दहेज़ - हत्या

नहीं छूट पाती हाथों की मेहंदी
नहीं मिटती जिस्म से
नवविवाहिता की गंध
कि दरकने लगते है सपने ;
सास के चेहरे से उतर जाता है
माँ के चेहरे का मुखौटा,
खिल्ली उड़ाता हुआ
पति हो जाता है पराया
अपना बनने से पहले.
जिस्म और रूह
बन जाते है
ज़ख्मों का जेल-खाना .
आतंक उभर उठता है
आँखों में- अंदर ही अंदर घुटता .
लम्हे दर लम्हे
मोह घर - आँगन का
जुड़ भी नहीं पाता
कि क़त्ल कर दी जाती है मासूमियत.
बेअसर हो जाती है
माँ की हिदायतें
सखियों के सुझाव.
और एक रोज़
जब हो जाती है हद
समाज के
अवैध खाते में दर्ज़ हिसाब
न चूका में विवश ज़िन्दगी
दहशत की चमक में
अपनी डोर
सौंप देती है काले अँधेरे को.
और अख़बारों की
चटख भरी ख़बरों में जुड़ जाती है
खिलने से पहले मुरझा गए गुलाब की खबर .

सुबोध फरबरी १९८७

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