रिश्ते

खून के रिश्ते से
ज्यादा सही और सच
एक रिश्ता होता है
आपस की समझदारी
और सामंजस्यता का
जो शबनम सा चमकता
और माटी सा महकता है
इस रिश्ते को कहते हैं
प्यार,स्नेह,वात्सल्य
या पसंद हो जो नाम तुम्हें

सही और सच
सिर्फ खून के रिश्ते नहीं होते...
क्योंकि कभी-कभी खून के रिश्ते
मारने लगते है सड़ांध
और संबंधों में पड़ जाती है
न पटने वाली दरार
मगर समझ के रिश्ते में
नहीं होता स्वार्थ
सो नहीं दरकते आशाओं के महल
और नहीं फैलती संबंधों में कटुता .

फिर भी तुम्हें प्यारे है अगर
खून के रिश्ते ज्यादा
तो उनमे समो लो
समझदारी और सामंजस्यता
जिससे रिश्ते ज्यादा प्रगाढ़
और खूबसूरत हो.
और दुनिया मोहताज़ ना रहे
खून के रिश्तों की.

सुबोध अगस्त १९८६

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