर के लिए अलग सप्लाई है अनाज की गाँव की अलग ? कहाँ है फर्क पीने के पानी में दूध शहर में भी नकली और गाँव में भी बिजली विभाग की मेहरबानियाँ शहर और गाँव में फर्क नहीं करती प्रदुषण ? सूरज की रौशनी ? बेरोज़गारी ? गन्दगी ? शोरगुल ,टी.व्ही ? फैशन ? सपने ? बाइक, गाड़ी ? दहेज़ ? औरत ? या मर्द की मानसिकता ? हीरे क्या शहर में ही पैदा होते है ? हुनरमंद लोग क्या शहर में ही होते है ? भ्रूण हत्या क्या गांवों में ही होती है ? तकलीफ गांव में और आराम क्या सिर्फ शहर में होता है ? ढेरों सवाल और जवाब सोचता हूँ और सोचता रहता हूँ क्योंकि मेरे जवाब और आपके जवाब में फर्क है मेरे जवाब मेरी मानसिकता है और आपके जवाब आपकी मेरे जवाब मेरे अनुभूत सच है और आपके जवाब आपके सच क्या आपको नहीं लगता फर्क गांव और शहर से ज्यादा पैसे का है जड़ों का है किस्से- कहानियों का है अधूरेपन और पूरेपन का है !!! सुबोध- अप्रैल २७,२०१५

39 . ज़िंदगी – एक नज़रिया

क्या करोगे जीत का सेहरा पहन कर ? अपनों को दुखी कर उनके खिलाफ लड़ी हुई जंग में जीत भी गए तो क्या ,ये जंग किसी कौरव की नहीं,किसी पांडव की नहीं उनकी है जो कल भी तुम्हारे थे,आज भी तुम्हारे है और तुम चाहे जीतो या हारो तुम्हारे ही रहेंगे . तुम खेल रहे हो अपने बच्चे के साथ और उसे खेल में हरा देते हो, खुश होते हो जबकि तुम्हारा उद्देश्य बच्चे को कंपनी देना था , उसके चेहरे पर मुस्कान की ताबीर लिखना था ! और तुमने अपनी चंद लम्हों की ख़ुशी के लिए उसे रोआंसा कर दिया जबकि तुम उसमे एक नूर तलाश रहे थे ,एक चपलता ,एक कोमलता ,एक खिलन्दड़ापन ,एक सहजता,एक सजगता और अपनापन तलाश रहे थे . वाह , क्या नशा है जीत का !! विवाद होता है माँ-बाप से पत्नी से बच्चो से और तुम अपनी बात सही साबित करकर जीत जाते हो बिना पूरी तरह उनका पक्ष जाने और खुद खुश होते हो बिना उनकी खुशी की परवाह किये , जिस तरह तुमने अपनी जीत पक्की करकर अपने बच्चे की ख़ुशी की परवाह नहीं की जबकि तुम्हारा उद्देश्य बच्चे को खुश करना भर था ! उसे जीत का आनंद देना था ,बड़प्पन देना था ! तुम्हे आदत पड़ गई है जीत की, हार तुम्हे रास नहीं आ...

38 . ज़िंदगी – एक नज़रिया

मुझे याद है बचपन में मैं खुद के बनाये हुए मिटटी के घरोंदे मन भर जाने पर या खेल ख़त्म होने पर बड़ी सहजता और बिना किसी तकलीफ या दर्द के एहसास के तोड़ दिया करता था , आज उतनी सहजता के कुछ भी नहीं कर पाता, यहाँ तक कि खाना खाते वक्त भी ध्यान रखता हूँ मुंह ज्यादा नहीं खोलना है ,कौर छोटे रखने है ,धीरे-धीरे चबा-चबा कर खाना है जबकि बचपन में बड़ा सा कौर मुंह में ठूंस कर भाग जाया करता था दोस्तों के साथ खेलने को ,बिना किसी बड़े की टोका-टाकी की परवाह किये. बड़े होने की कीमत हमने सहजता खोकर चुकाई है !! चेहरे पर ओढ़ी हुई झूठी मुस्कान कभी-कभी बड़ी चुभती है -बचपन में जब किसी से नाराज़ होते थे खुलेआम उससे कुट्टी करते थे लेकिन आज ? आज तो खुल कर रो भी नहीं पाते !! और न ही खिलखिलाकर हंस पाते है !! काश वो बचपन की मासूमियत ,वो सहजता ,वो खिलन्दड़ापन , वो मस्तियाँ, वो बेफिक्री , वो बेशर्मी ,वो निश्छलता , वो अपनापन और वो बेगानापन (जो भी था खुलेआम था ) वापिस जी पाते ,वापिस हासिल कर पाते !! मैं आज मेरी कॉलोनी के बच्चे देखता हूँ और अपने बचपन से उनके बचपन की तुलना करता हूँ तो एहसास होता है माताएं...

सफलता -एक उम्मीद

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जिस ऊंचाई की बात तुम करते हो डर लगता है उस ऊंचाई के बारे में सोच कर भी लेकिन जब सोचता हूँ , मथता हूँ खुद को तो पाता हूँ सौ मील का फ़ासला भी कदम-कदम चल कर तय होता है , आज इतना बड़ा मैं एक-एक दिन गुजार कर हुआ हूँ तो हासिल कर लूंगा वो ऊंचाई भी जिसकी बात तुम करते हो रफ्ता-रफ्ता ... सुबोध- अप्रैल ७, २०१५

37 . ज़िंदगी – एक नज़रिया

ज़िन्दगी में असफल वही लोग है जो गलतियाँ नहीं करते क्योंकि गलती होने के डर से वे कभी भी अपने पूर्ण प्रयास नहीं करते ,ऐसे लोग अपनी स्कूली शिक्षा में अच्छे होते है क्योंकि स्कूली शिक्षा में गलतियों पर दण्डित किया जाता है ,गलतियों से बचा जाता है . ऐसे लोग जब अपने दम पर ज़िन्दगी जीना शुरू करते है तो उन्हें एहसास होता है कि ज़िन्दगी जीने के लिए - एक ऊंचाई हासिल करने के लिए सड़क की शिक्षा महत्त्वपूर्ण है , स्कूल की शिक्षा ज़िन्दगी जीने में सहायक हो सकती है लेकिन ऊंचाई तक पहुंचने के लिए वो शिक्षा काम आती है जो सड़क से हासिल होती है. सड़क की शिक्षा आपको गलतियाँ करने ,उन गलतियों से सबक सीखने, पर्याप्त सुधार करने और फिर नए सिरे से प्रयास करने और सफलता हासिल करने से मिलती है वो शिक्षा आपको गलती होने के डर से आज़ाद करती है जबकि स्कूल की शिक्षा आपको गलतियों पर दण्डित करती है . सोचिये अगर स्कूल में साईकल चलाना सिखाया जाता तो क्या होता ? जो भी गिर जाता उसे दण्डित किया जाता और दंड के भय से अंततः वो साईकिल छूने से भी डरता जबकि सड़क की शिक्षा में साईकिल चलाना कितना आसान है ! सुबोध-अप्रै...