Wednesday, September 17, 2014

गद्य

काश!!
कुछ अनलिखे शब्दों को हम पहचान पाते !!!
मीरा ने पहचाना ,पंचतत्व में विलीन हो गई !!
हीर ने पहचाना फ़ना हो गई !!
माँ ने पहचाना वृद्धाश्रम पहुँच गई !!
प्रकृति ने पहचाना , रौद्र हो गई !!!!
और...
और...
और....
एक लम्बी लिस्ट और हम भावनाहीन इंसान !!
शब्दों को ओढ़ते है, शब्दों को बिछाते है,शब्दों को पहनते है
लेकिन शब्दों का अनलिखा नहीं समझते !!!!

 सुबोध- १७ सितम्बर , २०१४ 



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कुछ लम्हे ज़िन्दगी में हताशा देते है और हम उन नकारात्मक लम्हों के बहाव में बहते हुए खुद को नकारा मान लेते है ,हार स्वीकार कर लेते है ,सुनहरी ख्वाबों से खुद को दरकिनार कर लेते है . क्या उन लम्हों पर हम कुछ अलग तरीके से प्रतिक्रिया नहीं दे सकते ?

एक आईना जब टूटता है कुछ कहते है इसे कचरे में फेंक दो और कुछ कहते है आओ एक नया रॉक गार्डन बनाये !!!!

परिस्थितियां आपके बस में नहीं है लेकिन परिस्थितियों पर आप क्या प्रतिक्रिया करते है यह पूरी तरह आपके बस में है .

सुबोध- १७ सितम्बर , २०१४

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