Friday, May 30, 2014

ख्वाबों की शाल



ख्वाबों की शाल 
जो बुनी  थी रात में
सुबह खुल गई कोई गिरह
सारे ख्वाब बिखर गए
चुन चुन कर
कर रही हूँ उन्हें इकट्ठे
मोहब्बत की गठरी में .
दिन जब गहराएगा
यादों का आँचल
हवा के झोंके से लहराकर
चूमेगा मेरा माथा.
विरह की
बर्फीली चोटियों  से
एक टुकड़ा रौशनी
लेकर उधार
उंडेल लुंगी जिस्म पर
और करुँगी तेरा इंतज़ार.
अंजुरी भर चांदनी
बाँधी है मैंने अपने दुपट्टे  में
तुम्हारे लिए
जब भी मिलेंगे हम
इकट्ठे बैठकर बुनेंगे  
ख्वाबों की शाल.
ख्वाब जो इकट्ठे किये है  मैंने
मोहब्बत की गठरी में .

सुबोध  ३०,मई २०१४

 


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