कवितायेँ -- एक साथ

हाँ, मैं मेट्रो में रहता हूँ

मैं हँसता हूँ
क्या फर्क है शहर की खड्डों वाली
और गाँव की टूटी सड़क में ?
क्या शहर के लिए अलग सप्लाई है अनाज की
गाँव की अलग ?
कहाँ है फर्क
पीने के पानी में
दूध शहर में भी नकली और गाँव में भी
बिजली विभाग की मेहरबानियाँ शहर और गाँव में फर्क नहीं करती
प्रदुषण ?
सूरज की रौशनी ?
बेरोज़गारी ?
गन्दगी ?
शोरगुल ,टी.व्ही ?
फैशन ?
सपने ?
बाइक, गाड़ी ?
दहेज़ ?
औरत ?
या मर्द की मानसिकता ?
हीरे क्या शहर में ही पैदा होते है ?
हुनरमंद लोग क्या शहर में ही होते है ?
भ्रूण हत्या क्या गांवों में ही होती है ?
तकलीफ गांव में
और
आराम क्या सिर्फ शहर में होता है ?
ढेरों सवाल
और जवाब
सोचता हूँ
और सोचता रहता हूँ
क्योंकि
मेरे जवाब और आपके जवाब में फर्क है
मेरे जवाब मेरी मानसिकता है
और आपके जवाब आपकी
मेरे जवाब मेरे अनुभूत सच है
और आपके जवाब आपके सच
क्या आपको नहीं लगता
फर्क गांव और शहर से ज्यादा
पैसे का है
जड़ों का है
किस्से- कहानियों का है
अधूरेपन और पूरेपन का है !!!
सुबोध- अप्रैल २७,२०१५


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  सफलता -एक उम्मीद

जिस ऊंचाई की बात तुम करते हो
डर लगता है
उस ऊंचाई के बारे में सोच कर भी 
लेकिन जब सोचता हूँ , मथता हूँ खुद को
तो पाता हूँ
सौ मील का फ़ासला भी
कदम-कदम चल कर तय होता है ,
आज इतना बड़ा मैं
एक-एक दिन गुजार कर हुआ हूँ
तो हासिल कर लूंगा
वो ऊंचाई भी
जिसकी बात तुम करते हो
रफ्ता-रफ्ता ...
सुबोध- अप्रैल ७, २०१५

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 तुम जो गलत बताते हो मुझे
कभी पहन कर देखो मेरे जूते
और चलो उतनी दूर
चला हूँ जितनी दूर मैं
तब शायद तुम समझ सको
मेरी कमजोरियां , मेरी मजबूरियां
बड़ा आसान है तुम्हारे लिए
खुद के जूते पहन कर सफर तय करना
खुद को सही और मजबूत साबित करना
मेरा सही या गलत होना मैं नहीं
तय करते है मेरे जूते
या तुम्हारा चश्मा
जो तुमने पहना है अपनी आँखों पर .
सुबोध- जनवरी २८, २०१५

 

 

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एक कोशिश और

मुझे याद नहीं
कितनी बार गिरा हूँ मैं
कितने ज़ख्म बने मेरे जिस्म पर
कितनी बार दिल चीरती हँसी
हँसी गई मुझ पर
मगर रूका नहीं मैं
गिर-गिर कर उठा मैं
झाड़ी अपनी धूल

मुस्कुराया हल्का सा
कसी अपनी मुट्ठियाँ
और डाल कर आँखों में आँखे
कहा ज़िन्दगी से -

मैंने हार से बचने का
एक तरीका और सीखा है ,
सफलता इंतज़ार कर रही है मेरा
आ, एक कोशिश और करें !


- सुबोध १३ नवंबर, २०१४

 

 

 

 

 

 

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कविता

उन्हें मुगालता ये हो गया
कि वे कवि हो गए
मैं उनको पढता हूँ
और हँसता हूँ !
अंदर से कोई कहता है
तुम कवि नाम के प्राणी
सिर्फ दूसरों की टांग खींचते हो
अनगढ़ शब्दों को

वाक्य विन्यासों को
पढ़ते हो ,देखते हो
व्याकरण की शुद्धि
जांचते हो, चर्चा करते हो
नाक मुंह सिकोड़ते हो
भावों को नहीं पढ़ते
दिल की आवाज़ नहीं सुनते
तुम जैसे कवि
तालाब के मेंढक होते है
कविता के नाम पर धब्बा होते है
क्या कविता सिर्फ शब्दों का जोड़-तोड़ है
तालियों की गड़गड़ाहट है
मूक संवेदना,
मूक भाव,
लडखडाती अभिव्यक्ति
लूले-लंगड़े,आधे-अधूरे शब्द
क्या किसी की कविता नहीं हो सकते ?
सोचना - सोचकर जवाब देना -
अन्यथा बेड़ियों में बंधी हुई
संस्कारों में जकड़ी हुई
तुम्हारी कविता
नए युग की आंधी में
दम तोड़ देगी
सिर्फ किताबों की शोभा बढ़ाएगी
तालिया पीटने के काम आएँगी
आम आदमी से दूर हो जाएगी
अँधे युग में
अँधो को लुभाएगी
पागलों को हँसाने और
गूंगे-बहरों से तालियां
पिटवाने के काम आएगी !!
सुबोध- ८ नवंबर ,२०१४

 

 

 

 

 

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तुम आओगे ..



वो लफ्ज़
जो तुम्हारी आँखों ने कहे थे मुझसे
आज भी सहेज रखे है मैंने
वो लफ्ज़
न दिखते है न मिटते है
एक फाँस की तरह सीने में चुभते है

तब जब
आँखों की कोरों से बहते अश्क
पोंछती है उंगलियाँ
एक दर्द अजीब सा
उँगलियों की पोरों में समां जाता है

वो लफ्ज़
जो कहे तुम्हारी आँखों ने
और मैंने उन लफ़्ज़ों से
बुन लिए सपने
और मेरे सपने
आज भी उघड़े बदन
तेरी बाट जोहते है
सुबह आरती में शीश नवाते है
और साँझ को संध्या करते है .

वो लफ्ज़
जिनमे तेरे कजरे की महक है
अँधेरे में दिये की मानिंद
रौशन है मेरी ज़िन्दगी में
मुझे एतबार है
तेरी आँखों की ज़ुबान पर
उस चाहत पर
जहाँ शरीर पीछे छूट जाते है
मन मिल जाते है
तुम आओगे ..तुम आओगे ...तुम आओगे ...

सुबोध - ११ अक्टूबर,२०१४

 

 

 

 

 

 

 

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बापू



जहाँ बादल इन्द्रधनुष बोते थे
वहां अब संगीनें बोई जाती है
मासूम बच्चे गुड्डे-गुड़िया से खेलने वाले
हथगोलों से खेलते है
पहाड़ी नदियों से बहा है इतना लहू
कि वहां के वाशिंदे
पानी की जगह लहू से मुँह धोते है
खेतों में खलिहानों में
सूनापन छाया है
मरे हुए ढोर-डांगर पड़े है
मोहब्बत का गीत गानेवाला मुल्क मेरा
किसी बुरी खबर पर रो भी नहीं पाता
कि एक हादसा और चला आता है
बापू, क्या यही
तुम्हारे सपनो का देश है ?

आज़ादी की कीमत में
तुमने तो हमें गुलामी खरीद दी
मालिकों के चेहरे भर बदले है
नीयत में तो खोट पहले से ज्यादा है
गावों से उसकी आत्मा निकाल कर
शहर के फूटपाथ पर
लावारिस बना कर लिटा दी गई है
गावों में भारत बसता है
अच्छा मजाक बन गया है
यहाँ मन की शांति
सोने की चिड़िया बन गई है
बापू, क्या यही
तुम्हारे सपनो का देश है ?

-सुबोध - अक्टूबर १,१९८५

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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क्या सही है , क्यों सही है ??? ( भाग-5 )


बेटियों को अच्छा बताने के लिए ,क्यों बुरा बताऊ बेटों को ?
समाज ने बेटों को अहमियत दी , बेटी को नहीं दी तो उसका बदला इस तरह लिया जाए ?
बेटी को प्यार दिया, किसने ?
बहु को इज्जत दी , अधिकार दिए . किसने ?
माँ को सम्मान दिया इतना कि चरणो में स्वर्ग मान लिया . किसने ?
ये सब प्यार, इज्जत ,सम्मान देने में क्या मर्द ( बेटे ) शामिल नहीं थे ?
तो फिर सारे मर्द गलत कैसे हो गए ?
--
बहु-बेटी जलाई जाती है, घर से माँ-बाप बेदखल किये जाते है , ढेरों गलत व्यवहार किये जाते है ?
क्या अकेला मर्द करता है ?
--
सालों से कोई प्रताड़ित किया जाता है, आलोचना की जानी चाहिए उसकी
लेकिन आलोचना का मतलब विद्वेष नहीं होता !!!
किसी एक के अहम में हुंकार भरने के लिए
दूसरे का अहम रौंदना तो नहीं चाहिए , कुचलना तो उचित नहीं !
--
और क्या एक के बिना दूसरा पूरा है ?
राखी होगी, कलाई नहीं
कलाई होगी ,राखी नहीं
मांग होगी ,सिन्दूर नहीं
सिन्दूर होगा ,मांग नहीं
एक के बिना दूसरा अधूरा है
बात पूरेपन की करें अधूरेपन की नहीं !!!
सुबोध - २७ सितम्बर,२०१४
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ज़िन्दगी इतनी हसीं नहीं रही अब
कि जीने की ख्वाइस बाकी हो !!
जिए जा रहा हूँ बेमन से
बुढ़ापे के अपने दर्द होते है
और अपनी पीड़ा
जिसे समेटे हुए खुद में
जिए जा रहा हूँ मैं
क्योंकि
उसे यकीं है खुद की मोहब्बत पर
कि जब तक वो जिन्दा है
उसकी जिम्मेदारियां मैं उठाऊंगा
और मैं उसका यकीन
बरक़रार रखना चाहता हूँ
आखिर उसने सालों साथ निभाया है
मेरी हर हार में साथ खड़ी रही है मेरे
हर धुप में साया बनकर
हज़ार वैचारिक मतभेद के बावजूद
अँधेरे में दीपक बनकर
वो हर फ़र्ज़ निभाया है उसने
जो एक पत्नी निभाती है !!!
सुबोध-२५ सितम्बर,२०१४

 

 

 

 

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माँ


मेरी तोतली जुबान को समझना आसान न था
लेकिन तुम समझती थी
बिना कुछ कहे मेरे रोने की असली वजह
तुम समझती थी
मेरी खाली जेब और गुस्से की बातें
तुम समझती थी
आँखों में बसी इश्क़ की खुमारी को
तुम समझती थी
ज़माने की बदलती हवा को
तुम समझती थी
मेरे बदलते रिश्तों का बदलना
तुम समझती थी
और
और मैं तुम्हे कहता था
तुम कुछ नहीं समझती, माँ !!!

मैं कल भी नासमझ था
आज भी नासमझ हूँ
मैं शब्दों को लिखता,पढता,समझता हूँ
और तुम
माँ ,तुम सब कुछ समझती हो !!!

सुबोध- १५,सितम्बर,२०१४

 

 

 

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ख्वाइशें

ख्वाइशें
काफी दिनों से ठहरी है  

मेरे साथ मेरे घर में .

एक पुराने बिछड़े दोस्त की तरह
वक्त-बेवक्त
जगाती है मुझे
और पूछने लगती है
वही जाने- पहचाने सवाल
जो कभी चिढ़ाते है मुझे
और कभी लगते है खुद का वजूद

जब भी तन्हा होता हूँ
मेरे पास आकर बैठ जाती है
उसके आने से मन में उजाला
हो जाता है
तन्हाई उसकी बातों से
खिलखिलाने लगती है
एक नए सन्दर्भ के साथ

मुझे अहसास है
जब ये जुदा होगी मुझसे
मैं बिखरूँगा
और जब ये बन-संवरकर
आ जाएगी मेरी ज़िन्दगी में
मैं निखरूँगा.

सुबोध- ३० अगस्त, २०१४

 

 

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प्यार का किस्सा


तुमने जब थामा मेरा हाथ
आंसुओं की हंसी फ़िज़ा में तैर गई

मन के किनारों पर
भावनाओं के हुजूम में
एक-एक किस्सा
एक-एक लम्हा
सर पर हाथ रखने लगा
आशीष की तरह

डूबता सूरज
नारंगी बिंदी बन
चस्पा हो गया
मेरे माथे पर
मैं खिल गई
महक गई
पूनम की रात में
रात रानी सी

लिखने लगी जब
प्यार का किस्सा
मेरी कलम
तुम्हारे नाम पे अटक गई !!!

सुबोध - २७ अगस्त, २०१४

 

 

 

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मेरा इश्क़ मेरा नसीब



इश्क़ का कुरता मैला हो गया
और मेरी जीभ में जख्म
इसकी पाकीज़गी बताते-बताते
मगर निगोड़ा ज़माना
मोहब्बत को
ज़िन्दगी की अमावस समझता है
रूह का नूर नहीं .

शायद खुद गुजरे है
उस नाकाम मोहब्बत के मकाम से
आग के तूफ़ान से
कि ज़माने को बचाने लगे है
मोहब्बत के नाम से .

ऐ ! मौला
तेरी छत के नीचे
वादों की छत बना रहा हूँ
ठिठुरते इश्क़ को आगोश की गर्मी
शायद कुछ सुकून दे
और सूरज सा हौंसला
मेरे ख्यालो को सच्चाई दे.

मेरे मौला !!
तू गवाह रहना
जो हारे है उनका भी
और मेरी जीत का भी
उनकी नाकामी मेरा नसीब क्यों बने
क्यों न मेरी जीत मेरी ज़िन्दगी बने ?

  सुबोध - २६ अगस्त ,२०१४ 

 

 

 

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क्या सही है , क्यों सही है ??? ( भाग-4 )

एक तूफ़ान जो गुजरा मेरे जिस्म पर से
मेरी मासूमियत उड़ा ले गया
मौत से भी खौफनाक
ज़िन्दगी छोड़ गया
जिनकी बाँहों में खेली-कूदी
उनकी निगाहों में गलीज़ हो गई
बाप के कंधे झुक गए
माँ की आँखों में पानी भर गया
भाई कहीं कमजोर हो गया
सखी सहेलियाँ ,सारी गलबहियाँ
अजनबी हो गई.
फुसफुसाहट अपनी हो गई
खिलखिलाहट  पराई हो गई
खिड़की जो खोली थी
सूरज ने रोशनी की
अमावस की काली रात हो गई
  उफ़ !
मैं औरत
औरत  न रहकर 
 जिस्म हो गई
बलात्कार झेला हुआ एक नाम हो गई
बदन का पानी तेजाब बन
जलाने लगा खुद को
पड़ोसियों की कानाफूसी
पीड़ा का पेड़ हो गई
यारब ! ये क्या हो गया
कल का फूल
आज काँटा हो गया
होठों  की हँसी
आँखों की बरसात हो गई
ज़माने में दिखाने को
मेरा दर्द अपना हो गया
और झेलने को
पराया हो गया
औरत होने की पीड़ा
मेरा  नसीब हो गई
माँ - बहन की कोख इज्जत हो गई
और मेरी कोख गरम गोश्त हो गई
रौंदी मैं गई
और उफ़ !
उफ़!!
 गुनाहगार भी
मैं ही हो गई   !!

सुबोध- २४ अगस्त,२०१४ 

 

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आओ कान्हा ,आओ !!



तंग न करो कान्हा
न बजाओ बांसुरी
मैं बहुत दुखी हूँ
अभी हरे है
कई घाव
दर्द से कराहती आत्मा के साथ
कैसे नाचूँ
कैसे झूमूँ
तुम्हारी बांसुरी की तान पर ...

कुछ करो कान्हा
अब झूट-मूट का
तुम्हारा जन्मदिन मनाने का नहीं
सच में तुम्हारा
अवतार का वक्त आ गया है .
आओ कान्हा ,
आओ !!
जन्मों नहीं
अवतार लो !!!
अब तो
पीड़ित मानवता के दर्द हरो !!!

सुबोध- अगस्त १७, २०१४ जन्माष्टमी पर


 

 

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क्या सही है , क्यों सही है ??? ( भाग-3 )



बूढ़े बरगद के नीचे
दो जिस्म कटे पड़े है
दोनों पर मक्खियाँ भिनभिना रही है
खून जो दोनों का बहा है
रंग उसका लाल है
हवा दोनों के ही बदन को छूकर
गुजर रही है
बिना किसी भेद-भाव के
दोनों के चेहरे पर ठहरी है हिंसा यकसां
बरगद की टूटी शाखों के बीच से
छनकर आते धुप के टुकड़े
झिलमिला रहे है दोनों के ही जिस्म पे
एक के जिस्म पे
लिपटी है रामनामी
और दुसरे के सर पे गोल टोपी
ज़िंदा होते एक हिन्दू था
दूसरा मुसलमान
एक हर-हर महादेव था
दूसरा अल्ला-हो अकबर था
एक मंदिर था
एक मस्जिद था
और मरने के बाद दोनों
इंसान हो गए
हाँ, दोनों इंसान हो गए !!!

नहीं ,
ये ज़िंदा रहते भी
एक हिन्दू था
और दूसरा मुसलमान
और मरने के बाद भी .
हम धर्म नहीं है
हम मजहब नहीं है
बल्कि
हम धरम के नाम पर
मजहब के नाम पर
तुम्हारे जिस्म का खून है
तुम्हारी रूह का सुकून है
वो इंसानी जज्बात है
जिसके बिना इंसान हैवान है
ज़िंदा तो क्या हम तो
मुर्दों का भी
रखते ख्याल है
अब देखना
हिन्दू जलाया जायेगा
मुसलमान दफनाया जायेगा
एक में पंडित
और दुसरे में मौलवी
काम आएगा
एक का बारहवाँ होगा
दुसरे का चालीसा
हम तुम्हारे वो खैरख्वाह है
जो माँ की कोख में ही तुम्हारा
बंटवारा कर देतें है
अब इंसान नहीं पैदा होते
हमारे नुमाइंदे पैदा होते है
हम तो सिर्फ अपना फ़र्ज़ निभा रहे है
हमे नीली छतरीवाले ने नहीं
तुम्हीं ने बनाया है
उसने तो सभी को इंसान बनाया था
तुम्ही ने एक हिन्दू बनाया
एक मुसलमान बनाया
और तो और जिसने तुम्हे बनाया
तुमने तो उसे भी नहीं छोड़ा
एक को अल्लाह बनाया
और दुसरे को भगवान बनाया .


उफ़--
उफ़ , सोच-सोच कर हैरान हूँ
उस बच्चे के बारे में
जिसके सर से साया उठा है
क्या फर्क है
बाप में ,अब्बु में ?
क्या फर्क है उस औरत में
जिसे विधवा कहो या बेवा ??

ये
इंसानियत नाम का खजाना
धरम, मज़हब नाम के महल में
कहाँ खो गया ?
इंसान इंसान होने से पहले
हिन्दू हो गया
मुसलमान हो गया ???

सुबोध- अगस्त ८,२०१४




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सकारात्मकता

मेरे दोस्त !!
मेरे शुभचिंतक !!
मैं शुक्रगुजार हूँ तुम्हारा
तुम्हारी मेहरबानियों का .
मुझे इस्तेमाल करके
ये बताने का कि
“मुझ से बेहतर और कोई दोस्त
नहीं मिल सकता तुम्हे !!”
और जब मेरा बुरा वक्त आया
मैं अकेला था .
कहते है अँधेरे में तो
साया भी साथ छोड़ देता है

तुम
मेरे बेहतरीन दोस्त
तुम्हे शायद भरोसा था
मेरी काबिलियत पर
कि हर मुसीबत से
निकल सकता हूँ मैं
और मैं निकल आया ...
आ गया पहलेवाली
शानो-शौकत में .
शुक्रगुजार हूँ मैं तुम्हारा
कि तुमने मुझे नए सिरे से
परखने दी अपनी काबिलियत ....

आओ दोस्त !!
आओ, पास बैठो
पहले की तरह ठहाके लगाएं
पुराने किस्से सुनाये
और वक्त जरूरत
एक -दूसरे के काम आएं !!!

सुबोध - २ अगस्त, २०१४


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बेवफा - एक बयान

तुम्हारी बेरुखी
तोड़ती नहीं मुझे
देती है सम्बल
कि बन सकूँ काबिल
जिस से
न उठे कल कोई उँगली
न मेरे खिलाफ
न तुम्हारे खिलाफ

ज़माने भर की रुस्वाइयां
और टूटना उनका
बने है जिनके आशीर्वाद से
गंवारा ना होगा मुझे
सिर्फ तुम्हारी आँखों में चमक देखने के लिए
उम्र भर का दर्द कैसे दे दू उन्हें ?

मोहब्बत मेरी और तुम्हारी
पाक है और जायज़ भी
लेकिन नापाक और नाज़ायज़
उनकी भी तो नहीं
कि अपनी मोहब्बत के लिए
उनका प्यार कैसे बिसरा दूँ ?
.
मानता हूँ मैं
कि हम दोनों बड़े अहम है
एक दुसरे की ज़िन्दगी में
एक- दूसरे के लिए
लेकिन उनकी ज़िन्दगी मेँ
सबसे अहम तो मैं हूँ
मैं अपनी अहमियत
बरकरार रखने के लिए
उनकी अहमियत
कैसे नकार दूँ ?

जो कुछ किया उन्होंने
फ़र्ज़ समझ कर किया
उन्हें जब याद रहे अपने फ़र्ज़
तुम्ही कहो
मैं मेरे फ़र्ज़ कैसे भुला दूँ ?

मैं भटक रहा हूँ सवालों के जंगल में
जो मेरा सुख-चैन छीने है
हाँ , मैं अगर हो भी गया तुम्हारा
शायद मैं खुद का न हो पाऊंगा
ढूंढने दो मुझे इन सवालों के जवाब
जब मिल जायेंगे इन सवालों के जवाब
लौटूंगा मैं पूरे का पूरा तुम्हारे पास
वरना आधा-अधुरा मिल भी गया तुम्हे
तो कसकता रहूँगा ज़िन्दगी भर
एक नासूर की तरह.

सुबोध - 20 जुलाई, 2014

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मैच्योरिटी

हाथ में पकडे
कॉफ़ी के मग में
गरम-गरम कॉफ़ी के मग में
क्यों उतर आती हो
चेहरे पर वही चिर-परिचित मुस्कान
आँखों में जुदाई के लम्हों का दर्द
नथुनों में बस जाती है
" ट्रुथ वीमेन " की महक
झरती हुई तुम्हारे बदन से .
कुछ कसक भरे पलों में
टपक पड़ते है अश्क मेरे.
गरम कॉफ़ी का मग
जलाने लगता है अंगुलियाँ
टेबल पर रखता हूँ मग
और खुद को टिकाता हूँ
कुर्सी की पुश्त से
माथे पर उभरती है शिकन
मींच लेता हूँ आँखें
और अजनबी हो जाते है कुछ क्षण
जब आखिरी बार देखा था तुम्हे
अपने शौहर के साथ
खिलखिलाते हुए
मुझे लगा
तुम्हारी मोतियों जैसी दन्तपंक्तियों से
टपक रहा है लहू
शायद मेरी उम्मीदों का लहू
या उन वादों का जो किये थे
एक-दूसरे से ..
और तुम्हारी खिलखिलाहट
लगने लगती है
वैम्पायर की हँसी ..
कॉफ़ी ठंडी हो जाती है
किचन में जाकर
उलट देता हूँ सिंक में
और घुस जाता हूँ
बाथरूम में .
उफ़ !
तुम यहाँ भी
साथ चली आती हो !!!!!
तुम कहा करती थी
मैं मेच्योर नहीं हूँ
हाँ,तुम सही हो
मैं आज भी खोया रहता हूँ
तुम्हारे ख्यालों मैं
और तुम सहज हो गई हो
अपनी ज़िन्दगी के साथ !!!!

सुबोध-
१७,जुलाई , २०१४



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मुलाकात

हाँ,
मैं मुलाकात करने जा रहा हूँ
पीछा करते हुए खुद के निशानों का
जो बने है नंगे पांव
करने है कुछ सवाल
उसकी पाक मोहब्बत के बारे में
उसकी क़तरा-क़तरा बेरुखी के बारे में
उन जख्मों के बारे में
जो वक्त ने भर दिए
और उस मरहम के बारे में
जो दिल के एक कोने में मौजूद रहा हमेशा
उनके लिए जिन्हे जरूरत थी इसकी
हाँ, ये भी पूछना है कि
कुछ रिश्ते क्यों बिक गए बाजार में
और क्यों कुछ अनजाने अपने बन गए
बुरी आदतें हादसा क्यों बन जाती है
और अच्छी आदते आशीर्वाद
खून कहीं सस्ता क्यों हो जाता है पानी से भी
और कहीं पानी अमृत हो जाता है
अधूरे ख्वाब दर्द क्यों देते है
और उम्मीदों की खुशबु चहकती क्यों है
बहुत से सवाल पूछने है मुझे
फेहरिस्त बना रहा हूँ मैं सवालों की
अगर तुम्हारे भी हो कोई सवाल
तो बताना मुझे
पूछुंगा तुम्हारे लिए भी
या फिर
तुम भी क्यों नहीं साथ हो लेते मेरे
दोनों मिलकर पूछेंगे
आओ पहनो अपने बूट
और चलो मेरे साथ
हाँ,
मैं मुलाकात करने जा रहा हूँ
पीछा करते हुए खुद के निशानों का
जो बने है नंगे पांव,
जो दुबकी बैठी है
यहीं-कहीं
उसी ज़िन्दगी से....

सुबोध- १५ जुलाई,२०१४




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रिश्ते

अक्षर जो बिखरे पड़े है
मेरी ज़िन्दगी में
कुछ इधर - कुछ उधर
सजाती हूँ तरतीब से
कुछ से नज़रें मिलाते हुए
कुछ से नज़रें छुपाते हुए
बिलकुल रिश्तों की तरह
रिश्तों के जंगल में कुछ दरख़्त
बुड्ढे हो गए है इतने कि
अब फल नहीं देते ,
सुकून देते है
अपनेपन का एहसास देते है
कुछ हमउम्र दरख़्त
जिनके साथ रफ्ता-रफ्ता
पड़ाव लिए है उम्र के
बिलकुल अपने से लगते है
मेरे कपड़ों की तरह
मेरी इज़्ज़त की तरह .
मैं जिक्र नहीं करुँगी
उनके लौटाने का
जितना मैंने दिया है
उस से ज्यादा लौटाने का
क्योंकि रिश्ते
रिश्ते होते है ,
तिज़ारत नहीं .
और कुछ पौधे
नाज़ुक चमकीले पौधे
नज़रों में धीरे-धीरे
ले रहे है आकार
एक विशाल दरख़्त का
जिनकी छाँव में
जिनकी गोद में
मेरा सुकून ,मेरा चैन
मुलाकात करेगा
उन अक्षरों से
जिन्हे मैं सजा रही हूँ
तरतीब से ....
हाँ, कुछ पड़ाव
ऐसे भी होते है
जहाँ समेटना
अच्छा रहता है खुद को
खुद के लिए- रिश्तों की जीवंतता के लिए .


सुबोध- १४ जुलाई,२०१४

 

 

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उफ़ ये फेसबुक ...

क्या बेवकूफी है एडिक्टेड होना भी
लिखता हूँ बेहतरीन और कचरे से कचरा भी
मरा जा रहा हूँ कि कोई तो लाइक करो
और तुम हो कि खामोश बैठे हो .....
उफ़ ये फेसबुक ...
पागल कर दिया है .............

फेसबुक न हुई जान का बवाल हो गई
बीवी कहती है फेसबुक मेरी नई सौत हो गई
छेड़ते है बच्चे
पापा किसे पटा रहे हो .
इरादा कहाँ है मिलने का ?
सबसे हाय-हेल्लो यही होती है
इसी पर केक काटा जाता है
शोक सन्देश छापा जाता है 
उफ़ ये फेसबुक....
पागल कर दिया है

सुबह उठकर ख़ुदा से पहले
नाम इसी का जुबान पर आता है
नावाकिफ हूँ अड़ोस-पड़ोस से
इस पर  फ्रेंड्स की  लम्बी सी लिस्ट  है
भूल जाता हूँ  ज़रूरी से ज़रूरी काम भी
पर याद रहती है फेसबुक
उफ़ ये फेसबुक....
पागल कर दिया है.....

सुबोध-   जुन ८,२०१४

 

 

 

 

 

 

 

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मेरे स्कूल के दिन



मेरे बचपन के दिन
मेरे स्कूल के दिन
मैथ्स की कॉपी से फाड़कर पन्ने
हवाई जहाज़ बनाना
क्लासरूम में उड़ाना
दोस्तों का खिलखिलाना
एक -दूसरे के टिफ़िन पर
हाथ आजमाना
मोर-पंखी किताबों में छुपाना
तितली पकड़ने को
वो भागना -दौड़ना
मास्टरजी का धुंद पड़ा चश्मा
पुरानी कुर्सी का डगमगाना
बारिश में खिड़की से
क्लास का भीग जाना
और वो छुट्टी होने पर
दौड़ते- भागते
एक दूसरे को टंगड़ी मारना
वो रूठना
मान जाना
वो दोस्ती  लम्बी-लम्बी
वो दुश्मनी छोटी-छोटी
वो सच
वो झूठ
वो खेल
वो नाटक
वो किस्से
वो कहानी
परियों वाली
राक्षस वाली
बचपन के सपने
जिसमे सब कुछ मुट्ठी में
न गम
न फ़िक्र
याद बहुत आते है
वो दिन ...
मेरे बचपन के दिन 
मेरे स्कूल के दिन

सुबोध- जुलाई २, २०१४ 












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मुहब्बत – एक नज़रिया

मुहब्बत के मेंह में
भीगा इस कदर कि
जिस्म के साथ
रूह भी गीली है आज तक
नूर का शरबत
पूरे वज़ूद में भर गया पाकीज़गी.

अब फर्क नहीं पड़ता इससे
कि महबूब साथ है या अलहदा
एक कमी थी गम की
मुक्कमल कर गया शख्शियत मेरी

मुहब्बत के शहर में वो काफिर
जो चाह जिस्म की करे
या बद्दुआ दे बेवफा मुहब्बत को.

गुजरकर पाकीज़गी के समुन्दर से
जब बराबर हो गया खड़ा फरिश्तों के
मुहब्बत को बेवफा कह
दोजख को जी नहीं सकता.

कुछ तो मज़बूरियाँ रही होगी उसकी
कि रूह आज भी काँपती है
मेरे जिक्र से उसकी ,
और आँखे पहन लेती है
मुस्कुराहट का नक़ाब .

या रब !
वो टॉवल आज भी गीला है
जिससे पोंछा था सर
भीगने के बाद मुहब्बत के मेंह में ....

सुबोध- २९ जून, २०१४















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अमीर यु हीं अमीर नहीं होता ( भाग -६ )

"जो है"
उससे अलग
क्या देते हो नया ?
जो नहीं है अब तक अस्तित्व में !
क्या है समस्या ?
बेहतरीन समाधान ?
समस्या चूहों का अनाज खाना है
त्रस्त है गरीब इस से
समाधान चूहे पकड़ने के पिंजरे बनाना है !!!!!!
ये नई सोच ही अमीरी है
जो रहेंगे त्रस्त वो गरीब रहेंगे
जो बनाएंगे पिंजरे अमीर बन जायेंगे
नया सोचना ,नया करना
आधार है अमीरी का .
-
आसान नहीं है
नया सोचना ,नया करना

-सोचने की फुर्सत नहीं है गरीब को
अमीर सोचता है ,समझने की मेहनत करता है .
-जोखिम नहीं लेते गरीब
अमीर परवाह नहीं करता अपने आखिरी सिक्के की भी
-सही मूल्यांकन सम्भावनाओ का नहीं करते गरीब
खंगालता है अमीर
सम्भावना,जोखिम,चुनौती.
-ऐतबार नहीं होता खुद की क्षमताओ पर गरीब को
क्योंकि उसे पूरा अंदाज़ा ही नहीं होता अपने संसाधनो का
जबकि अमीर तैयार करता है पूरा खाका अपनी टीम का
-आलोचनाओं से घबरा जाते है गरीब
पता होता है अमीर को
सफल होने पर मिलने वाला पुरस्कार
सो परवाह नहीं होती आलोचना की
-पार पाना आसान नहीं है गरीब का
अपने मानसिक अवरोधों से
जबकि जानता है अमीर
नतीजा मजबूत दृष्टिकोण का
कि यही है बड़े वृक्ष की जड़े
जितनी मजबूत ,उतना बड़ा साम्राज्य....
और इसी लिए
नया सोचता है अमीर ,
नया करता है अमीर....
क्योंकि
नया सोचना ,नया करना
आधार है अमीरी का .

सुबोध- ६ जून,२०१४















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जनरेशन गैप  

(कुछ दर्द जो सिर्फ महसूस होते है
कह नहीं सकते ऐसा ही दर्द है ये
जो हर पिता की ज़िन्दगी में आता है --)

आज़ादी दी तुम्हे ऐसी
जिसके लिए तरसा था मैं.
व्यवहार किया तुमसे
दोस्त की तरह
खोकर अपनी गरिमा.
खड़ा रहा हर पल तुम्हारे लिए
तुम्हारी हर तकलीफ
हर दर्द,
हर हताशा ,
हर तड़फ,
हर नाकामी
झेलता रहा अपने काँधे पर.

शायद शामिल न था तुम्हारी मुस्कान में
पर तुम्हारे आँसुओं में शामिल थे मेरे आँसूं भी
भरपूर कोशिश की मैंने
तुम्हारी आवाज़ बनने की ,
तुम्हारी सोच समझने की
सिर्फ इसलिए कि
ना आये कोई जनरेशन गैप
एक सोच का फर्क
रिश्ते जो बदल देता है ....

पिता की ज़िन्दगी में बेटा
अहम हिस्सा है उसकी ज़िन्दगी का
लेकिन बेटे की ज़िन्दगी में
ज्यादा महत्वपूर्ण होती है
उसकी खुद की ज़िन्दगी
उसकी खुशियाँ
उसका प्यार,
उसके दोस्त,
उसका कैरियर,
उसका….,
उसका....
और पिता कहीं पीछे छूट जाता है
शायद यही तकाज़ा है
उम्र का,
सोच का,
प्रकृति का .

मैं सोचता हूँ और कहीं अंदर तक
खिंच जाती है दर्द की एक लकीर
दिल से दिमाग तक...
कि कल ये दर्द
झेलना है तुमको भी
जनरेशन गैप का
तब शायद बेहतर
समझ पाओ मुझे तुम
मेरे गुस्से को,
मेरे लगाव को,
और मेरे उस स्पर्श को
जब मैं सीने से लगाता हूँ तुम्हे !!!

सुबोध- जून २७, २०१४
















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पिता

हँसो तुम !
लौट आएगा चाँदनी का नूर,
महक उठेगी रात की रानी
सर्द रात में जल उठेंगी
जज़्बातों की अंगीठी
हँसो तुम !!
चहकने लगेंगे पखेरू
सुबह खिल उठेगी गुड़हल सी
सूरज मुँह नहीं छुपायेगा बादलों में
बिखेरेगा गुनगुनी धुप
हँसो तुम !!!
तुम हँसो
कि तुम्हारी हँसी में
सिमटी है मेरी कायनात
कि तुम्हारा एक अश्क
चीरता है कलेजा
पिता हूँ ना,अच्छी नहीं लगती
रोती हुई औलाद !!!!
सुबोध- १९ जून ,२०१४











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पचास पार मर्द

जिन अभावों से गुजरा मैं
मेरा परिवार रूबरू न हो उनसे
इसी कोशिश में
जिम्मेदारियों से झुके कंधे लिए
पचास पार का मर्द
लौटता है जब घर
स्वागत करते मिलते बीवी,बेटी,बेटा
दरवाज़े पर
अपनी-अपनी ख्वाइशों के साथ
जो बताई थी सुबह जाते वक्त..
पैसे की कमी के कारण
कुछ जो रह गई अधूरी
मनाना है उसके लिए...
गीलापन पसर जाता है आँखों में
जिसे साफ़ करता है चेहरा छुपाकर
--
दो रोटी परोसी जाती है
एक कटोरी दाल
एक कटोरी सब्ज़ी
और एक कटोरी फ़िक्र के साथ.
रोटी निगलता है
बिखरे ख्वाबों की किरचों से
बीबी की शिकायते सुनते-सुनते
उन शिकायतों में
पडोसी की नई गाड़ी,
सहेली की नई साड़ी से लेकर
दुनिया भर की अतृप्ति है.
-
टीवी के ऊँचे वॉल्यूम में
बहिन-भाई के झगडे
याद दिलाते है उसकी अपनी निष्फिक्री के दिन
तब वो नहीं समझता था फ़िक्र पापा की
आज ये नहीं समझ रहे है
कल जब ये बनेंगे माता, पिता
तो समझ जायेंगे अपने आप
-
रात को जब जाता है सोने
तो सोता नहीं
ऊंघता है कल की फ़िक्र में
सूरज कब माथे पर देने लगता है दस्तक
पता ही नहीं चलता ..
----
तैयार होकर जल्दी से
आधी खाता,आधी छोड़ता
निकल जाता है
बाहरी दुनिया में
जहाँ उसे करना है संघर्ष
परिवार की सुरक्षा और सुविधा के लिए
खुद का वज़ूद खोकर
किसी का पति ,पिता बनकर
ये जिम्मेदारी का सम्बल
पचास पार मर्द की पीड़ा कम करता है
और सफेदी कनपट्टीयों के पास की
खुद्दारी बन जाती है

सुबोध- १३ जून,२०१४




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मेरा दर्द

वक्त का दरिया
अपने होठों की प्यास समेटे
जिस्म में उंडेल देता है तड़फ

मैंने जो चुने है हर्फ़
तेरी नफरत के दरख्त से
सीने से लगाये
तलाश रही हूँ
सुकून की छाँव

रूह बिखर कर
सिमट जाती है
वस्ल की उम्मीद में
पर अब भी टीसते है
बरसों पुराने ज़ख्म


सरगोशियाँ है हवा में
और मैदानों में
पूछती है कस्तूरी
मेरी आँखे नम क्यों है ?

सुबोध- ११ जून , २०१४



 




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यादें

हाँ , मैंने महसूस की है
तुम्हारी ऊंचाई
पहाड़ों में तैरते
मटमैले,काले बादलों को
छूती ऊंचाई....

सुनी है तुम्हारी बातें
सर्र-सर्र चलती
हवाओ में तैरती बातें....

महसूस की है मैंने महक
झरती हुई तुम्हारे बदन से
रमती हुई मेरे जिस्म में

टूटकर बिखरती पत्तियाँ
कुछ हरी, कुछ पीली पत्तियाँ
सुनहरी शाम के साये में
हाथ में हाथ डालके
टहलते हुए
रूक जाना वक्त का
और तुम्हारा खिलखिलाना....

आसमान जित्ते ऊँचे तुम
तुम पर प्रेम आता है,
और नीचे अतल गहराइयाँ
डर लगता है देखकर.

खुरदरे होकर भी बड़े स्नेहिल हो ,
चस्पां हो मेरी रूह से तुम .
तुम मुझे बहुत अपने से लगते हो
ए मेरे चीड़.....

सुबोध - ८ जून ,२०१४



 














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  जिजीविषा

मेरा बचपन
छुड़ाकर मेरा हाथ
खो गया है कहीं
हादसों की भीड़ में.

ख्वाबों के शहर में
सूरज की उंगली पकड़
खटखटाये
जो दरवाज़े
वहां पड़े मिले
सम्बन्धो के
मुर्दा जिस्म ...

डर नहीं लगता अब अंधेरों से
लगते है अपनों से
खौफ और सहमेपन पर
मुस्कान का नक़ाब
बन गया है आदत

वो लम्हा जो छिटक गया
वक्त के दरिया से
आज भी देता है दर्द
और तलाशता है
उस बचपन को
जो खो गया
हादसों की भीड़ में

मेरे दोस्त !
कहीं किसी मोड़ पर
टकरा जाये तुमसे
वो बचपन
चाहे मेरा हो या तुम्हारा
ले आना उसे मेरे पास
साथ बैठकर आइसक्रीम खाएंगे !!!!!

सुबोध- ९ जून २०१४

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क्या सही है , क्यों सही है ??? ( भाग-2 )

तुम्हारी बेटी के लिए करता है
तुम्हारा दामाद कुछ
"अच्छा है/बहुत अच्छा है
नसीबों वाली है मेरी बेटी !!"
वही जब करता है तुम्हारा बेटा
तुम्हारी बहु के लिए
"जोरू का गुलाम है
घर बर्बाद कर दिया करमजली ने !!"
तुम्हारी बेटी क्या किसी की बहु नहीं ?
उसकी सास क्या वही सोचती है
जो तुम सोचती हो ?
क्यों फर्क आ जाता है इतना
खुद की बेटी
और दुसरे की बेटी में ?
--
तुम्हारी बेटी क्या तुम्हारी है ?
फिर उसे पराया धन क्यों कहते हो
किसी और की अमानत !!
--
शादी के वक्त बहु के पीहर वालों से कहते हो
हम तो बेटा दे के बेटी ले जा रहे है
वही बेटी हो गई करमजली !!
---
सम्मान और स्नेह
रिश्तों का
बदलता है
तुम्हारी सोच से
तुम्हे या
तुम्हारे मन को
दी गई सुविधा/असुविधा से
रिश्ते रिश्ते न हुए
स्वार्थ के पुलिंदे हो गये !!!

---
कब तक बंधे रहोगे
सोच के पुराने दायरे में
त्रासदी देती ज़ंजीरों में
कब स्वीकार करोगे कि..........

सुबोध - ७ जून,२०१४

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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बेवफा

जी करता है
टूटी चूड़ी सा
उफ़क़ पर टंगा
चौथ का चाँद उतार
तेरे लिए
नथनी का छल्ला बना दूँ
या कान की बाली
पर फिर सोचता हूँ
अगर तू बेवफा निकली तो
आसमान बहुत रोयेगा
मेरा क्या है
मैं तो मर्द  हूँ !!!!

सुबोध  ५ जून,२०१४
 

 

 

 

 

 

 

 

  

 

---------

 

अमीर यु हीं अमीर नहीं होता ( ५ )



बतखों के साथ तैरोगे,बतख बने रहोगे
उड़ोगे हंसो के बीच,हंस बन जाओगे
निर्भर है तुम पर
करना अपना चुनाव.
क्यों तैरते रहना चाहते हो गंदले तालाब में
डर लगता है आसमान की बुलंदियों से ?
या महसूस करते हो खुद को नाकाबिल ?
-
ईश्वर ने तुम्हें नहीं भेजा है
बना कर भेड़ -बकरी
बल्कि भेजा है
शेर से भी ताक़तवर
मजबूत दिमाग वाले
इंसान के रूप में .
मत करो उसके वरदानों का अपमान
मत खेलो छोटा .
उसके दिए गुणों का
अधिकतम इस्तेमाल ही
बढ़ाता है तुम्हारा मूल्य .
क्यों बेचते हो सस्ते में खुद को ?
-
अमीर बनने के लिए जानना है तुमको
कैसे सुलझाई जाये
दूसरों की समस्याएं लाभ के साथ ?
जब मिल जाए इसका जवाब
तो सिर्फ खोजना है ये तरीका
कि कम समय में
कम मेहनत से
अधिक से अधिक लोगों की समस्याएं
कैसे सुलझाई जाए ?
-
छोटी सोच और छोटे कदम
गरीबी की और ले जाते है
जबकि बड़ी सोच और बड़े  कदम
अमीरी की और ले जाते है
आओ कदम बढ़ाये उस राह पर
जहाँ बदसूरत बतखें
बनती है सुन्दर हंस !!!!
सुबोध- ४ जून,२०१४

 

 

 

 

 

 

 

 

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सपने

जान उन सपनों में होती है
जो उड़ा देते है नींदें .
नहीं करते परवाह
बीच रास्ते की अड़चनों की .
बन जाता है एक ज़ुनून .
हो जाते है एकाकार
दिल और दिमाग
और शुरू होता है सफर
सपने साकार करने का .
-
आओ देखे सपने खुली आँखों वाले
जो उड़ा दे नींदें .
जो हो अपने खुद के .
न कोई चुरा पाये,
न कोई तोड़ पाये .
न करे परवाह अड़चनों की .
जो भर दे दिमाग में ज़ुनून
जगा दे मन में तूफ़ान
लगा दे जिस्म में आग
कर दे एकाकार
दिल और दिमाग को
पूरा करने उन सपनों को
जो देखे है खुली आँखों से .

सुबोध- मई ३१,२०१४

















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क्या सही है , क्यों सही है ???




तुम क्या जानो
भूख की मजबूरियाँ
तुम क्या जानो
भूख मरोड़कर रख देती है आँतड़िया
हीक सी उठती है
गले को जलाती हुई
निकाल देती है पेट से बाहर
घिनौना ,बदबूदार,बासी
थूक का गोला
हल्का पनियाया हुआ .
भूखा जो है पेट .
पीड़ा कुछ तो समझो मेरी !!!!
नीली छतरीवाले के नाम पर 
लाखो,करोड़ों,अरबों के बनाये
मंदिर,मस्जिद,गुरूद्वारे,गिरिजाघर
और उनके रखवालों को चढ़ते चढ़ावे
और उसी के बनाये मुझ जैसे प्राणी
तड़फते,
रोते ,
बिलखते,
और तलाशते रोटी के टुकड़े
भूखे रह जाते है ...
जिसे देखा नहीं वो सच हो गया
मैं देखा हुआ भी झूठ ......
सोचो क्या सही है , क्यों सही है ???

सुबोध - २ जून, २०१४ 

 

 

 

 

 

 

 

 

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ख्वाबों की शाल



ख्वाबों की शाल 
जो बुनी  थी रात में
सुबह खुल गई कोई गिरह
सारे ख्वाब बिखर गए
चुन चुन कर
कर रही हूँ उन्हें इकट्ठे
मोहब्बत की गठरी में .
दिन जब गहराएगा
यादों का आँचल
हवा के झोंके से लहराकर
चूमेगा मेरा माथा.
विरह की
बर्फीली चोटियों  से
एक टुकड़ा रौशनी
लेकर उधार
उंडेल लुंगी जिस्म पर
और करुँगी तेरा इंतज़ार.
अंजुरी भर चांदनी
बाँधी है मैंने अपने दुपट्टे  में
तुम्हारे लिए
जब भी मिलेंगे हम
इकट्ठे बैठकर बुनेंगे  
ख्वाबों की शाल.
ख्वाब जो इकट्ठे किये है  मैंने
मोहब्बत की गठरी में .

सुबोध  ३०,मई २०१४

 

 

 

 

 

 

 

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अमीर यु हीं अमीर नहीं होता (४)




ख्वाइश इतनी सी
कि हालात बेहतर हो जाए
मेरा आरामदेह क्षेत्र (comfort  zone  ) रहे सुरक्षित
इस सोच की वजह से 
कोशिशें होती है आधी-अधूरी. 
शुभचिंतकों की
असफलता की  फिक्र
फुला देती है हाथ-पाँव .
काम की शुरुआत
अकेले से होती है
ख़त्म २-४ पर होती है.
इस्तेमाल किये जाते है
औद्यौगिक युग के औज़ार,
पेड़ काटने के लिए कुल्हाड़ी . 
हर काम /उपाय/कोशिश  होते है छोटे
ज़ाहिर है सफल होने पर
सफलता भी
प्रयासों के अनुरूप ही परिणाम देगी
लिहाज़ा छोटे क़दमों  की सफलता
किसी कोने में दुबकी रह जाती है
क्योंकि जो छोटा सोचते है
वो गरीब होते है .....
-
उन्हें झोंकना पड़ता है
अपना सब कुछ ,
सब कुछ माने सब कुछ -
समय,
ऊर्जा,
मेहनत,
पूँजी,
हार न मानने का ज़ज़्बा ,
काबिलियत.
नकारना होता है
समाज/दोस्तों का खौफ,
मज़ा आरामदेह क्षेत्र का.
शुरुआत होती है अकेले से
 लेकिन जोड़ लेते है
 पूरी टीम ,पूरा नेटवर्क.
इस्तेमाल किये जाते है
आधुनिक युग के औज़ार,
पेड़ काटने के लिए इलेक्ट्रिक आरी .
हार उनके दिमाग में
मौत की तरह होती है
लिहाज़ा तैयार होते है कई
वैकल्पिक रास्ते. 
हारेंगे तो
शुरुआत करेंगे नए सिरे से.
जीतेंगे तो जश्न मनाएंगे....
और वो मानते है जश्न
क्योंकि जो बड़ा सोचते है
वो अमीर होते है .

सुबोध- ३० मई, २०१४



 

 

 

 

 

 

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अमीर यु हीं अमीर नहीं होता ( ३ )

 

 

 

  आसान नहीं है
दायरे को तोडना
जो आरामदायक  क्षेत्र (comfort zone) है तुम्हारा
तब्दिल हो गया है आदत में .
-
चाहत तुम्हारी अमीर बनने की
कुछ नहीं भिखारी स्तर के अतिरिक्त .

-
चुनाव तुम्हारा अमीर बनने का
शामिल किये है अपने में
शर्तों का पुलिंदा ,
बेहतर है चाहत से
लेकिन सर्वश्रेष्ठ नहीं
क्योंकि तुम्हारी शर्तें
सुरक्षा देगी आदतों को .

-
समर्पण तुम्हारा अमीर बनने का
बनाएगा तुम्हें अमीर
क्योंकि यहाँ तुम कर रहे हो वो सब
जो ज़रूरी है अमीर बनने के लिए.
त्याग सारे आरामदायक   क्षेत्र का
बिना रुके,बिना थके.
केंद्रित प्रयास,
ज़ज़्बा सब कुछ झोंक देने का,
विशेषज्ञता आत्मविश्वास से भरी,
मानसिकता अमीरों वाली,
कोई अगर,कोई मगर
कोई बहाना, कोई शायद नहीं .
सिर्फ समर्पण,
और समर्पण
और विकल्परहित समर्पण
ज़िन्दगी के आखिरी  लम्हों तक....
सुबोध- मई २९, २०१४ 

 

 

 

 

 

 

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इश्क़ की पीड़ा 



धीमी-धीमी बरसात में
हल्की सुनहरी  धूप,
मिट्टी की सोंधी-सोंधी महक,
आसमान में अंगड़ाई लेता इन्द्रधनुष
और ऐसे में  तेरा ख़्याल
 लगता है ऐसा
जाने गुज़र  रहा हूँ आग से
या कोई चीर रहा है पोर-पोर .
खो देता हूँ सुध-बुध ,
घंटों घूरता रहता हूँ
ख़ाली दीवारों को.
-
अँधेरे की चादर
जब चूमती है चाँदनी का बदन
खिलती है कही दूर रात की रानी
और महक
होकर हवाओं के परों पर सवार
बस जाती है मेरे ज़िस्म  में
तब ख़्यालों में
 बहुत कुछ आकर भी
कुछ नहीं आता है .
ख़ाली बर्तन की तरह
मन रीता रह जाता है . 
ये इश्क़ की पीड़ा है
जो
वक़्त की कोख से टपके
लम्हों की गोद में
हँसाती है,
रुलाती है,
तड़फ़ाती है
और वक्त-बेवक्त
तन्हा छोड़ जाती है   
इसे वही समझे
जिसने इश्क़  पढ़ा नहीं
बल्कि किया है ......

सुबोध- २३ मई ,२०१४

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अमीर यु हीं अमीर नहीं होता ( २)

दायरा
जो बनाते है आप
निर्भर है उसकी उपलब्धि
आपके समर्पण पर ...
-
दायरा
मेंढक का
होता है तालाब,
और
बाज़ का
आकाश,
सरहदों से आज़ाद आकाश .
-
मेंढक
जब सोचता है
बाज़ बनने की,
रोकती है उसे
उसकी मानसिकता,
जहाँ मौजूद है
फ़ेहरिश्त खतरों की .
-
त्याग है
आरामदेह दायरे का,
ख़ौफ है
अपनी वास्तविकता बदलने का ,
मेहनत है
अपनी काबिलियत के विस्तार की,
और जहाँ ज़रूरत है
एकाग्रता की ,
साहस की,
विशेषज्ञता की ,
शत प्रतिशत प्रयास  की ,
और सबसे बड़ी
बाज़ की मानसिकता की.
.-
और देखकर
इस फ़ेहरिश्त को
कुछ मेंढक
मेंढक रह जाते है
और कुछ मेंढक
बाज़ बन जाते है .
-
अपना-अपना दायरा है
चाहत का,
चुनाव का,
समर्पण का.
क्योंकि
दायरा
जो बनाते है आप
निर्भर है उसकी उपलब्धि
आपके समर्पण पर ..


सुबोध-  २२ मई , २०१४














----

ताकि कल जीत सकूँ 

हाँ,  मैं स्वीकार करता हूँ
अपनी हार  ...
लेता हूँ पूरी जिम्मेदारी ...
नहीं देता किसीको भी दोष
तरफदारी नहीं करूँगा खुद की
कि मैं सही था
वक़्त गलत हो गया
नहीं करूँगा बेवजह  की शिकायत
और ये सब कर रहा हूँ सिर्फ इसलिए
कि कल मेरी कोई हार न हो ...
...
मैं करता हूँ स्वीकार
मुझमे नहीं था वो जज़्बा
कि जीत होती मेरी
संपूर्ण समर्पण से ही हासिल होता है लक्ष्य ......
--
मैं करता रहा शिकायत
कमियों की, खामियों की
भूल गया हासिल को
और सारा ध्यान रहा
कमियों,खामियों पर
कहते है
जिसके बारे में
शिद्दत से  सोचते हो
वही मिलता है
सो मुझे 
कमिया और खामिया मिल  गयी
करता अगर प्रयास
लगा कर जान की बाज़ी
इन्हे दूर करने का
तो निश्चित ही
अलग होता परिणाम 
-
मेरा पूरा प्रयास था
बचूं  हार से
शायद इसी लिए हार गया 
क्योंकि
मेरे  अवचेतन में लक्ष्य
हार से बचना भर था
जीत का तो कहीं ज़िक्र भी न था .
हाँ, में स्वीकार करता हूँ
अपनी हार
लेता हूँ  पूरी जिम्मेदारी
ताकि कल जीत सकूँ ....

सुबोध- २१, मई २०१४  
















---------

अमीर यु हीं अमीर नहीं होता

सुरक्षित करने को अपना आज
दांव पर लगा देते है अपना भविष्य
हाँ, यही करते है अधिकतर लोग....
बिना ये समझे कि
ख़ूबसूरत भविष्य की
जड़ में आज की
खाद होती है ....
-.
चूजे को
कर दिया जाता है हलाल
मुर्गी बनने से पहले .
और रोते है रोना
कि ज्यादा सफ़ेद क्यों है
पड़ोसी की शर्ट .
-
इतना व्यस्त होते है
रोने में
कोसने में
कि तलाशते नहीं
वजह ...वजह....वजह.
-
छोटे लक्ष्य
छोटी वास्तविकताएं
छोटे प्रयत्न
ज़ाहिर सी बात है
छोटी ही होगी
उपलब्धियाँ...
-
अमीरी के रास्ते
जाने वाली सोच की सड़क
शुरू होती है
सवालों से
क्योंकि
विस्तार
वास्तविकता का
काबिलियत का
शुरू होता है.
सवालों से .....
क्या
क्यों
कब
कैसे
कहाँ
लेकिन
गरीब देता है
आधे -अधूरे जवाब
नतीजा
आधी- अधूरी उपलब्धिया
और दोष नसीब को ?????
अमीर लेता है
जिम्मेदारी
नहीं बनाता
बहाने ......
छोटी-छोटी बातें
पैदा करती है बड़ा फर्क .......

सुबोध- १६ मई,२०१४

 

---

सपने छोटे क्यों ?


छोटी सोच वाले
छोटे सपने देखते है
और सिर्फ देखते है.......
-
बड़े सपने देखने पर
शुभचिंतक हो जाते है दहशतज़दा 
वे ढूंढते है
बड़ी समस्याओं के लिए
छोटे-छोटे समाधान.
-
नहीं समझ पाते
कि  सपने
देखने से  नहीं
बल्कि पूरे होते है
सुव्यवस्थित प्रयास से ,
नहीं समझ पाते
कि वे इस किनारे पर है
 दुसरे पर उनके सपने
और बीच में समस्याओं की नदी .
-
उन्हें सिर्फ बनाना है एक पुल
इस किनारे से उस किनारे तक
उन्हें पुल बनाने का
जुटाना है सामान
पैदा करनी है काबिलियत
उसके बाद
सपने  उनके होंगे.
हाँ, जो भी देखे होंगे,
चाहे बड़े हो या छोटे.
तो छोटे क्यों ?
सुबोध-    १४ मई,२०१४
















--

गलतियाँ पूर्ण बनाती  है

इंसान होगा तो
कर्म करेगा ,
भेजा है
कर्म करने के लिए
ख़ुदा ने उसे.
और गलतियाँ होती है
कर्म करने वालों से
न कि मुर्दों से .
-
देखते है
अाधी- अधूरी सोच वाले
किसने , कितनी गलतियाँ की
और पीटते है माथा
कोसने की शक्ल में
-
लेकिन ख़ुदा
ये देखता है
कि बजाय बहाने बनाने के
किसने स्वीकारी जिम्मेदारी.....
और वो ये देखता है
कि किसने , कितना सीखा
अपनी गलतियों से .
क्योंकि वो जानता है
मैंने इंसान को
पूर्ण बनाकर नहीं भेजा है
बल्कि भेजा है पूर्ण बनने  के लिए..

सुबोध  १२ मई,२०१४















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ठहरा है मेरे कमरे में इन्द्रधनुष 
मैंने लाने के लिए इन्द्रधनुष
पैदा की थी खुद में काबिलियत
कि मौजूद न रहे कोई वजह
इन्द्रधनुष न आने की.

सारे डर असफल होने के
छोड़ आया था उस कब्रगाह में
जहाँ दफन है अतीत मेरा
असफलता का .
और सफलता सिर्फ निर्भर थी
इस काबिलियत पर
कि असफलता के भय को
किस तरह करूँ प्रबंधित

मेरे कमरे में
इन्द्रधनुष लाया है
सुरमई उजाला
ईनाम के .तौर पर
क्योंकि मेरी कोशिश का स्तर
उच्च था इतना
कि संभव ही नहीं था
असफल होना.

मैं क्यों डरूँ
इन्द्रधनुष और सुरमई उजाले के
मेरे कमरे में होने से ?
जानता हूँ मैं
इनकी वजह से
सौंपें जायेंगे मुझे कुछ
उत्तरदायित्व
जो हमेशा सौंपें जाते है
क्षमतावान को .

सुबोध ११ मई , २०१४



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दहेज़ - एक पहलु यह भी

दहेज़ का दंश झेलते
टी.व्ही . और स्कूटर
बन गए है आग के बंद कमरे
कि जिसमे सुलगो ,रोओ चुपचाप .
-
बेटी की पैदाइश
क्यों जुटा देती है
फिक्र का सामान
कि अच्छी साड़ी पाते ही
रख दी जाती है संदूक में ?
कि लटकने लगती है
दहशत की एक तलवार सर पर ?
-
नहीं,हम सिर्फ फिक्र करते है अपनी
उसकी नहीं
बल्कि उसके दहेज़ को लेकर
हमारी खौफनाक चिंताएं
न जाने किन लम्हों नोंच देती है
उसकी मासूमियत के पर,
शरारत,खिलखिलाहट का जंगल.
-
और हम ओढ़ते है एक मुखौटा
कि हमारी बेटी
धीरे-धीरे समझदार हो रही है
जबकि वह बिखर रही होती है
उसके लिए हमारी
फिक्र , परेशानियाँ देख देख कर
हर पल टुकड़ों में बँटती हुई.

सुबोध दिसंबर १९८६


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तुझे इश्क़ जो हुआ है

सारे अक्षर
खिलखिला कर
घेर लेते है मुझे
गाते हुए
एक अनजाना गीत
जिसकी धुन
पहचानी सी लगती है
सूरज की किरणे
भीगी -भीगी शबनम का
माथा सहलाती है
एक चिड़िया आती है फुदकती हुई
मुंह में घास का तिनका लिए
बैठ जाती है
अलगनी पर टंगे कुर्ते पर
आम की भीनी -भीनी महक
भर देती है मेरे कमरे में हवा
एक तितली आती है
चुपके से गुनगुनाती है
सारे अक्षर
हंस पड़ते है जोर से
कहते हुए
चलो ,
नाचते है
गाते है
पार्टी करते है
तुझे इश्क़ जो हुआ है ............

सुबोध १० मई , २०१४ 


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मेरी हथेली पर किसी और की मेहंदी है .


मेरी हथेली पर
तेरे इश्क़ की मेहंदी नहीं
बेवफाई के अंगारे है
फिर भी न जाने क्यों
महकती है मेरे जिस्म की शाखें
एक तेरे जिक्र से.
-
भूले से सही
हिज़्र जब उतारता है
अपने कपड़े
एक सूरज आकर
चूम लेता है मेरा माथा
और मैं बालती हूँ चूल्हा
तेरे लिए सोंधी-सोंधी
रोटी जो पकानी है ,
हुलस कर साफ़ करती हूँ
चौबारे को
तलाशती हूँ दुपट्टे का साफ़ किनारा
नाक पोंछनी है तेरे बच्चो की..
-
वक्त का जंगल
जब छूता है मेरे वज़ूद को
एक ज़हर का घूंट
मेरे जिस्म में उतर जाता है
जैसे समाती है समुन्दर में कोई नदी
छितरा देता है
ख्यालों के सितारे
क्योंकि मेरे बच्चो का बाप तू नहीं
मेरी हथेली पर किसी और की मेहंदी है .

सुबोध ९ मई २०१४


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क्या उसकी हत्यारी मैं हूँ ?

संस्कारों के अँधेरे में
पली हुई मैं
दिखा कर ससुराल का भय
क़त्ल करती रही
उसकी मासूमियत .
-
झल्लाती उसके बचपने पर
थोपती रही उस पर
सलीके से उठना-बैठना
और बातचीत का अंदाज़ .
-
उसकी निरीह आँखें
टपक पड़ती बेबसी में
खुद को खुद में जज्ब करती.
-
उसके
खामोश मासूम चेहरे की
उष्णता सहेजने की चाहत
लगकर मेरी छाती से
बंद मुट्ठी का सपना बन गई .
-
जवान होती बेटी के लिए
अपनी गरीबी में जोड़ती दहेज़
न चाहते हुए भी
कोसने लगती उसे.
-
वह चुपचाप सुनती कोसने
छुपाती अपनी झल्लाहट
ढेरों काम में
और गुस्सा अपने होठों में .
-
उसकी पैदाइश पर उठाती उंगली
बात-बेबात
डांटने लगती उसे
समझाने खुद को..
-
मिलना -जुलना लड़कों से
हँसना या बातें करना जोर से
या घूमना - फिरना बाहर
बंद कर दिया उसका
सुना-सुना कर
अपने ज़माने की बातें --, बंदिशे .

लेकिन आज
कोहराम मचा है घर में
जवान बेटी जल मरी है
सबसे ऊँची चीख मेरी
कहती है मुझसे
'उसकी हत्यारी मैं हूँ '
क्या आप भी यही समझते है ?

सुबोध सितम्बर, १९८६


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यादों के शहर में

एक अकेला मैं
यादों के शहर में
वर्क उलटता हुआ
इश्क़ के
खो गया हूँ
बरसों की हथेली में चुभे
हिज़्र का कांटा निकालने में .

-
विश्वास की झील में
घोल दिया मजबूरियों ने
बेवफ़ाई का ज़हर
और इश्क़ का पानी
जल गया
चूल्हे पे चढ़ी भूख की देग में .

-
आँखों में लहराती
सुकून की लाली
नोंच ले गया
संस्कारों का गिद्ध
और मैं
जो कल साथ था कविता के
आज अकेला हो गया हूँ

-
सुरज ने बंद कर दी है
किरणों की खिड़की
और बेनूर चाँद सिसक रहा है
यादों के शहर में
इश्क़ के वर्क उलटता .

सुबोध अगस्त १९८६


---

जब माँ तुम जैसी होती है ....

करता है मुझे आज़ाद
तुम्हारा विश्वास
अपने डर से
और तुम्हारा प्यार
उन बंदिशों से
जो डालती है पैरों में बेड़िया
बदल जाते है बेटी शब्द के मायने
जब माँ तुम जैसी होती है ....

जो सिखाती है
कसना मुठ्ठियों को
और वार करना
जरूरत होने पर
जो बताती है फर्क
बोझ और वरदान में
जिम्मेदारी और पलायन में
और करती है आज़ाद
बेटी होने के अभिशाप से
जब माँ तुम जैसी होती है .....

बेटियाँ
आंसू नहीं
अँधेरे लम्हों का नूर होती है
बिखरते लफ़्ज़ों को सम्हालती
चांदनी का समुन्दर होती है
जो रिश्तों को सहेजती है
परीकथाओ वाले इंद्रधनुषी ख्वाब बुनती है
सुन्दर वर्तमान के साथ
ख़ूबसूरत जिम्मेदार भविष्य होती है
जब माँ तुम जैसी होती है ....

सुबोध मई ४, २०१४


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मत बेचो खुद को सस्ते में

मत बेचो खुद को
पूरी करने
सिर्फ अपनी दैनिक ज़रूरतें
निकलो सुविधा के खोल से बाहर
और वो तलाश करो
जो संभव है पाना
तुम्हारे लिए.

नियम है ज़िन्दगी का
इस से पाने का
जो तुम
प्रयास करोगे
देगी ये तुम्हे उतना ;
तुम पर है ये
क़ि तुम इस से
क्या लेते हो.
शर्त ये है क़ि
मज़दूरी तुम्हे नहीं
तुम्हारी काबिलियत को
दी जाती है.

सुबोध अप्रैल ३०,२०१४


---

आपकी वास्तविकता

बनाने के दौरान
आप सीखते है बर्बाद करना
और बर्बाद करने के दौरान
सबक सीखते है आप
अपनी गलतियों से
और बन जाते है इतने समझदार
कि दोहराव न हो गलतियों का .
और फिर बनाते है
बर्बाद हुए को नए सिरे से.

-
यह पूरा क्रिया-चक्र
बनाना
बर्बाद करना
और फिर से बनाना
बनाता है आपको संपूर्ण .
इस दौरान
जो बनते है आप
वही होती है
आपकी सच्ची वास्तविकता .

-
उसके बाद आने वाली
असफलताएँ
विचलित नहीं करती आपको
बल्कि
उत्साहित करती है
चुनौती की तरह .
क्योंकि आप जानते है
नए सिरे से बनाने की
पूरी प्रकिया को .

-
बनाते-बनाते आप
वह बन जाते है
जहाँ
सफलता
और
असफलता
महत्व नहीं रखती
क्योंकि
पहुँच जाते है आप
उस शिखर पर
जो आपकी
वास्तविकता है .

सुबोध अप्रैल ३०,२०१४


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महत्वपूर्ण नहीं है बनना



महत्वपूर्ण नहीं है बनना
महत्वपूर्ण है करते करते बनना
फ़ासला
कोशिश करने
और होने के
दरमियाँ का
आपको सिखाता है बनना
जिसमे सीखते है आप
बनने वाली चीज़ों को सम्हालना.
बिना फ़ासला तय किये
पाई हुई दौलत
सम्हाली नहीं जा सकती
क्योंकि आप सिर्फ पैसे वाले बने है .
वो हुनर
जो सिखाता है सम्हालना
वो सीखा जाता है
उस वक़्त के दरमियान
फ़ासला तय करते - करते .
इसलिए
महत्वपूर्ण नहीं है बनना
महत्वपूर्ण है करते करते बनना.

सुबोध - अप्रैल ३०, २०१४


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गुरुमंत्र - सफलता का

सफलता
मिलती है
गुजरकर असफलताओं से.
जिनमे माद्दा नहीं
असफल होने का
वे डरपोक
क्या चखेंगे
स्वाद सफलता का ?
चाहिए सफलता के लिए
सबसे ज्यादा
असफल होने की हिम्मत ,
लेकर सबक
असफलता से
बैठने की नहीं
दुबारा कोशिश करने की हिम्मत ,
हर असफलता के साथ
एक नया पाठ पढ़ने की हिम्मत
तब तक
जब तक
असफल न हो जाये
असफलता.

सुबोध अगस्त २००५


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भाग्य खैरात नहीं देता

मैंने
पढ़ा
सोचा
समझा
अवसर देखा
सीखा
किया
और तुमने
पढ़ा
सोचा
समझा
कठिनाईयाँ देखी
और छोड़ दिया.
अब तुम कहते हो
मुझे सफलता भाग्य से खैरात में मिली है.
क्या तुम नहीं जानते
मैंने चूमे है ढेरों मेंढक
पाने को राजकुमार
और तुम छुप गए कछुए के खोल में
बचाने को अपने होठों की खूबसूरती.
मेरे दोस्त !
सफलता भाग्य से मिलती है
लेकिन भाग्य खैरात नहीं देता
क्योंकि
सफलता और भाग्य दोनों
सतत प्रयासों का परिणाम है
जहाँ सिर्फ पड़ाव होते है
मंज़िल नहीं ...

सुबोध


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चुप रहने की सज़ा

जिस्म में लगती है आग
गुजरता हूँ जब उसके ख्याल से..
अच्छी बोलचाल थी
अच्छी उठ-बैठ थी
अच्छी पहचान थी
और अच्छी तमीज़ थी, लिहाज़ था
कि कर न बैठूँ
कोई ऐसी हरकत
जो उसे नागवार गुजरे
और वो गुजरे दर्द से
बस ! यहीं भले होने ने
तबाह कर दिया मुझे
कोई ऐसा आया
जिसने न किया लिहाज़
न अपनाई तमीज़
और न सोचा उसके दर्द के बारे में
बल्कि कर बैठा
इज़हारे-मौहब्बत.
वो हो गई उसकी
और में
लिहाज़ और तमीज़
गले से लगाये रह गया. .

सुबोध अगस्त २००५


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आधा हिस्सा पीहर में

हाँ,आज भी टूट जाता है
घर आँगन अंदर तक
जब बेटी विदा होती है.

अपनी ससुराल जाकर भी
अपना आधा हिस्सा
छोड़ जाती है पीहर में.

फ़िक्र अपने भाई की,
मालिश पापा के सिर की,
आलिंगनबद्ध होना माँ से
ललक बचपन को जीने की
कर देती है भाव - विभोर
जमघट सहेलियों का
दौर चाय -कॉफी का देर रात तक
गीली-गीली रातों में
अलाव जलता है जज्बातों का.

शायद बेटियां पीहर जीने आती है--
छूटे हुए बचपन की यादें
भाई के साथ की गई शरारतें
पापा से की गई ज़िद
माँ के हाथ की रोटी
और कहीं गिरा पड़ा वो लम्हा
जिसमे दर्द भी था,खुशी भी.

और इन सबको जी कर
जब वो लौटती है ससुराल
अपना आधा हिस्सा
छोड़ जाती है पीहर में.

सुबोध


--

जब हो जाती है हद

रिक्त हथेलियों पर
ठहरा हुआ कालापन
किसी गर्म लम्हे की तलाश में
भिगोता है माँ का आँचल .
सिसकता है लगकर
भाई के कंधे से
या घुटता रहता है चुपचाप
अंदर ही अंदर .
भूल जाते है होंठ मुस्कुराना
शबनमी मुस्कान
मांगें, मनुहार भरी.
चेहरे की उदासी उतर आती है
चूड़ियों पर
काँप जाती है देह
हर आहट पर आतंक से .
टुकड़ों में बंटती हुई पल-पल
बदल जाते है शब्दों के अर्थ ,
घर आँगन से जुड़ने के मोह की तरह
और जब हो जाती है हद
अख़बारों की लुत्फभरी कतरनें
ज़िंदा हो जाती है
बनने से पहले
खंडहर हो गए
ताजमहल की लाश पर

सुबोध १९८७


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तुम्हारे बिना

वक्त के आँसू
नहीं मिटा पाये है
विरह का ज़ख्म .

इश्क़ का शहर
उदास लेटा है
मन के आइने पर .

बाँसुरी की तान ,
खामोश वादियाँ,
बदन टटोलती हवा ,
ताज़ा खिला गुलाब
कुछ भी अच्छा नहीं लगता
तुम्हारे बिना

सुबोध अगस्त १९८६


---

दहेज़ - हत्या

नहीं छूट पाती हाथों की मेहंदी
नहीं मिटती जिस्म से
नवविवाहिता की गंध
कि दरकने लगते है सपने ;
सास के चेहरे से उतर जाता है
माँ के चेहरे का मुखौटा,
खिल्ली उड़ाता हुआ
पति हो जाता है पराया
अपना बनने से पहले.
जिस्म और रूह
बन जाते है
ज़ख्मों का जेल-खाना .
आतंक उभर उठता है
आँखों में- अंदर ही अंदर घुटता .
लम्हे दर लम्हे
मोह घर - आँगन का
जुड़ भी नहीं पाता
कि क़त्ल कर दी जाती है मासूमियत.
बेअसर हो जाती है
माँ की हिदायतें
सखियों के सुझाव.
और एक रोज़
जब हो जाती है हद
समाज के
अवैध खाते में दर्ज़ हिसाब
न चूका में विवश ज़िन्दगी
दहशत की चमक में
अपनी डोर
सौंप देती है काले अँधेरे को.
और अख़बारों की
चटख भरी ख़बरों में जुड़ जाती है
खिलने से पहले मुरझा गए गुलाब की खबर .

सुबोध फरबरी १९८७


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अस्तित्व

शिराओं में
खून की जगह
दौड़ने लगा है दर्द .
जब रिश्ते
सहलाते है सर
खिंच जाती है
एक आग की लकीर
जिस्म के आर-पार.
शोषण पर - एक सच पर
परदा डालने की कोशिश
भर देती है
एक खौफ मुझ में .
नहीं चाहता
नकार दूँ उस शोषण को
जिसमे से गुजरकर
स्थापित करना है मुझे
अपना अस्तित्व ........

सुबोध जुलाई १९८३


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हथियार

हथियार
आदमी की भाषा से
जज़्बातों से अन्जान है.
हाथ
चुल्लू में ज़हर भर कर
हथियारों को अर्ध्य देते है
और हथियार
पैरों में खून का भंवर .
आदमी
आदमी के हाथों पे
बौखलाहट रखता है.
एक पल के लिये
हाथ कांपता है
और दुसरे पल आवेश
सुविधा के समर्थन में
विवशता और आत्महत्या
हवा में उछाल देता है
महंगाई की नोंक पर .
और अख़बार छापते है
लफ़्ज़ों के शहर में
भूखी, कराहती झोपड़ियों का
उथला -उथला दर्द.
तब जब आँसू से चमकीली
तलवार की धार
अँगुलियों की पोरों पर
उतर आती है
और सिर्फ एक लम्हे के लिये
आदमियत के बौनेपन पर
मन कसकता है.
और फिर एक रोज़
आग से घिरी
झोंपड़ियों को बुझाने वाले हाथ
हथियारों को अर्ध्य देते है........
मैं
उस बढ़ते समूह को देख
एक पल के लिये ठिठकता हूँ
अपना पिचका पेट
भूख की त्राश
जो छूरे की तेजी से
कलेजा चीरती है,
महसूसता हूँ
और
अपने लंगड़ाते क़दमों के साथ
उस समूह का अंग बन जाता हूँ
समूह का एक फटेहाल
आगे बढ़
मेरी कमर में हाथ डाल
मेरी लंगड़ाहट दूर करने की
कोशिश करता है
मैं उससे पूछता हूँ
तुम्हारे पास कोई हथियार है ?
वह
उत्तर के बदले में
एक सवाल उछलता है
हथियारों के इंतज़ार में
कब तक हम
रमुआ बने रहें,
क्यों न
हमारे पास जो है
यानी भूख और प्यास
उसे ही हथियार बनाकर
संघर्ष करें ?
और मुझे लगा
अब हथियार
आदमी की भाषा से
जज़्बातों से अन्जान नहीं है .

सुबोध जुलाई १९८३


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ढूंढ दो न जरा !

आदत जो बन गई है हादसा
क़त्ल करती है
भाषा,मुहब्बत,मासूमियत.
याद करते है पेड़
वारिस शाह
जंगल में दौड़ते खरगोश
और सरसों के खेत !
चेहरा जब देखता है आईना
हाथों में रख देता है दहशत
उफ़ ! ये किस हीर का लहू है ?
किस कबीर की लाश है ?
किसने क़त्ल किया है बरसों का याराना ?
किसने उगा दिया है आँगन में
नफरत का दरख़्त ?
क्या बेटे भूल गए है गोद की लाज ,
वे अभाव जो दूर किये मिल-जुल कर ?
या-रब ! आदमियत कहाँ खो गई है ?
ढूंढ दो न जरा !!!!

सुबोध अक्टूबर १९८६


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दहेज़-हत्या

निरीह आँखों में ठहरा हुआ अँधेरा
अंदर ही अंदर नोंच रहा है आरज़ूओं का जिस्म.
उदासियाँ सिसकती है
लगकर अपने कंधे से
तड़पाती है माँ के मोह को.
वहशियत उगने से पहले क़त्ल कर देती है
रौशनी,मासूमियत,चाहत और मुस्कान.
खिंच जाता है
चेहरे पर खौफ ,भय
हर आहट पर !
पति हो जाता है गैर मर्द
और सास,ननद,ससुराल
अँधेरी , ऊंघती सुरंग
सांप और बिच्छुओं से भरी हुई
कि चिल्लाओ तो काटने लगती है
खुद ही की आवाज़ खुद को
हज़ारों तरफ से लौटती
पोर-पोर में भर देती है दहशत.
या
दर्द का दरिया मुठ्ठियों में समेट
खिलखिलाने की कोशिश
गिरा देती है
सांप और बिच्छुओं की
ज़हरीली बिलबिलाती दुनियाँ में.
और ज़हरीली आग में झुलसती
अँधेरे को झेलती-झेलती
बन जाती है अँधेरे का हिस्सा.
लिहाज़ा कविता छोड़ देती है साथ
घर से टूटने के दर्द की तरह.
और जब लोभ के शहर में
गिरवी रख दी जाती है आखिरी पोर आदमियत की
तब अखबार देते है खबर
जिसे आम ख़बरों की तरह उलट देते है हम
बिना सहानुभूति ,बिना दर्द के
कि फिर किसी मदांध हाथी ने
रौंद दिया है कमल का फूल.

सुबोध मई १९८७


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दर्द

दर्द की हदें
हवा में मत उछालो.
दर्द,
प्यास के शहर में
अकेलेपन की आग है दोस्त,
दुबका लो इसे सीने में.
दर्द एक जाम है
हसीन महबूब का,
रौशन ज़िन्दगी के लिये
उठाओ ये जाम
और अन्धेरें में भटकते
होठों को
नूर की बरात दो.
पहचान
जो कीचड़ के समंदर से गुज़र कर
उजला जाती है;
पहचान जो गंदली केंचुल को
जिस्म से उतार फेंकती है
दर्द भी वैसी ही एक पहचान है-
आदमी होने की.
नकारो न इसे .
पलकों के सीने पर मचलता दर्द
दूसरों के सीने में उतारना
हार है अपनी मेरे दोस्त.
आओ ,
दर्द उड़ेलने की नहीं
खुद झेलने की बात करें
एक अच्छी कविता के लिये.

सुबोध अगस्त १९८३.


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जागरूकता

मैं
मेरे बच्चे को
एक सपना देता हूँ
उसकी आँखों में
एक लम्हे के लिये
चमक उभरती है
फिर दुसरे लम्हे
वह भोली मासूम चमक
मुझ पर एक सवाल
उछाल देती है,
पापा
जो दर्द ग्रांडप्पा ने
आपको दिया
वो मुझे क्यों देते है ?
और मुझे लगता है
इसका दिमाग
अब सोलहसाला
नहीं रहा है.
सुबोध अगस्त १९८३


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दहेज़

ससुराल वाले
करे या न करे
दहेज़ को लेकर अत्याचार
मगर तुम तो अभी से
करने लगी हो माँ.
टी.व्ही. और फ्रिज की सुना -सुना कर
अभी से बैठा दिया है
तलवार की धार पर.
बेटी की जवानी
यों उछाली तो नहीं जाती सरे-आम
की बेटी खुद के जिस्म पर
खुद के पैदा होने के
गुनाह का दंश झेलने को
मज़बूर हो जाये.
कैसी माँ हो तुम
कि कोई अच्छी साड़ी पाते ही
खुद की औरत की
आरज़ूओं को क़त्ल कर
बेटी के दहेज़ के लिए सहेजकर
ट्रंक में रख देती हो.
और उन लम्हों
( तुम शायद न समझ सको)
बहुत छोटी हो जाती हूँ मैं
खुद की निगाह में,
औरत के हक़ पर डाका डालने वाली ....
जब तुम चिंतित होती हो
पड़ौस की औरतों के बीच
मेरे दहेज़ को लेकर
तब मेरी मासूमियत का
बचपन के शबनमी ख्वाबों का
कोई न कोई क़तरा
मेरी मुस्कान के लहू में डूबकर
मुझे प्रौढ़ बना जाता है
और तुम्हें पता भी नहीं चलता
कि तुम्हारी मासूम बच्ची
घुटन के बंद कमरे में सिसकती
लम्हे-दर-लम्हे आतंकित होती
दर्द की नदी बन गई है.
दहेज़ को लेकर
तुम्हारी सहज परेशानियों को
तुम्हारी बच्ची
तिल-तिल कर भोगती है
और इस पीड़ा को झेलती
तुम्हारी लाडो की मासूमियत
तुम्हारी बिट्टो की सहजता
न जाने किन लम्हों में
विद्रोही बन जाती है .
इस सामाजिक व्यवस्था के
विरोध में तन कर खड़ी होने को आतुर
कि कल कोई माँ
रोये नहीं बेटी होने पर,
कल कोई माँ
परेशान न हो बेटी के दहेज़ को लेकर .

सुबोध-- अक्टूबर १९८६


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रिश्ते

खून के रिश्ते से
ज्यादा सही और सच
एक रिश्ता होता है
आपस की समझदारी
और सामंजस्यता का
जो शबनम सा चमकता
और माटी सा महकता है
इस रिश्ते को कहते हैं
प्यार,स्नेह,वात्सल्य
या पसंद हो जो नाम तुम्हें

सही और सच
सिर्फ खून के रिश्ते नहीं होते...
क्योंकि कभी-कभी खून के रिश्ते
मारने लगते है सड़ांध
और संबंधों में पड़ जाती है
न पटने वाली दरार
मगर समझ के रिश्ते में
नहीं होता स्वार्थ
सो नहीं दरकते आशाओं के महल
और नहीं फैलती संबंधों में कटुता .

फिर भी तुम्हें प्यारे है अगर
खून के रिश्ते ज्यादा
तो उनमे समो लो
समझदारी और सामंजस्यता
जिससे रिश्ते ज्यादा प्रगाढ़
और खूबसूरत हो.
और दुनिया मोहताज़ ना रहे
खून के रिश्तों की.

सुबोध अगस्त १९८६


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आस्था

खून से लिखे इश्तहार थामे
नारों से हवाएँ गर्म करते
अनपाये को पाने के लिए
मुठ्ठियाँ जकड़े
तमतमाये चेहरे
हाँ,बरसों पहले देखे थे
और उपेक्षा से मुस्कुरा दिया था
परिवर्तन लाने के लिए
शक्ति भी चाहिए - रोष ही नहीं
लेकिन आज
हर मोहल्ले से
इश्तहारों का हुजूम निकला है
और हर्फ़
शाने से शाना मिलाकर
आगे बढ़ रहे हैं
जिससे पूरा शहर थर्रा रहा है
कल का बिखरा हुआ रोष
आज संगठित होकर
शक्ति बन गया है
और मैं
जिसे कल तक इनमें
आस्था न थी
आज पहले वार के लिए
आगे बढ़ आया हूँ.

सुबोध मार्च १९८३


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सौगात

बमों के धमाके
और गोलियों की आवाज़ से
वक़्त नहीं ठहरा करता
सिर्फ खून की धार
सस्ती हो जाया करती है.
और कांच हुई आँखों में
तैरती परछाइयाँ
दरिंदगी का संकेत दिया करती हैं
लेकिन धरती बाँझ नहीं होती
ज़ुल्म के किले को तोड़ने के लिए
बौखलायी हुई हवाओं में
नये फूल खिला करते हैं .
चाहे जिस देश की ज़मीन पर
उन फूलों को
बल्लम की नोंक पर टांगा जाये
वक़्त नहीं ठहरा करता.
दास्तानों को अपने इतिहास में
दर्ज़ कर देता हैं --
आने वाली नस्लों के लिए.

सुबोध- मार्च १९८३


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भविष्य के प्रति

जिस रोज़ से
झुर्रियों की झोली वाले
बाप की आँखों में
अभाव की विभीषिका नहीं ममता मुस्कुरायेगी.
यौवन के चहकते बचपन पे खड़ी
खामोश बहन के बदन को
पैवन्दों की जालियाँ नहीं
साबित चुनरी दुलरायेगी .
नाबालिग भाई के हाथों को
याचना की नहीं
अधिकार की संतुष्टि सहलायेगी.
हाँ, उस रोज़ से
दुनिया मुझे
रोबोट से आदमी कहने लग जायेगी.

सुबोध - मार्च १९८३

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उत्तर


जब से मेरी कलम के पेट में
भूख उगी है
वह उत्तर देने की बजाय
प्रश्न करने लगी है
और प्रश्नों के उस अलाव में
जो विश्वास
जो संस्कार
ज़िंदा है
उन्हें मैंने
अपनी धड़कन बना लिया है
क्योंकि इन्हें ही
मशाल बनकर
वह पथ ज्योतिर्मय करना है
जिस पर मैं
भूखी कलम के प्रश्नों के
उत्तर पाऊंगा ....


सुबोध मार्च १९८३

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हस्ताक्षर

एक हूक उठती है
मेरी मुठ्ठियाँ भिंचती है
जबड़े कसते है
और तन तन जाता है
पर अगले ही पल ये आग
बर्फ बन
पिघलने लगती है
क्योंकि ये विद्रोह की भावनाएं
उनके प्रति है
जिनके हस्ताक्षर
मेरे गले में उतरने वाली
रोटियों पर है .
हाँ , मैं स्वीकार कर रहा हूँ
ये मुठ्ठियों का ढीलापन
रोटियों पर
मेरे हस्ताक्षर होने तक.

सुबोध-- मार्च १९८३

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ज़िन्दगी की शर्त

सच आंकड़े होते हैं.
आँखें नहीं !
मत करो हक़ीक़त का इज़हार
एक गोली तुम्हारे सीने में आकर लगेगी
और आंकड़े चुप रहेंगे.
दंगे सरकारी नीतियों से नहीं
सांप्रदायिक तत्वों के भड़काव से होते हैं !
यहाँ कविता के सीने में
आसाम में गोली लगती है
और अमृतसर में चेहरे पर
गौ-मांस का मुलम्मा चढ़ाया जाता है
यानी ज़िन्दगी की शर्त
आँख , कान और मुंह बंद रखना है
खुली सिर्फ नाक रहती है
जो ज़ुकाम से फर्क़ नहीं महसूसती
फूल और खून की गंध में.
उठो , मेरे दोस्त उठो !
माना कारतूस और बारूद हमें
इतिहास बना देंगे
पर इतिहास का भविष्य
एक नयी पीढ़ी
आँख - कान और मुंह खुला रखेगी
फूल और खून की गंध में फर्क़ महसूसेगी .

सुबोध- मार्च १९८३

 
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माई - बाप की संस्कृति

अन्धेरें में बोई हुई साज़िश
जब नक्शों पर उभरी
हमारी ज़मीन
आपके पैरों तले हो गयी
और आपके पैरों तले उगा अनाज
जिसमें हमारे पसीने की
बू समायी है
भूख का मसीहा हो गया
जिसे आपके पालतू कुत्ते
शहर की हद तक छोड़ आये
और आपने समझा
गिरवी रखी इज़्ज़त नीलाम हो गयी
पर गलत अंदाजों के सहारे
अंजाम दिया हुआ भविष्य
जिस पट्टे पर लिखा गया
हाथ उठ चुके हैं
उस पट्टेवाली
"माई-बाप" की संस्कृति को
उस कत्लखाने में फेंकने
जहाँ लहू की गंध अभी भी ताज़ी हैं.

सुबोध मार्च १९८३


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कारवाँ

चौंककर उठा हुआ
कहीं अंदर तक टूटा अहम्
आकाश गंगा को
सड़क की तरह बिछा
उस पर टहलने लगता है
लेकिन जब
हथेलियों पर बैठा
कालापन ठहाके लगाता है
सड़क
पहुँच से ऊँची हो जाती है
परन्तु यह बोध
तोड़ता नहीं
संतुलित करता है.
वर्तमान के सीने पर रखी
नींव पर ही
कल महल बनेगा
और मेरे पांव
सिर्फ दो नहीं रहते
कारवाँ हो जाते है.

सुबोध मार्च १९८३. 



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असफलता -- एक पहलू

दर्द
टुकड़ों में नहीं जिया जाता.
दर्द को जीना है अगर
पूरा जीना पड़ता है.
नहीं जीना है अगर
तो पाइए उस लक्ष्य को
जो किया है निर्धारित.

लेकिन क्या सफलता
संभव है बिना असफलता के ?
जीत संभव है बिना हार के ?
रौशनी की जरूरत
रौशनी में है या अँधेरे में ?
क्या ख़ुशी की कोई कीमत है
बिना ग़म के ?
आंसू क्यों छलक पड़ते है
खुशी में भी ?


क्या नहीं होती एक विचार की हत्या
सवालों को अनुत्तरित छोड़ने पर ?
और सम्भावनाओ को न तलाशने पर
हत्या एक अवसर की ?

घोड़ा संकट का
सवारी न करें आप पर
ऐसा अगर चाहते है आप
तो खुद सवारी करें
अधूरी नहीं - पूरी सवारी
क्योंकि
दर्द टुकड़ों में नहीं जिया जाता

सुबोध



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हारते वो हैं, जो मैदान छोड़ते हैं.

जब तक तुम मैदान में हो,
गिर रहे हो चाहे बार-बार,
हो गए हो थकान से चूर,
लेकिन न टेके हो घुटने ,
न किया हो समर्पण,
न मांगी हो जीत की भीख;
विश्वास करो , हारे नहीं हो तुम ..
क्योंकि हारते वो हैं ,जो मैदान छोड़ते हैं.

करो मेरा विश्वास
कि जिसने निर्माण किया है तुम्हारा,
नहीं है वो कोई सनकी- पागल
कि दौरा पड़ा अचानक ,
और उसने बना दिया तुम्हें.
बड़ी लगन से,बड़ी मेहनत से, बड़ी विद्वता से
निर्माण किया है उसने तुम्हारा,
एक अनोखे काम के लिए
और वो सिर्फ तुम्हीं कर सकते हो -
"हमेशा विजेता बनो"
सो मत मानो हार , मत छोड़ो मैदान
क्योंकि हारते वो हैं ,जो मैदान छोड़ते हैं.

उसने दिए है तुम्हें,
हार से बचने के लिए ढेरों हथियार ,
उठाओ उन्हें, करो उनका इस्तेमाल,
वरना पड़े -पड़े सड़ जायेंगें वे शस्त्रागार में.
उसने दिया है तुम्हें--
विचार का हथियार,
भावना का हथियार,
चुनाव का हथियार,
कर्म का हथियार,
और भी ढेरों हथियार,
जो अलग करते है तुम्हें जानवरों से,
बनाते हैं तुम्हें इंसान,

और तुम हो कि उसके सारे वरदान ठुकरा कर,
बनने चले हो इंसान से जानवर.
मत करो उसके वरदानों का अपमान,
मत मानो हार,मत छोडो मैदान
क्योंकि हारते वो हैं , जो मैदान छोड़ते हैं.

सुबोध







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मंज़िल


मैं
थक गया हूँ
चलते-चलते,
बस..ये आखिरी मोड़
और आगे नहीं .
सोचता हूँ,
शायद जहाँ ये सड़क
ख़त्म होती है
और शुरू होता है
नया मोड़
वहीँ तक और चलना है मुझे .
बरसों चला हूँ
पसीने से लथपथ
थकान से चूर
गुजरा हूँ
अँधेरे रास्तों से
कई दफा सना हूँ
कीचड से
लेकिन
रूक नहीं पाया हूँ
हताशा के बाद भी
क्योंकि एक आशा
रूकने नहीं देती मुझे
शायद यही मोड़
आखिरी मोड़ हो
"जहाँ मुझे होना है."
एक सवाल
कचोटता है मुझे
क्या वो जगह
" जहाँ मुझे होना है."
आने के बाद भी
खुद को रोक पाऊंगा मैं ?
सुबोध



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