कारवाँ

चौंककर उठा हुआ
कहीं अंदर तक टूटा अहम्
आकाश गंगा को
सड़क की तरह बिछा
उस पर टहलने लगता है
लेकिन जब
हथेलियों पर बैठा
कालापन ठहाके लगाता है
सड़क
पहुँच से ऊँची हो जाती है
परन्तु यह बोध
तोड़ता नहीं
संतुलित करता है.
वर्तमान के सीने पर रखी
नींव पर ही
कल महल बनेगा
और मेरे पांव
सिर्फ दो नहीं रहते
कारवाँ हो जाते है.

सुबोध मार्च १९८३.

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